आखिर दिल्ली पुलिस किसानों के आगे बेबस क्यों रही? कारण समझते है

दिल्ली पुलिस आखिर किसानों के सामने इतनी बेबस क्यों दिखी
आखिर दिल्ली पुलिस किसानों के आगे बेबस क्यों रही? कारण समझते है
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चाहे पुलिस हो या किसान, सभी भारत के बाशिंदे है, चूंकि पुलिस का जवान भी किसी दूसरे ग्रह से नही आता, आप रेशियो निकालकर देख लीजिये 70 प्रतिशत से ज्यादा पुलिसकर्मियों में किसानों के बेटे ही मिलेंगे लेकिन दिल्ली में ट्रैक्टर मार्च के दौरान दिल्ली पुलिस इतनी बेबस क्यों हो गयी जबकि दिल्ली पुलिस के बारे में यह प्रचलित है कि दिल्ली पुलिस एक झटके में हेकड़ी निकाल देती है।

फिर चाहे वह ज़ामिया का मामला हो या कोई और तथाकथित तरीके से दिल्ली पुलिस के बारे में वो नैरेटिवे सेट किया गया था जिसको लेकर दिल्ली पुलिस लगातार अपनी छवि दुरुस्त करने के चक्कर में लगी हुई थी यही कारण था जब किसानों के वेश में दंगाई नंगी तलवारें लेकर पुलिस पर भांज रहे थे तब पुलिसकर्मियों के पास उनके सामने हाथ जोड़ने के अलावा और कोई चारा नही बचा था। हालांकि ऐसा नही था कि पुलिसकर्मी अपने बचाव में मिले अधिकारों के तहत आत्मरक्षा के लिए बचाव नही करती लेकिन पुलिस ने बचाव के लिए हल्के लाठी चार्ज और आंसू गैस के अलावा और कुछ करना मुनासिब नही समझा।

किसानों को लेकर लोगों की तंद्रा टूट गयी:

दरअसल किसानों ने जब से दिल्ली फतेह की शुरुआत की उस वक्त से देश का बहुत बड़ा जनसमुदाय किसानों के प्रति सहानुभूति रखने वाला था। लोग किसानों के अधिकारों को लेकर मुखर हो चुके थे, सरकार पर कृषि कानूनों को लेकर दबाव बनने शुरू हो गए थे ,लेकिन गणतंत्र दिवस पर किसानों के उपद्रवों ने एक झटके में इस माहौल को जमीन में मिला दिया। लोगों द्वारा दिल्ली पुलिस के जवानों की बेबसी बेहद नजदीकी से देखी गयी।

पुलिस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि आखिर अन्य विकल्पों का चुनाव क्यों नही किया:

दिल्ली पुलिस कमिश्नर ने घटना के 24 घंटे के बाद एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह खुलासा किया गया कि हमें किसानों द्वारा किये जाने वाले उत्पात की शंका 25 जनवरी को ही हो गयी थी, लेकिन चूंकि दिल्ली पुलिस ने किसान संगठनों के साथ एग्रीमेंट किया गया था इसलिए तैयारियां कर ली गयी थी, लेकिन किसानों ने उम्मीद से आगे बढ़कर हिंसक रूप ले लिया। हालांकि किसानों के हिंसक होने बावजूद पुलिस ने किसी भी जानमाल के नुकसान को बचाते हुए किसी भी अन्य विकल्पों को नही चुना, बल्कि चेतावनी और तितर-बितर करने के लिए हल्के लाठी चार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया।

क्या हुआ असर?

इस ट्रैक्टर रैली के बाद सबसे बड़ा नुकसान किसान आंदोलन को हुआ है जिसकी दो महीने से ऊपर की मेहनत एक झटके में हलाक हो गयी, और इस नाकामी का सेहरा सीधे तरीके से किसानों के नेताओं पर ही जाने वाला है। इस मामले में दिल्ली पुलिस ने किसी भी उपद्रवियों को नही बख्शने की नसीहत जारी की है, इस वारदात के बाद केंद्र की सत्ता पर काबिज भाजपा के पास एक मौका होगा कि वह अपने विरोध में जुटी हुई राजनीतिक पार्टियों पर निशाना लगाए देर शाम तक भाजपा के द्वारा की गई प्रेस कांफ्रेंस में इस बारे में उल्लेख भी किया गया। नतीजन किसान आंदोलन उपद्रवियों की भेंट चढ़ गया और जाहिर सी बात है कि इस आंदोलन की वजह से सुप्रीम कोर्ट जैसे बड़े न्यायिक संस्थान की नजर में भी किसानों के प्रति रवैया सख्त होता जाएगा।

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उदय बुलेटिन
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