Modi Nagar 
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नजरिया

मोदी नगर कैसे बदला, शायद सो काल्ड आजादी की क्रांति उसे निगल गयी! 

देश मे आजादी मांगने का चलन अपने शबाब पर चल रहा है !

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

Summary

अगर देखा जाए तो देश में सबके पास बोलने की आजादी है लेकिन कई बार इसके बेहद बुरे आयाम निकल कर सांमने आते है, शायद यही कारण है कि यहाँ की लाल क्रांति ने यहाँ के उद्योगों को नक्शे पर से ही मिटा दिया।

उत्तर प्रदेश का मोदी नगर, जहाँ जिला गाजियाबाद में साल 1933 में प्रतिष्ठित व्यवसायी गूजरमल मोदी ने चीनी की मिल लगाकर इस उद्योग नगरी की स्थापना की और यह शहर भारत भर में अपनी पहचान एक उद्योग नगरी के तौर पर चलाने लगा। शायद यही कारण था कि पूरे भारत और खासकर उत्तर भारत ( उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, उत्तराखंड) से लोग यहाँ जीविकोपार्जन के लिए ट्रेनों बसों से दौड़े चले आते थे। यहाँ आपको बताते चले मोदीनगर को इससे पहले बेगमाबाद के नाम से जाना जाता था। लेकिन जबसे गूजरमल मोदी ने इसे अपना नाम दिया यहाँ की स्थितियां बदलने लगी, लोगों को रोजगार मिलने लगा, स्थानीय निवासियों के पास नियमित पैसा आने लगा ,तभी इस उद्योग पर सो काल्ड क्रांतिकारीयो की नजर लग गयी।

फिर शुरू हुआ लाल सलाम, मजदूर एक हो जाओ :

फिर वहाँ एक दिन कुछ लोग मजदूरों को समझाने लग गए कि यहाँ आपकी मेहनत का शोषण होता है। आप मजदूर क्यों हो, जबकि आपका ओहदा मालिक के बराबर होना चाहिए, मजदूरों ने कहा कि हमे मजदूरी का पैसा मिलता है, क्रांतिकारी लोगों ने समझाया कि वो अगर आपको पैसा देते है तो कौन सा बड़ा काम करते है। ये आपका हक है, हक क्या है आपका जन्मसिद्ध अधिकार है आप इस व्यवस्था के मालिक है, फिर क्या सारा मामला ठप हो गया, हर जगह मालिक के विरोध की आग जल उठी, लोगों ने अहिंसक और हिंसक प्रदर्शन किए, कई बार इन प्रदर्शनकारियों के स्तर इतना गिरा की उसकी चर्चा करना भी उचित नही , सुनने को मिलता है कि एक बार "उद्योगपति मोदी की पत्नी मंदिर जाने को हुई तो प्रदर्शनकारियों ने मंदिर के सामने उनकी पत्नी को खड़ा कर क्रांतिकारियों ने अपने पूरे कपड़े ही उतार दिए" कुलमिलाकर ये भौडा प्रदर्शन था।

निर्माणी फैक्ट्रियों की संख्या बहुत ज्यादा थी :

एक समय जब पूरे भारत मे साबुन निर्माताओं के द्वारा साबुन में बेस मटेरियल के तौर पर जानवरो की चर्बी ( फैट) का इस्तेमाल होता था, मोदी ग्रुप ऑफ मिल्स ने अपने साबुनों में वनस्पति फैट का इस्तेमाल करके लोगो को सही सलामत साबुन उपलब्ध कराए, इसके अलावा वनस्पति घी इत्यादि के समेत तमाम उपक्रम काबिज थे , जिन्हें सो काल्ड क्रांतिकारी लोगो ने इसे बिल्कुल समाप्त ही कर दिया।

केवल चीनी मिल, किसानों के दम पर बची रही:

क्रांति के नाम पर विद्रोही लोगो ने आम मजदूरों को तो बरगला कर अपना उल्लू सीधा कर लिया, और फिर मजबूर होकर मोदी मिल्स ने एक एक करके अपनी कंपनियों को या तो दूसरी जगह शिफ्ट करने शुरू कर दिया या फिर उन्हें एक झटके में बंद ही कर दिया, नतीजा यह हुआ कि एक झटके में ही भारी संख्या में लोगो का रोजगार छीन लिया गया, बस केवल किसानों की वजह से चीनी मिलें सुरक्षित रही, क्योकि किसानों ने इस प्रदर्शन में विद्रोहियों का साथ नही दिया।

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उदय बुलेटिन
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