कोरोना काल और सामाजिक गंदगी: क्या-क्या देखना पड़ रहा है

लोग मरे तो मरे हम तो दिल खोल कर मुनाफा कमाएंगे, राजनीति की रोटियां सेकेंगे ऐसी सोच रखने वाले लोग इंसानियत के नाम पर कलंक है। इंसानियत के लिए वक्त बुरा चल रहा अब तो समझ जाओ इंसान।
कोरोना काल और सामाजिक गंदगी: क्या-क्या देखना पड़ रहा है
महामारी में मुनाफाखोरीUday Bulletin

वक्त है कोरोना काल का, आप अगर एक घंटे का समय निकाल कर भी टीवी के सामने बैठ जाये तो आपका दिमाग आने वाले भविष्य की भयावहता से कांप सकता है। आपका मानसिक संतुलन बिगड़ सकता है। क्योंकि टीवी पर चलने वाले डिबेट आपको ऐसे भंवर जाल में लपेट देंगे कि आपको सत्य असत्य। सही गलत की पहचान करना मुश्किल हो जाएगा, दरअसल ये तिलिस्म है टीआरपी का। लोगों के दिलो दिमाग और भावनाओं से खेलने का जिसमें राजनीतिक दल महकती हुई हींग का तड़का लगा रहे है।

बुरे वक्त ने बताया कि अच्छा और बुरा क्या है:

ऐसे वक्त पर आध्यात्मिक होना बेहद सहज है, रामचरितमानस की पंक्तियां "धीरज धर्म मित्र अरु नारी, आपद काल परखिये चारी" वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। ऐसे बुरे वक्त में आपके पास मौका है कि आप उन लोगों की पहचान करें जो आपके सच्चे हितैषी है।

दिन भर की खबरों में नजर आता है कि बेटे ने पिता के संक्रमित होने के बाद उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया, शवों को रिश्तेदार हाथ भी नही लगा रहे, पड़ोसी शक के आधार पर लोगों को बिल्डिंग में घुसने से मना कर रहे है। शायद इसे ही कलियुग कहा गया है जिसमें मनुष्य मनुष्य का साथ नही देगा।

बात यहीं तक सीमित नही है, बल्कि लोग उन मुद्दों पर भी चर्चा कर रहे है जिनसे उनका सीधा-सीधा कोई लेना देना नही है। जो व्यक्ति इस महामारी के चलते काल कवलित हो गए उन्हें भी निशाना बनाया जा रहा है। ताजा उदाहरण आज तक के एंकर रोहित सरदाना को ही ले लीजिए उनकी दुःखद मृत्यु के बाद दलितों के सो काल्ड मसीहा और एक समुदाय विशेष के तथाकथित मठाधीश उनकी मौत को सार्थक और जायज ठहरा रहे है।

बात यहीं तक नही रुकी और नजर डालिए, प्रोफेसर दिलीप मंडल रोहित सरदाना को हिटलर बनाते हुए नजर आए

हालांकि जब लोगों ने मंडल की मानसिकता पर सवाल खड़े किए तो उन्होंने बेहद भद्दे तर्क दिए जिनका कोई तर्क, तर्क होने की कसौटी पर भी खरा नही उतरता।

भला अब ऐसी मानसिकता का इलाज क्या हो सकता है जो समाज मे किसी की मृत्यु को भी निजी लाभ के लिए प्रयोग कर सकते है और सबसे मजे की बात तो ये भी है कि ये खुद को प्रोफेसर कहलाते है। मतलब शिक्षा देकर छात्रों की नई फसल तैयार करते है, दरअसल ये छात्रों में कुंठा, अनैतिक विरोध के बीज बोते है।

कोरोना काल भी राजनीति के लिए अवसर बना:

चाहे बात इस वक्त केंद्र की सत्ता में काबिज भाजपा की हो या विपक्षी दलों की भूमिका से नदारद अन्य दलों की, इन्होंने कोरोना काल मे जमकर निजी स्वार्थ के लिए जहर उगला। वैसे भी केंद्र की सत्ता पर देश मे चल रही महामारी को अनदेखा करने के प्रबल आरोप लगे वहीँ दिल्ली जैसे राज्य के लोगों का अस्पतालों के दरवाजे पर रोना गिड़गिड़ाना, महज एक आक्सीजन सिलेंडर के लिए हज़ारों रुपये देना राजनीतिक विफलता को दर्शाते हैं। कमोबेश यही हालात उत्तर प्रदेश के भी है, जहाँ पर नामी गिरामी डॉक्टरों द्वारा महज कुछ रुपये के इंजेक्शन को हज़ारों में बेचना और मरीजों का अस्पतालों की चौखट पर मर जाना सत्ता पर गंभीर आरोप लगाता है।

विपक्ष केवल मजे लेने के मूड में है, सूप तो सूप, छलनी भी बोले जिसमें बहत्तर छेद:

राजनीति लाभ लेने का उपक्रम है, यहां सत्ता पर बैठा हुआ व्यक्ति लाभ लेता है लेकिन सत्ता से उतरा हुआ व्यक्ति हर बात में भड़ास निकाल कर किसी तरह सत्ता में बैठना चाहता है। उसे लगता है कि शायद इस मामले के तूल पर ही सरकार का सामांजस्य बिगड़ जाए तो उसे सत्ता मिल जाएगी।

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का युवाओं से आवाहन देखिए, हालांकि इस आवाहन की बात यह भी हो सकती थी कि कोविड से उबरे हुए युवा प्लाज्मा दान, भूखों को खाना पानी उपलब्ध कराए लेकिन नही साहब को सत्ता चाहिए सो उन्होंने युवाओं से अपील कर दी कि कुछ भी करके वर्तमान सरकार को सड़क पर ले आइये ताकि उन्हें सत्ता लाभ मिल सके ।

बहरहाल, इस वक्त सरकारें कितनी मजबूत है और वो जनता को कितना लाभ पहुँचा रही है ये मुझे ज्ञात नही, लेकिन हालात खराब है और इतने ज्यादा खराब कि इनका कोई जोड़ नजर नही आता। लोग पैनिक होकर भाग रहे है, विकल्प तलाश रहे है, लेकिन किसी को कोई रास्ता नही सूझ रहा। अगर बात तैयारियों की करें तो तैयारियां होने के बाद भी बेड, आक्सीजन की कमी पड़ रही है। इसी बीच कालाबाजारी का तंत्र सरकारों और मानवता को धता बताते हुए आगे बढ़ गया है। वह 40 रुपये किलो में मिलने वाले संतरे को 120 में बेच रहा है, आखिर उसे मरते हुए लोगों से मुनाफा जो कमाना है।

अपील:

इंसान बनने का प्रयास कीजिये, लाभ कमाने के लिए जीवन पड़ा है, इंसान बनकर दूसरों की की मदद कीजिये, साथ नही जा सकते तो अन्य माध्यमों से मदद कीजिये, अन्यथा ये महामारी अनंत काल के लिए नही है, समय बदलेगा लेकिन आप दूसरों से आंखे नही मिला पाएंगे।

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