किसान आंदोलन: कहीं पर निगाहें कहीं पर निशाना, पढ़िए शिवजीत तिवारी की एक खास रिपोर्ट

किसान आंदोलन पर उदय बुलेटिन के स्पेशल एडिटर शिवजीत तिवारी की रिपोर्ट
किसान आंदोलन: कहीं पर निगाहें कहीं पर निशाना, पढ़िए शिवजीत तिवारी की एक खास रिपोर्ट
किसान आंदोलन पर उदय बुलेटिन के स्पेशल एडिटर शिवजीत तिवारी की रिपोर्टUday Bulletin

किसान बेशक अन्नदाता है इसमें कोई दोराय नहीं, किसान जब धरती का सीना फाड़कर उसमे बीज और पौधे रोपता है तब देश दुनिया के मुँह में भोजन का निवाला पहुंचाता है। अगर आप यह भ्रम पाले बैठे है कि किसान सिर्फ ट्रैक्टर, हल, बैल खाद के दम पर फसल को उगा सकता है तो फिर तो किसी महानगर में बैठा आदमी भी किसान बन सकता है। दरअसल किसान का क्राइटेरिया ही बेहद अलग है, किसान खाद के साथ सब्र, मेहनत, उम्मीद और फिक्र के साथ फसल उगाता है तभी कोई फसल सार्थक होती है।

ये बाते तो हुई किसानों की, लेकिन दिल्ली को किसी मराठा फ़ौज की तरह घेरे हुए किसानों का हुजूम देश की राजधानी के रसद को काटने की बात कह चुका है। किसानों द्वारा यह भी कहा जा रहा है कि हमें पता है कि इससे आम आदमी को तकलीफ होगी लेकिन हमारी मजबूरी है, हमे सरकार को समझाना होगा, खैर आंदोलनों के क्या है चलते आये है और लोकतंत्र में आंदोलनों के होना बेहद जरूरी है क्योंकि बिना आंदोलन के शासक निरंकुश हो सकता है, लेकिन इस आंदोलन में काफी कुछ झोल है जिसके बारे में सब जानते हुए भी चुप रह रहे है, कारण क्या है ये तो ज्ञात नही, लेकिन सच्चाई यह है कि यह एक प्रायोजित आंदोलन है, जिसे शुरू भले की किसी मकसद के साथ किया गया हो लेकिन अब यह आंदोलन अपने मकसदों से भटकता हुआ नजर आ रहा है, आम जनता अब दबी ज़ुबान से इस आंदोलन को बेहद हल्के में लेने लगी है, कुछ कारण ज्ञात है जिनके बारे में हम लघु चर्चा करेंगे।

राजनीति का घालमेल:

अगर कोई आंदोलन स्वतंत्र हो या कहे कि निष्पक्ष हो तो उसका असर व्यापक होता है भले ही मांग कितनी भी बड़ी हो लेकिन किसान आंदोलन अब केवल किसानों का आंदोलन नहीं रहा बल्कि इस आंदोलन में भारतीय राजनीति के बुझते चिरागों ने अपनी लौ तेज करने के लिए तीलियाँ सुलगाई। हालांकि देर सबेर होते-होते इसका रंग साफ नजर आने लगा। दरअसल किसानों के आंदोलन की शुरुआत तीन कृषि बिलो को लेकर हुई थी। जिसको लेकर किसान आशंकित थे लेकिन आगे चलकर यह विरोध प्रधानमंत्री और उसके बाद पार्टी और उससे भी कही ज्यादा धार्मिक होता चला गया। इस आंदोलन के मंच से समुदाय विशेष की महिलाओं पर टिपण्णी की जाने लगी। राजनीतिक दल सुबह शाम ली जाने वाली दवाओं की तरह ट्वीट करने लगे और आंदोलन की शुरुआत से ही यह लगातार चल रहा है जो आज तक बदस्तूर जारी है।

इस आंदोलन की आड़ में विपक्ष अपनी खुन्नस निकालने के लिए प्रधानमंत्री के ऊपर निशाने लगा रहा है, और विरोध का स्तर यहीं तक सीमित नही रहा बल्कि विरोध के चलते उन उद्योग घरानों को भी देश के सामने एक मुजरिम की तरह पेश किया जा रहा है जो लगातार देश की प्रगति के लिए कार्यरत है।

आखिर क्षेत्र विशेष का किसान क्यों:

