Sidharth varadharajan
Sidharth varadharajan|Google image
नजरिया

आखिर विदेशों से अवार्ड लूटने वाले देश की उम्मीदों पर खरे क्यों नही उतरते ?

देश की मीडिया से सवाल करते हुए शिवजीत तिवारी का यह लेख

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

वैसे तो विदेश से खेल में कोई मैडल या पुरुष्कार पाता है तो देश में खुशी की लहर उठ जाती है। ठीक वैसे ही अगर मीडिया में हो तो भी अच्छा लगता है लेकिन जैसे ही आपको कोई पुरुष्कार मिलता है आप घुमा फिरा कर देश की सरकारों को ही कोसने लगते हैं। इस पर समाज का एक वर्ग आपके पुरस्कार पाने की प्रक्रिया और नियत पर सवाल उठा देता है। क्योंकि जनता भी जानती है कि पुरुष्कार पाने का सबसे सरल तरीका क्या है!

ऑफिस-ऑफिस सब जगह होता है:

अगर आप किसी ऑफिस में काम करते हैं या फिर करते रहे हैं तो आपका ऑफिस कल्चर से सामना हो ही चुका होगा। चूंकि ऑफिस में सबसे बड़ा पुरस्कार होता है बॉस का चहेता बन जाना फिर चाहे उसके लिए आपको आपके सहकर्मी की चुगली या बुराई ही क्यों ना करनी पड़े या फिर अपने बॉस की खुशामद दोनो ही तरीके उज्वल कार्यकर्ता का दम घोट देते हैं और जिस तरह से देश दुनिया में पुरस्कार वितरित किये जा रहे हैं उनको देख कर तो यही लगता है कि आजकल पत्रकारिता जगत में भी कमोबेश यही हाल है। आपको दुनिया में पहचान बनानी है तो सरकार की हर योजना हर नीति का विरोध करने की क्षमता होनी चाहिए जो संविधान द्वारा फ्रीडम ऑफ स्पीच के तौर पर विरासत में मिली हुई है। यहाँ यह बताना बेहद आवश्यक होगा कि आप इतना करने के बाद न सिर्फ सुरक्षित रहेंगे बल्कि आपको एक वर्ग के द्वारा इंसाफ का मसीहा बनाकर पेश किया जाएगा और अगर आपकी मनमर्जी के ऊपर सरकार ने आंखे तरेर दी तो यकीन मानिए आप विक्टिम कार्ड खेलकर अपने आप को दुनिया भर में नई पहचान दिला सकेंगें। इसका ताजा नमूना भारत का “द वायर” न्यूज प्लेटफार्म है जो वैसे तो पत्रकारिता जगत का एक अच्छा खासा नाम है लेकिन जैसा कि लोग जानते हैं इनका झुकाव हमेशा से एक पक्ष की ओर ज्यादा रहा है यही कारण है कि जब भी “द वायर” को मौका मिलता है वह सरकार पर सवाल उठाने के नाम पर आरोप लगाने और कार्यवाही होने पर खुद को विक्टिम बताने से नहीं चूकता।

साल 2015 से डॉयचे वेले द्वारा यह सालाना सम्मान मीडिया के क्षेत्र में मानवाधिकार और बोलने की आज़ादी के प्रति प्रतिबद्धता...

Posted by The Wire Hindi on Sunday, May 3, 2020

क्या मिला है पुरस्कार?

दरअसल पिछले दिन 3 मई को वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम डे होता है। होता है मतलब मनाया जाता है जिसके मायने यह हैं कि देश दुनिया में जहां-जहां लोकतंत्र और अन्य तंत्र मीडिया को समाज का महत्वपूर्ण अंग मानते हैं वहाँ समाज में इनके द्वारा किये गए कार्यों को देखा, सोचा, समझा और रिकोग्नाइज किया जाए लेकिन इसी दिन पर दुनिया में तमाम संस्थाएं जो पुरस्कार रेवड़ियों की तरह बाँटती हैं वो इस मौके पर लोगों को लाइमलाइट में लाने की पूरी कोशिश भी करती हैं ठीक वैसा ही कुछ हुआ 3 मई के दिन दरअसल एक संस्था है, “डॉयचे वेले” जिसने 2015 के बाद से मानवाधिकार और फ्रीडम ऑफ स्पीच के नाम पर काम करने वालों के लिए पुरस्कार देने शुरू किये 2020 में कुल मिलाकर यह पुरस्कार 17 लोगों को पूरी दुनिया भर में वितरित किया गया। इस बार इस पुरुष्कार का मुख्य विषय रहा, कि ‘जिन देशों में कोरोना का संकट रहा और वहां के पत्रकारों, संस्थानों ने बंदिशों और उत्पीड़न के बावजूद अपनी बात बुलंद रखी’

