Rahat Indori and Irrfan Khan
Rahat Indori and Irrfan Khan|Uday Bulletin
नजरिया

राहत इंदौरी और इरफान: दोनो साहित्य और कला के पुजारी लेकिन संवेदनाओं में इतना अंतर क्यो?

जाहिर है बात विवादित है लेकिन लिखना जरूरी है ताकि मन की बात सामने निकल कर आये।

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

शायद राहत जी का जीवनकाल इरफान खान से कई गुना ज्यादा था, रही बात पहचान की तो दोनों लगभग समान जनता के दिलो पर राज करते थे। दोनों की दुखद मृत्यु हुई लेकिन आखिर ऐसा क्या हुआ जिसकी वजह से दोनो प्रशिद्ध लोगों की मौत पर संवेदनाओं में इतना अंतर क्यों ?

इस अंतर को जानने के लिए हमें दोनो लोगों के अतीत में जाना होगा, सारा राज और रहस्य यहीं पर खुद को समेटे बैठा नजर आएगा।

दरअसल राहत इंदौरी ने अपनी शायरी और मुशायरे की शुरुआत अपने शुरुआती दौर में ही शुरू कर दी लेकिन उनका नजरिया हमेशा से विद्रोही रहा। वहीँ इरफान ने अपनी जगह राष्ट्रीय नाट्य अकादमी से चलकर फिल्मों में बनाई। जिसके फलस्वरूप शुरुआत में उन्हें बेहद हल्के और छोटे रोल मिले लेकिन जो कलाकार अपनी कला के साथ न्याय करता है वह छुपता कहाँ है सो कुछ वैसा ही हुआ जो लगभग हर महान कलाकारों के साथ होता आया है उन्हें आरंभ में हल्के फुल्के धक्के खाने के बाद उन कलाकारों में शुमार किया जाने लगा जो बिना किसी नाच गाने और फूहड़ता के भी कम बजट की फिल्मों को बड़ी कमाई का जरिया बना सकते थे।

इरफान का स्वभाव भी बेहद विद्रोही था, फिर चाहे वह खुद के पिता के साथ दकियानूसी सोच का विरोध करना हो या फर्जी के उन्मादी धार्मिक विचारों का विरोध करना हो। इरफ़ान कभी भी पीछे नहीं हटे।

बस यही कारण है कि राहत इंदौरी और इरफान को एक दूसरे व्यक्तित्व से जुदा करता है

राहत इंदौरी की एक शायरी जो उनके व्यक्तित्व के साथ जोड़कर देखी जा रही है। इस शायरी में राहत के द्वारा प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के घुटनो के ऑपरेशन को लेकर तंज कसा गया था

राहत साहब का असर साहित्य के अलावा राजनीति में भी रहा जो कहीं न कहीं धार्मिक एंगल प्रस्तुत करता है। हालांकि यहां यह भी बताना सही रहेगा कि इरफान ने राजनैतिक परिदृश्यों को फिल्मो में जमकर उतारा लेकिन सबसे बड़ी बात रही कि इरफान ने किसी राजनेता को नहीं छोड़ा। अगर उनका विरोध था तो निर्वेद था बिना किसी लाग लपेट के और यही सोच इरफान की छवि को ऊंचा उठाती गयी। वहीँ राहत इंदौरी अपने समुदाय विशेष के प्रति झुकाव को लेकर कई बार आलोचनाओं का शिकार हुए साथ ही हाल ही में भारत मे सीएए के विरोध में जो कथा पटकथा लिखी लिखाई गयी उसको लेकर भी वह लोगों के निशाने पर आ गए। नतीजन यही कारण समझ मे आता है कि राहत साहब अपनी बात तो बेबाकी से कह पाते रहे लेकिन शायद कहीं कुछ कोर कसर रह गयी जिसकी बदौलत उनके जाने के बाद उन्हें धड़ो में बांटने की कोशिश हुई।

अब आते है असल सवाल पर की क्या ये बंटवारा सही है?

बिल्कुल नहीं, चूंकि हर व्यक्ति का अपना व्यक्तित्व है इरफान अपनी जगह है और राहत अपनी जगह! दोनों के अपने-अपने अलग अलग मुकाम हैं। दोनों ऊंचाइयों पर काबिज हैं लेकिन अगर तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो यह भी सच है कि भले ही दोनो के इंतकाल में शोक संदेशों का जमावड़ा हुआ हो लेकिन कहीं न कहीं इरफान इस मामले में आगे नजर आते हैं लेकिन इसकी वजह से यह नहीं कहा जा सकता कि राहत साहब किसी मामले में इरफान से कमतर हो जाते है लेकिन चूंकि तथ्यों को नकारा नहीं जा सकता इसलिए यह भी सच माना जायेगा कि जहाँ राहत साहब के मामले में जनता के दो फाड़ हुए जाते है वहीँ इरफान ने लगभग सबकी आंखों में आंसू लाये थे।

यहाँ इस बात को भी कहना जरूरी है कि किसी इतने बड़े व्यक्तित्व के जाने के बाद उनकी बातों को लेकर टीस रखना कहीं न कहीं नही वैचारिक कुंठा को दर्शाता है। हर व्यक्ति के अपने मतभेद होते है निजी जीवन में झुकाव उलझाव होता है। राहत साहब भी उससे अछूते नहीं रह पाए तो क्या गुनाह है लगभग सब होते हैं।

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उदय बुलेटिन
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