अगर इस आंदोलन की तह तक जाए तो जानकारी मिलती है कि इस आंदोलन में पंजाब और हरियाणा का किसान उद्देलित है। इसके साथ ही पश्चिम उत्तर प्रदेश का कुछ हिस्सा इस आंदोलन में अपना समर्थन दे रहा है लेकिन इसके पीछे एक अपवाद नजर आता है, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना, असम, मिजोरम और भारत के कई अन्य राज्यों के किसान इस आंदोलन में शामिल क्यों नही है। अगर शामिल हुए भी थे तो उन्होंने सरकार की मंशा को समझकर अपने विरोध को वापस ले लिया है।

दरअसल इस मामले में एक बेहद रोचक पेंच है पूरे देश मे एमएसपी की खरीद कुछ उत्पन्न फसलों का 10 प्रतिशत से भी कम हिस्सा सरकार द्वारा निर्धारित एमएसपी की दर से खरीदा जाता है, लेकिन पंजाब में यह कहानी बेहद उल्टी है, अकेले पंजाब में कुल उत्पादित फसलों का 90 प्रतिशत के आसपास का हिस्सा एमएसपी के तहत खरीदा जाता है, तो जाहिर सी बात है कि एमएसपी के बंद होने की आशंका के कारण पंजाब के किसान ज्यादा आंदोलित है, हालांकि केंद्र सरकार इस बारे में पहले भी कई बार इस मामले पर अपना रुख साफ कर चुकी है कि एमएसपी बंद होने का सवाल ही नही उठता, सरकार इसको गारंटी के तौर पर लिखित देने के लिए तैयार है।

सरकार बात करने का प्रयास कर रही है लेकिन किसान पहले से ही बात न मानने के मूड में है:

अगर सरकार की मंशा की बात की जाए तो इस आंदोलन में सरकार का रुख शुरुआत से ही खुला रहा है दरअसल सरकार ने तीनों कृषि बिलो की वापसी पर अपना स्टैंड पहले ही किलियर कर दिया है। सरकार ने किसानों की सबसे बड़ी आशंका को दूर करते हुए बताया कि सरकार ने न तो कभी एमएसपी को बंद करने के बारे में सोचा है ना ही इसे कभी भी बंद किया जा सकेगा, सरकार ने तो एमएसपी को न बंद करने की बात लिखित में देने की बात भी कही है, और सरकार ने किसानों को आश्वासन दिया है वह हमेशा किसानों के हितों को सर्वोपरि मानती आयी है, लेकिन अगर फिर भी किसानों को यह लगता है कि उक्त कृषि बिल से किसानों के भविष्य को कोई खतरा है तो वह उसपर चर्चा करके सुधार करने का विकल्प खोले बैठी है, लेकिन अगर किसान आंदोलन की मनोस्थिति को देखे तो वह सरकार के किसी अनुरोध पर ध्यान देने से भी गुरेज कर रहा है, सरकार द्वारा दिए गए प्रस्ताव को लगातार ऐसे ठुकराया जा रहा है मानो किसान पहले से यह निश्चित करके आये है कि उन्हें इन बिलो को केवल वापस कराना है। बाँकी इन बिलो में ऐसा क्या है जिससे उन्हें खतरा है या समस्या है उन्हें यह ज्ञात भी नही।

क्या है आंदोलन का सार:

अगर इस मामले में सरकार और किसानों की बातों को सुने तो इस मामले में सरकार काफी झुकी हुई नजर आती है जबकि किसान शुरुआत से ही अपनी बात पर अडिग दिखाई देते है, हालांकि ये मामला अब केवल हरियाणा, पंजाब और कुछ उत्तर प्रदेश के किसानों के बचा हुआ है क्योंकि जिस वक्त हरियाणा और पंजाब का किसान दिल्ली की तरफ कूच कर रहा है ऐसे वक्त में बुंदेलखंड का किसान अपने खेतों को अन्ना पशुओं से बचाने, खेत मे पाला लगने , सिंचाई करने के तमाम उद्देश्यों से खेतों की मेड पर अपने हाड़ ठिठोर रहा है।

उसे न तो दिल्ली को घेरने की फुर्सत है ना ही सरकार को अपने क़दमों पर झुकाने की।

डिस्क्लेमर: लेख में लिखे गए विचार लेखक के निजी है, उदय बुलेटिन का इनसे सहमत होना आवश्यक नही है

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