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Kamlesh Tiwari Murder
Kamlesh Tiwari Murder|Social Media
नजरिया

कमलेश की हत्या पर बुद्धिजीवी मौन, क्या इसे नैतिक आतंकवाद की श्रेणी में रखा जाए ?

सरकार ने सुरक्षा दी होती तो आज जिन्दा होते कमलेश तिवारी।

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

Summary

हमारे देश मे बोलने की अदभुत आजादी है, आप किसी पर भी बोल सकते है, आप वहाँ भी बोल सकते है जहां शांति बनाए रखने की अपील लिखी हो, क्योंकि आपके पास अभिव्यक्ति की आजादी का छूमंतर जो है, बोलते रहिए ,बोलना जिंदा रहने की निशानी होती है, भला मुर्दे भी कहीं बोलते है ?

मुर्दे से याद आया कमलेश तिवारी जो अपने धर्म के अनुयायियों  के लिए मुखर होकर बोल रहे थे उनके बोलने से जिनको तकलीफ हुई उन्होंने गला रेत कर काम खत्म किया और तड़पते हुए व्यक्ति पर तसल्ली करने के लिए जाते-जाते रिवॉल्वर से गोली भी मार दी।

कभी-कभी इंसान खुद नही मरना चाहता,या तो उसे परिस्थिति मार देती है या फिर सिस्टम, यहाँ कमलेश तिवारी के साथ दोनो बातें बिल्कुल एक साथ हुई एक तो परिस्थिति ऐसी हुई कि उन्हें मारने वालो को प्लानिंग के साथ मौका मिला और दूसरा सिस्टम ने उन्हें मरवाने में कोई कसर नही छोड़ी।

मामला 2015 में शुरू होता जब उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार थी सामुदायिक वाकयुद्ध अपने चरम पर था इसी समय अपनी भड़ास निकालने के लिए कमलेश तिवारी ने पैगम्बर मुहम्मद साहब के ऊपर टिप्पणी कर दी जिसे लेकर प्रदेश में अच्छा खासा बवाल हुआ, मौलानाओं और धर्मगुरुओं द्वारा कमलेश का सर कलम करने पर इनाम भी घोषित किया गया, सरकार ने कमलेश पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत मुकदमा पंजीकृत कराया, हालांकि हाईकोर्ट में कमलेश पर ग्यारह महीने जेल में रहने के बाद यह चार्ज हटाया गया, मामला धीरे-धीरे शांत हो चुका था कमलेश तिवारी भी राजनैतिक दल बनाकर मेन स्ट्रीम राजनीति में घुसने का रास्ता तलास रहे थे और उनके जीवन मे बहुत कुछ बदल रहा था, प्रशिद्धि तो बराबर थी तत्कालीन सरकार ने सुरक्षा की दृष्टि से उन्हें 19 सशस्त्र पुलिसकर्मी (गनर) मुहैया कराए थे।

सत्ता बदली और मुख्यमंत्री बदले गए, कमलेश तिवारी का राजनैतिक रसूख हिंदुत्ववादी के समानांतर ही बढ़ रहा था, वहीँ परिवार के अनुसार सरकार के नेताओ की तल्खी की वजह से उनकी सुरक्षा में कमी करके उन्नीस गार्ड की जगह दो गार्ड तक सीमित किया गया, कमलेश तिवारी द्वारा लगातार ज्यादा सुरक्षा की मांग हुई लेकिन वर्तमान सरकार द्वारा इसे सिरे से नकारा गया।

2019 के अक्टूबर महीने में लगभग 2 दिन पहले भगवा कपड़ो में सूरत (गुजरात) के दो लोगों ने लखनऊ के ऑफिस में घुस कर चाकू से गला रेत कर हत्या कर दी, मरने की पुष्टि करने के लिए गोली भी मारी गयी।

सरकार ने एक ओर जहां जांच का दायरा उत्तर प्रदेश से बढ़ाकर गुजरात तक इस हत्याकांड के चरणचिह्न खोजे वहीँ मरने के बाद मातम मनाते हुए तिवारी के परिजनों पर उत्तर प्रदेश पुलिस की लाठियों का स्वाद चखाया, एक ओर जहां 2015 में फतवा जारी करने वाले मौलवियों को हिरासत में लिया गया वहीँ परिजनों को लाश रात के मौके पर दी गयी क्योंकि सरकार को अंदेशा था कि भावनाओं का विरोध न जग जाए।

हालांकि सरकार जिस तरह से अपनी पीठ थपथपा रही है उसके अपने मजे हैं।

अब असल सवालों का दौर होता है:

गुजरात मे पकड़े गए आईएसएस मॉड्यूल के लड़कों ने कमलेश तिवारी के अससिनेशन की बात कबूली थी, क्या सरकार इस बात को गहराई से नही समझ सकती थी ?
कमलेश द्वारा मांगी गई सुरक्षा पर सरकार ने कोई सार्थक कदम क्यो नही उठाये !

सरकारों का क्या ? सरकारे ऐसा ही करती है, उनका हक है ! लेकिन उन बुद्धिजीवियों का क्या जो हर  बात में एवार्ड्स वापिस करने की मुद्रा में रहते है , कमलेश तिवारी के समर्थकों के अनुसार वो अब किस बिल में छुपे हुए है, किसी बड़े समाजसेवी फिल्मी कलाकार का स्टेटमेंट और देश मे जाति धर्म विशेष के लोगो को खतरा महसूस करने वाले आजकल किस मुद्रा में है
लोगो के अनुसार बड़े बुद्धिजीवी लोग अपनी सुविधानुसार मामले को देखते सुनते और समझते है।

हालाँकि अब कमलेश का अंतिम संस्कार हो चुका है, कमलेश की पत्नी को उत्तर प्रदेश पुलिस धकियाते हुए भी नजर आयी है, पुलिस के मुखिया ने अपराधियों की गिरफ्तारी के पहले ही यह निर्धारित कर दिया कि ये कोई आतंकी घटना नही बल्कि एक बयान का विरोध था, हालकि किसी धर्म विशेष के नेता की हत्या करके अपराधी क्या साबित करना चाहते थे ?

उनका सिर्फ एक मकसद था आतंक फैलाकर दूसरों को बोलने से रोकना, लोगों के अनुसार उन्होंने पिछले कुछ वर्षों में अखलाख मकसूद और अन्य तमाम लोगो की हत्याएं देखी और सुनी है, लोगो की मतांध टोली ने उन्हें अपना शिकार बनाया तब समाज ने उनका भरसक विरोध किया, लेकिन कमलेश की हत्या के बाद का नजारा बेहद अलग है।

जहां तक आरोपियों की मानसिकता का सवाल है तो एक चित्र वायरल हुआ है जहां हत्या करने वाले दो लोग एक दूसरे का हाँथ पकड़ कर बैठे हुए है, उनका इस तरह आत्मविश्वास से हाँथ पकड़ना किसी बड़े संकेत की आहट देता है।

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