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Sumitranandan Pant
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नजरिया

सुमित्रानंदन पंत ने महाप्राण निराला को लिखा पत्र, बेहद निजी होने के बाद भी आज चर्चित

मित्रता और स्नेह की कहानी

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

Summary

कभी-कभी प्रसिद्धि और शोहरत आपके परिवारिक संबंधों को खा लेती है, मित्र उंगलियों पर गिने जा सकते है या फिर हो ही ना क्योंकि कभी-कभी सबसे ज्यादा गुरूर दोस्तों पर ही निकलता है, और फिर व्यक्ति अकेले ही घिसटता रहता है, हालांकि महान लोगों के चरित्र बेहद महान होते है, वो इतने विस्तृत होते है जिनका मापन आज के संदर्भ में कर ही नही सकता, बिना किसी तकनीकी सहायता के  प्रेम स्नेह और मान मनोउववल इस कदर हो सकती भला ?  सुमित्रानंदन पंत को प्रकृति, झरने, पौधों का कवि इसीलिए कहा जाता है क्योंकि वो सौंदर्य और भाव के कवि है, एक ओर जहाँ प्रेम का कवि है वही दूसरी ओर सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जिसमें लेखन की जबरदस्त क्षमता, जिसमे कविता भी है गद्य भी है और राम की शक्तिपूजा भी, वह गांधी से हिंदी के लिए लड़ भी जाता है और उसके लिए सक्षम तर्क भी देता है”

एक पत्र जो हर समय सोशल मीडिया में घूम जाता है लोग अनायास ही पढ़कर या बचकर निकल जाते है, पढ़ने वालों का तो ठीक है बचकर निकलने वाले के लिए एक चेतावनी, अगर उन्होंने इन दो महान विभूतियों को नही पढ़ा तो आपका साहित्य न सिर्फ बेकार है बल्कि आपमे मानवता और स्नेह नाम के विटामिन की कमी है, ये पत्र आपमे एक ऐसे तत्व का संचार करेगा जिसका उल्लेख किसी भी खाद्य श्रखला के चैप्टर में नही है।

पंत जी का निराला जी को पत्र:

यवर निरालाजी,

आप मुझे पत्र क्यों नहीं लिखते? मैंने एक बार श्रीयुत मतवाला-संपादक जी से आपका पता भी पूछा था, पर तब आप अपने गाँव में थे।

कल श्रीयुत शांतिप्रिय द्विवेदीजी मुझे मिले उन्होंने आपके विषय में चर्चा की। मैं बहुत चाहता हूँ कि आप मुझे अपने कृपापात्रों से बराबर आभारी करते रहें। आपके पुराने पत्र कल मैंने पढ़े, वे कैसे स्नेहपूर्ण हैं! क्या आप अब मुझसे नाराज हैं। मैंने ऐसा क्या अपराध किया, निरालाजी? क्या आप मुझे बतलायेंगे? यदि मुझसे अनजान में कुछ हो भी पड़ा तो क्या आप मुझे क्षमा न करेंगे?

पिछले वर्ष मेरा मानसिक स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहा, अब भी अधिक अच्छा नहीं, इसीलिए मैं आपको न लिख सका-मैंने कोई नवीन कविता भी परिवर्तन के बाद नहीं लिखी।

श्रीयुत शांतिप्रिय द्विवेदीजी कहते थे कि आपका स्वास्थ्य भी अच्छा नहीं रहता, आप बहुत दुबले हो गये हैं। आप क्यों अपने स्वास्थ्य को नहीं सुधारते?  खूब तनदुरुस्त तथा सुंदर बन जाइये निरालाजी, अपना खूब यत्न कीजिये। आप कभी प्रयाग भी नहीं आते, आपके दर्शन कब होंगे?

मैं एप्रिल के अंतिम सप्ताह तक यहाँ हूँ, फिर अल्मोड़ा चला जाऊँगा, अगस्त में फिर लौट आऊँगा। आजकल इंडियन प्रेस में मेरी कवितायों का एक संग्रह छप रहा है, नाम 'पल्लव' है। एप्रिल के अंत तक प्रकाशित हो जायेगा।

आप आजकल क्या करते हैं?  स्वास्थ्य आपका कैसा है? आप मेरे पत्र का उत्तर तो दोगे? मुझे अवश्य पत्र लिखा कीजिये निरालाजी, आप बड़े अच्छे पत्र लिखा करते थे, न जाने फिर क्यों नाराज हो गए?

आपका पत्र पाकर मैं बड़ा प्रसन्न रहूँगा, आप अवश्य लिखिए, शीघ्र ही लिखिए- आपकी कविताएँ कभी-कभी 'मतवाला' में पढ़ने को मिल जाती हैं-क्या आप ही के शब्दों में लिखना पड़ेगा -जागो फिर एक बार !

आप वैसे ही स्नेहपूर्ण, कृपापूर्ण पत्र मुझे लिखा कीजिए, मुझे उनकी बड़ी जरूरत है। मैं आपका कृतज्ञ रहूँगा।

अपना यत्न कीजिए , पत्र अवश्य दीजिए।

और आपको क्या लिखूँ ,मुझे विश्वास है आप मुझ पर करेंगे

मैं अच्छा हूँ।

                          आपका

                          सुमित्रानंदन पंत

                          31 मार्च 1926,प्रयाग

इस पत्र में कुछ भी नही है, एक कलम के पुजारी का दूसरे कलम के पुजारी का निवेदन, स्नेह, और वो सबकुछ है जो एक मित्र, एक स्नेही के बीच होता है, हमे आज के भागमभाग वाले जीवन में इनसे कुछ सीख लेना चाहिए।

इसी माह के बीते 15 अक्टूबर सन 1961 को सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी इस देह को त्यागकर अपने शब्दों में विलीन हो गए थे, उनके पुण्य दिवस पर उनको नमन।