आखिर क्या हुआ है उत्पीड़न :

उत्पीड़न का क्या है ये तो समझने की बात है अगर दूसरे शब्दों में कहे तो आतंकी अजमल कसाब भी अपनी फांसी को गलत और निर्भया के दंरिदे खुद को बेकसूर कहते आये हैं। खैर ये सभी केवल उदाहरण के लिए थे, इन मामलों का इस लेख से कोई लेना देना ठीक उसी प्रकार नहीं है, जैसे “द वायर” के संस्थापक संपादक के द्वारा अपने ब्लाग में लिखे गए शब्दों से है।

“द वायर” ने अपने दुखड़े में यह लिखा है कि जब देश भर में लॉक डाउन चल रहा था उसी वक्त उसके कर्ताधर्ता सिद्धार्थ वरदराजन (siddharth varadarajan) के ऊपर उत्तर प्रदेश पुलिस ने कुछ लोगों की शिकायत पर एक मुकदमा पंजीकृत किया और नोटिस लेकर देश की राजधानी दिल्ली पहुँचे। वहां उन्होंने सिद्धार्थ को 14 अप्रैल के दिन अयोध्या में पेश होने का फरमान सुनाया। हालाँकि इस मामले में “द वायर” ने अपने संपादक को बेकसूर और अपनी एक खबर की प्रतिक्रिया को गलत ठहराया। मामला तबलीगी जमात के बवाल और अयोध्या के राममंदिर में 25 मार्च को हुए एक बेहद कम संख्यात्मक आयोजन को लेकर था। शिकायतकर्ता के अनुसार उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के नेता योगी आदित्यनाथ पर आपत्तिजनक टिप्पणी की। हालांकि इस मामले पर “द वायर” द्वारा यह कहा जा रहा है कि यह मामला हमारी एक खबर से जुड़ा हुआ है।

खबर के सुधार का स्क्रीनशॉट कुछ ऐसा है जिस पर बवाल खड़ा हुआ है।

screenshot the wire  new
screenshot the wire new the wire news

दरअसल “द वायर” ने बिना किसी पुख्ता जानकारी के योगी आदित्यनाथ के खिलाफ फेक बयान छाप दिया" कि राम सभी लोगों की कोरोना से रक्षा करेंगे" जबकि ऐसा कोई बयान योगी आदित्यनाथ द्वारा ऐसे किसी संदर्भ में दिया ही नही गया। यह बयान महंत नृत्यगोपाल दास ने भावना आवेश में आकर कहा होगा।

जनता ने एफआईआर की तो जनता जाने :

मामला आमजन की भावनाओं से जुड़ा हुआ है दरअसल मूल तकलीफ इसी बिंदु में छिपी है कि शायद संविधान के द्वारा मिली हुई फ्रीडम ऑफ स्पीच के अधिकारों वाला ब्रम्हास्त्र सिर्फ कुछ चुनिंदा लोगों को मिला हुआ है बांकी लोग अगर कुछ कहते हैं तो वो दूसरों पर सिर्फ और सिर्फ अत्याचार कर रहे हैं।

वरदराजन की पत्नी और दिल्ली वि.वि. में प्रोफेसर नंदनी सुंदर के ट्वीट भी कुछ ऐसा ही कह रहे हैं, एक के बाद एक करीब पांच ट्वीट्स हैं।

तो अगर किसी अयोध्या निवासी व्यक्ति को आपके संपादक की खबर गलत लगी और जो असलियत में गलत थी जिसपर आपको अपनी गलती स्वीकारनी पड़ी, तो उस पर बेचारगी का क्या ?

हालांकि हम यहाँ “द वायर” के संस्थापक संपादक को यह पुरस्कार मिलने पर शुभकामनाएं देते हैं और यह आशा भी करते हैं कि वो भविष्य में तुष्टिकरण और दिखावे की पत्रकारिता को छोड़कर न्यायोचित पत्रकारिता का दामन थामेंगें।

  • डिस्क्लेमर : लेख में प्रयुक्त सभी शब्द वाक्य लेखक के मस्तिष्क की निजी उपज है, इन्हें किसी लाभ, लालच या लामबंदी के द्वारा उत्पन्न नहीं किया गया है और उदय बुलेटिन की राय लेखक से सहमत नहीं हो सकती।

उदय बुलेटिन के साथ फेसबुक और ट्विटर जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

उदय बुलेटिन
www.udaybulletin.com