बजट और आम आदमी “सब चंगा सी”

हर साल बजट आता और चट हो जाता, ग्रामीणों के हालात जस के तस रहते हैं।
 बजट और आम आदमी “सब चंगा सी”
2020 for farmers and villagersGoogle

शनिवार के दिन देश की महिला वित्त मंत्री साहिबा ने 2020 के लिए नया बजट पेश किया, माफ कीजियेगा पेश करने की दशा अलग होती है जैसे कि आपके सामने शर्बत का गिलास पेश किया गया तो उसको लेना और न लेना आपका बेहद निजी निर्णय है। आप चाहें तो नकार भी सकते है लेकिन बजट अलग चीज है आप उससे अलग नहीं हैं या फिर उसे अस्वीकार नहीं कर सकते। तो कुलमिलाकर बजट भारतीयों की सेवा में आवश्यक तरीके से फेंका गया जो कि लेना नितांत आवश्यक है, खैर महिला वित्त मंत्री जी है और हमारे घर मे भी बजट बनाने का अधिकार महिला वर्ग का ही है सो हमने अपनी निजी अनुभव के आधार पर बजट पर बहस करना जायज नहीं समझा क्योंकि बहस के दुष्परिणाम हमे भलीभांति ज्ञात है।

तो हमे बहस इस पर नहीं करनी की बजट कैसा है..

हमे बहस करनी है कि कित्ते बजट आये और गए, आम आदमी ( दिल्ली वाला नहीं बाबा) ग्रामीण अंचल पर बजट कितना प्रभावी है।

कहने को तो किसानों के लिए बजट में अच्छी खासी बातें कही गयी, लेकिन कसम उड़ान छल्ले की इसका किसानों और ग्रामीणों के निजी जीवन से कोई लेना देना नहीं है, और अगर है भी तो उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता,

सरकार कितना भी ग्रामीणों के लिए आवास की योजना बनाये उन्हें तो बिना ग्राम प्रधान और ग्राम सचिव को खिलाये कुछ भी हासिल नहीं होगा, तो इस मामले में ग्रामीण ( पहले एक बात किलियर कर लो कि हमारी नजर में आम आदमी वह है ग्रामीण परिवेश का है, उसे शहरी आदमी न माने) बेहद निश्चिंत है उसे कोई फर्क ही नहीं पड़ता कि क्या बजट और किसका बजट, हमने बजट के बारे में जानने के लिए गांव के एक चचा से पूँछा की नए साल का बजट पेश हुआ है, क्या उम्मीद है ?

जवाब बेहद मारक टाइप का था " बेटा, कौनो नया नस्ल के बैल है का? अब सवाल यह है कि या तो चाचा अनपढ़ होंगे तो ग़लत जवाब!!! पुराने जमाने के एमए है तो मामला सीधा है चचा जवाब ही नहीं देना चाहते थे या फिर उन्हें इस बात से कोई फर्क ही नहीं पड़ता।

टैक्स मतलब कोई बात नहीं :

देखो भाई किसान पक्का जुआरी होता है, मजाक नहीं है सदियों का जुआरी है, हर साल खेलता है, और अक्सर हार के ही घर जाता है, जीतना तो कभी कभार ही होता है, लेकिन इसकी कोई गारंटी नही, अब सरकार बजट में पांच लाख के अंदर कितनी छूट दे या दश लाख वालों को कितने प्रतिशत टैक्स लगाए, आम आदमी इसके चक्कर मे पड़ता ही नहीं है, क्योंकि उसे अपनी औकात पता है कि वह पांच लाख तो छोड़ो लाख का आंकड़ा ही नहीं पा सकता, लाख तो छोड़ो, हर साल हजारों की जुताई, निराई, गुड़ाई, बुआई, खाद बीज, सिंचाई ,कटाई, छटाई के बाद जब फसल बाजार पहुंचकर अपनी कीमत सुनती है तो फसल खुद आत्महत्या करने पर उतारू हो जाती है और किसान हिसाब लगाता रह जाता है कि उसने क्या लगाया और क्या पाया?

क्या सस्ता क्या महंगा ?

पंजाबी में एक कहावत है "कि फर्क पेंदा है" अब वाशिंग मशीन, फ्रिज, एसी, वैसी से ग्रामीण जीवन का क्या लेना? मोबाइल आज भी कीपैड वाला बेहद उम्दा माना जाता है, बांकी जो भी सस्ता महंगा हो उससे किसान और आम आदमी को कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन नहीं आज एक ताऊ जी बजट की न्यूज को बड़े गौर से क्या सस्ता महंगा देख रहे थे, आखिर में सस्ता महंगा देखने के बाद टेंशन के साथ उठ खड़े हुए " यो जो भी सस्ता है, अपने बस का ही नहीं है"

सेना और रेलवे :

जी हां इससे किसान और आम आदमी का लेना देना है लेकिन इतिहास गवाह है इस पर लंबे समय से सरकारें बयान तो देती आयी है लेकिन असल हालत क्या है ये किसी से छुपा हुआ नहीं है।

कभी आपने गौर किया है कि सेना में अधिकांश कौन जाता है ? ग्रामीण

और ट्रेन में सबसे ज्यादा धक्के कौन खाता है ?

ग्रामीण  !!

दोनो जगहों पर हर साल बजट में भारी भरकम इंतजाम तो किया जाता है लेकिन न तो सैनिकों को जरूरत के अनुसार बुलेट प्रूफ जैकेट मिल पाती है, उसका पैसा नेताओं की सुरक्षा में खर्च हो जाता है और ट्रेन की सीटें आईआरसीटीसी का एप्प इस्तेमाल करने वाली शहरी जमात चट कर जाती है। और आम आदमी टिकट काउंटर पर खड़ा होकर सुकून से वेटिंग के टिकिट खरीदता रहता है और ज्यादा जरूरी होने पर चालू टिकिट लेकर स्लीपर में घुसकर पुलिस और टीटीई के लात जूते और गालियां खाता रहता है।

ग्रामीण जीवन मे बजट कितना महत्वपूर्ण है ये तो पता है लेकिन वो असलियत समझ चुके हैं, उन्हें कोई फर्क नही पड़ता।

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उदय बुलेटिन
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