Yuva Divas
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नजरिया

आज राष्ट्रीय युवा दिवस है, क्या हैं इसके मायने ? 

आज का युवा हिंसक क्रन्तिकारी बनता जा रहा है ऐसे में इन युवाओं को स्वामी विवेकानन्द को पढ़ना चाहिए।

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

Summary

अगर आंकड़ों को देखा जाए तो भारत विश्व के उन चुनिंदा देशो में से है जहाँ सबसे ज्यादा युवा नागरिक निवास करते है, नागरिक का अभिप्राय किसी नागरिकता से नही है यहां रहने वालों में से है। युवा होने के साथ-साथ सोच भी नई है, लेकिन कभी कभार युवा अपने जोश ओ खरोश में आकर वह कर देते है जो एक स्तर में आकर सवालिया निशान लगा जाता है, आज युवा दिवस है, और चर्चा करने का मौका है, तो छोटी चर्चा कर ही लेते है।

युवा दिवस :

इस दिवस को सरकारी मान्यता सन 1984 को भारत सरकार ने देश के सबसे युवा धार्मिक और सामाजिक जन चेतना के नेता स्वामी विवेकानंद जी के जन्मदिन के उपलक्ष्य में घोषित किया, चूँकि विवेकानंद जी का अपना खुद का जीवन प्रेरणाओं से भरा रहा, उन्होंने अपना जितना जीवन समाज मे दिया वो एक युवा की तरह रहा, इसीलिए सरकार ने हर वर्ष 12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस घोषित किया।

विवेकानंद ही क्यों ? अन्य क्यों नही ? :

यहाँ एक अहम सवाल उठता है, युवा दिवस विवेकानंद जी के जन्मोत्सव पर ही क्यों, इसके लिए कई तर्क खड़े किया जा सकते है, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और पता नहीं कितने युवा क्रांतिकारी जो इस फेरहिस्त में शामिल हो सकते थे।।।।।।।।।।।

लेकिन चुना गया तो विवेकानंद जी को, यहाँ हम पहले यह किलियर कर देना चाहते है कि हर क्रांतिकारी और महापुरुष का भारत निर्माण में योगदान अपरिमित है, सबने अपने अपने सामर्थ्य के अनुसार देश को हर मुमकिन सहायता दी है ताकि भारत आगे बढ़ सके लेकिन अगर युवा का प्रश्न आता है तो यकीनी तौर पर सबसे पहले स्वामी जी का स्मरण आता है, चूँकि यहां आपको यह समझने की जरूरत है कि आखिर युवा है कौन ?

32 साल का युवा जिसका योगदान क्षणिक है या 50 साल का वह युवा जिसकी सोच सदियों तक याद की जाएगी, बस यही कारण था, कि स्वामी विवेकानंद का जीवन भले ही उतना रहा जितना आप उंगलियो पर आसानी से गिन सकते है लेकिन उतने जीवन मे ही देश और समाज को वह मापदंड दिए जिससे आप जीवन भर युवा रह सकते है।

आखिर युवा है कौन :

30 साल का वह लड़का जो नशे फूंकता हुआ महिलाओ को मौका मानकर अपनी करतूत करता है, और एक बुजुर्ग जो किसी अनजान महिला को अपनी जिम्मेदारी मानकर सुरक्षित करता है, अब आप यहाँ महिला की जगह, देश , देश की संपत्ति को रखकर नजरिया बदल सकते है।

देश के युवाओं में आजकल सरकार के कानूनों को लेकर विरोध पसरा हुआ है, फिर चाहे वह दिल्ली का जेएनयू हो या फिर जामिया या चाहे एएमयू सब जगह युवा शक्ति ने अपने दम पर सरकार का विरोध किया लेकिन देखते ही देखते ये विरोध हिंसा में बदल गया और नतीजे कुछ और ही निकल आये, तो असल समस्या यह है कि देश के युवाओं का यह विरोध किस तरह की नई परिभाषाएं गढ़ रहा है, ये सवाल न सिर्फ जायज है बल्कि देश के युवाओं के हितों को लेकर बेहद जरूरी है।

दिल्ली के किसी विश्वविद्यालय में नशा फूंक कर कानूनों का विरोध करता हुआ युवा समूह :

हालांकि नशा करना और नहीं करना यह व्यक्ति का निजी निर्णय और आजादी के अंतर्गत आता होगा लेकिन इतने संजीदे मुद्दे पर ये हालात, युवाओं को कहाँ लेकर जायेगे?

आज युवाओं में समाज सुधारक से ज्यादा हिंसक क्रांतिकारी बनने की होड़ लगी है :

देखिए क्रांतिकारियों के बारे में आपकी और मेरी सोच अलहदा हो सकती है, देश के तमाम क्रांतिकारियो ने अपनी जान इस देश के लिए कुर्बान की थी ये यथार्थ सत्य है लेकिन क्या आप आज के परिवेश में यह होना सही मानते है कि आप खुले आम किसी का कत्ल कर दे, या फिर मारने की कोशिश करे ? जी नहीं, लेकिन उसके बाद भी जेएनयू में नकाबपोशों का घुसकर छात्रों के बीच मारपीट होना कुछ अलग कहानी बयां करता है, हालांकि अभी भी विवि के दोनो तीनो पक्ष एक दूसरे पर आरोप लगाते नहीं थक रहे है।

वास्तव में आज हमे स्वामी विवेकानंद जी जैसे युवाओं की जरूरत है जिनके हिसाब से उन्हें " गरीबो में भगवान दिखता था" जिनके लिए शिक्षा बेहद जरूरी थी, जिनके हिसाब से अगर कोई बात गलत लगती है तो उसका विरोध जायज है लेकिन जायज तरीके से।

बाकी आप पर युवा होने के लिए कोई बंधन थोड़े न है, साठ साल में युवाओं जैसी सोच रखिये युवा बने रहेंगे मरते दम तक।

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