pulitzer award winning photographs
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नजरिया

कहीं न कहीं इन तश्वीरों के नाम से पुलित्जर का नाम खराब होता है, अब तो शंका होने लगी है

पुलित्जर नहीं जानते ? अरे जैसे फिल्मों में ऑस्कर, विज्ञान और अर्थशास्त्र के साथ अन्य मामलो में नोबेल वैसे ही फोटो पत्रकारिता के लिए होता है पुलित्जर।

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

पुलित्जर पुरस्कार पाने का सपना हर फोटो पत्रकार का होता हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी फोटो जर्नलिस्ट हैं जो इस पुरस्कार को पाने के लिए अपनी सरकार अपने देश की मिट्टी पलीत करने से भी परहेज नहीं करते।

पुलित्जर मिला भारत मे बवाल कट गया:

जम्मू कश्मीर के कुछ पत्रकार साहब है जिन्हें पत्रकारिता जगत में बेस्ट फीचर फोटो के लिए पुलित्जर पुरस्कार थमाया गया है। फोटो क्या है एक जनाब किसी खतरनाक अंतर्राष्ट्रीय बॉलर की भांति रनअप लेकर उचकते होकर पुलिस वाहन पर पत्थर भांज रहे हैं। दूसरी में जम्मू कश्मीर की प्रदर्शकारी महिलाएं बुर्के सहित पारंपरिक वेशभूषा में लाठियां लेकर पुलिस और सेना पर आक्रमण करने जा रही है। तीसरी फोटो में महिलाओं का समूह किसी आतंकी के जनाजे में अल्लाह को याद करती हुई नजर आ रही है और चौथी में किसी खंडहर को निहारते स्थानीय निवासी जो शायद किसी आतंकी के एनकॉउंटर के बाद ऐसा हुआ होगा। किसी तश्वीर में सैनिक लोगों पर आभासी अत्याचार करते हुए दिख रहे है तो उसी के बगल में इंसाफ पसंद लोग इबादत करते नजर आ रहे है। कहीं पर कर्फ्यू का नजारा तो कही होते हुए ब्लास्ट का और जाने कितने ऐसे ही फोटोज। अब जब स्थानीय फ़ोटो पत्रकार चन्नी आंनद डार यासीन और मुख्तार खान को इन चित्रों के लिए पुलित्जर मिला तो लोगों को दिलचस्पी बढ़ी कि आखिर कुछ तो होगा जिसकी वजह से इन्हें रिकोग्नाइज किया गया होगा। लेकिन दरअसल इन चित्रों में रंगों के साथ बेहद साइलेंट जहर घोलकर लगाया गया है ताकि लोग इसे देख-देख कर जहर वमन करना सीख जाए।

यह भी वह तश्वीरें है जिनके लिए पुलित्जर दिया गया:

Photojournalism awards pulitzer
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आखिर क्या है मकसद ? :

मकसद बेहद आईने की तरह साफ और धवल है, जिसमें कोई भी ऐसी धूल नहीं है कि आपकी सोचने की क्षमता को प्रभावित करेगा बल्कि इसका साफ साफ यह मकसद है कश्मीर के मुद्दे पर भारत का पडला जो लंबे समय तक मजबूत था उसे पाकिस्तान और वाम समर्थित लोगों द्वारा कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है लेकिन सैन्य बल द्वारा कमजोर किये जाने के बाद भी भारत बड़ी मजबूती के साथ खड़ा नजर आता है। चूंकि मामला अब सीधे-सीधे युद्ध से नहीं जीता जा सकता इसलिए पाकिस्तान परस्त लोगों के द्वारा दूसरी विधाओं से देश की छवि को धूमिल करने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि इस कृत्य में ये लाबी कितना सफल हुई है ये देखना होगा।

Indian Army
Indian Army Twitter Screenshot

मामला सोच और विचारधारा का है, दरअसल इस तरह की मानसिकता रखने वाले लोग बेहद शांत प्रकृति के होने का सुबूत तो देते है लेकिन जैसे ही मौका मिलता है वह अपना फन निकाल कर डसने से परहेज नहीं करते। शायद यही कारण है कि आप देश को अखंड बनाये रखने की कोशिश करने वाली सरकार की पीठ पर हजार बार खंजर घोप कर खुद को ऐसा पत्रकार साबित करने की कोशिश करते है जिसकी वजह से आपको पत्रकारिता का पुलित्जर पुरुस्कार भी मिल जाता है। ठीक ऐसा ही एक पुरुस्कार भारत के नामी गिरामी और हर मुद्दे पर दो राय रखने वाले पत्रकार को मिल चुका है,यहाँ नाम बताने की जरूरत नहीं है।

राहुल गांधी ने भी इस पुरस्कार को पाने वाले व्यक्तियों को निजी तौर पर बधाई दी। हालाँकि उनके इस कृत्य पर भारी आलोचना मिल रही है और उनकी इस बधाई को तुष्टिकरण के तौर पर भी देखा जा रहा है।

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क्या पुलित्जर पुरस्कार केवल इन्हीं तश्वीरों के लिए है ?

मामला अगर केवल फोटोग्राफी के लिए है तो क्या आपको किसी ऐसी फोटोग्राफी पर पुरस्कार मिलने की घटना सामने आई है जो बाढ़ में मरते हुए कश्मीरियों को बचाता हुआ फौजी अपनी जान दांव पर लगा देता है या फिर किसी आतंकी को घेरते वक्त उन्मादी धार्मिक भीड़ के पत्थर खाता है?

डिस्क्लेमर : आलेख में लिखे गए विचार पूरी तरह से लेखक शिवजीत तिवारी के हैं। उदय बुलेटिन इस आलेख से पूरी तरह सहमत नहीं हो सकता।

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उदय बुलेटिन
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