मिलाद उन नबी और बारावफात, दोनों के अपने-अपने मायने हैं

मुहम्मद साहब ने मुसलमानों को सिर्फ दो त्यौहार मानाने की सिख दी थी, ईदुल फितर और ईदुल अजहा फिर मिलाद-उन-नबी और बारावफात क्यों मनाया जाता है? आइये जानते है ऐसा क्यों है
मिलाद उन नबी और बारावफात, दोनों के अपने-अपने मायने हैं
Eid Milad-un-NabiGoogle Image

मिलाद-उन-नबी (Eid Milad un nabi 2020) और बारावफात इस्लामी तारीख में बहुत बड़ी अहमियत रखते है, हालांकि नाम अलग-अलग होने के बावजूद ये दिन एक ही है, लेकिन अगर शाब्दिक हिसाब से देखे तो एक दिन होने के बावजूद भी दोनो शब्दों का अर्थ एक दूसरे से बेहद उल्टा नजर आता है।

दरअसल मिलाद-उन-नबी का मतलब नबी अर्थात मुहम्मद साहब के मिलाद अर्थात जन्म से होता है वहीँ बारा वफात का आशय मुहम्मद साहब के इंतकाल से है, अगर तारीखी इतिहास पर नजर डाले तो 571 ईस्वी की बारहवीं तारीख को पैगम्बर मुहम्मद साहब पैदा हुए हालाँकि यह भी एक तारीखी घटना है कि उनका इंतकाल भी इसी दिन यानी कि रबी उल-अव्वल की बारहवीं तारीख को हुआ, मुस्लिम समुदाय के अलग-अलग हिस्सों में इस त्योहार को अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है।

मिलाद-उन-नबी:

जैसा कि मिलाद-उन-नबी अपने आपको शाब्दिक रूप से परिभाषित करता है कि यह पैगम्बर मुहम्मद साहब का जन्म का दिन है तो जाहिर सी बात है कि नबी के आने के बाद ही इस दुनिया मे मुसल्लम ईमान की ख्याति हुई इस प्रकार से मुस्लिम समुदाय का एक हिस्सा इसे बेहद जोशो खरोश के साथ जलसे करके मनाता है। इस दौरान पैगम्बर के यशोगान इत्यादि शामिल होते है।

इस त्योहार के दौरान मुहम्मद साहब के मिलाद उन नबी को मनाने वाले लोग जुलूस इत्यादि को निकालते हैं। लेकिन इस मामले में एक फेर यह भी है कि मिलाद-उन-नबी को केवल मुस्लिम समुदाय में शिया समुदाय इस दिन बेहद हर्षोल्लास से मनाता है क्योंकि शिया समुदाय इसे बेहद खुशी का दिन मानते है, वहीँ इससे उलट सुन्नी समुदाय नसीहत का दिन मानने पर जोर देते हैं।

बारावफात:

अगर बारावफात की बात करें तो यह दिन है मुहम्मद साहब के इंतकाल का जिस दिन मुहम्मद साहब इस दुनिया से रुख़सत हुए, यही कारण है कि सुन्नी समुदाय इसे हर्ष और उल्लास का पर्व न मनाकर बेहद सादगी से मनाते है और दुनियाभर में मुहम्मद साहब के दिये गए वचनों का स्मरण कराते है, लेकिन इसमें भी एक विशेषता यह है कि सुन्नी समुदाय में आने वाले बरेलवी समुदाय भी इसे हर्षोल्लास से मनाता है, इस दिन में सुन्नी समुदाय के लोग मस्जिदों में जाकर मुहम्मद साहब के द्वारा दिये गए निर्देशों का अनुसरण करके लोगों से इस बारे में चर्चाएं करते हैं।

वहाबी और सलफ़ी इसे नहीं मानते:

हालाँकि सऊदी जहाँ पर पैगम्बर साहब और उनके परिजनों की कब्रें उपस्थित रही हैं वहां मिलाद उन-नबी और बारावफात को सिरे से नकारा जाता रहा है, दरअसल सऊदी में इस्लाम का वहाबी रूप देखने को मिलता है और वहाबी में मजार और कब्र इत्यादि को बुतपरस्ती में गिना जाता है और बुतपरस्ती इस्लाम मे न सिर्फ नाजायज है बल्कि इस तरह के कृत्यों को करने वाले को मुशरिक अर्थात "काफिर" की श्रेणी में रखा जाता है।

यहां आपको बताते चले कि जब दुनियाभर में मुस्लिमों का आना जाना सऊदी हुआ तो लोगों ने मुहम्मद साहब और उनके परिजनों की कब्रों पर जाकर जियारत करना शुरू किया लेकिन वहाबी विचारधारा के चलते मुहम्मद साहब के परिजनों की कब्रों को उनकी जगह से पहले तो स्थानांतरित किया गया, साथ ही कुछ अपुष्ट जानकारी के अनुसार उन्हें नष्ट कर दिया गया। इसके पीछे वहाबी विचारधारा का तर्क यह था कि मुस्लिमों का असली उत्थान मुहम्मद साहब के आने के बाद ही हुआ इसलिए इससे पहले के उनके परिजन मुशरिक की श्रेणी में आते हैं।

मान्यताएं जो भी हो 29 अक्टूबर से लेकर 30 अक्टूबर को होने वाले पर्व पर उदय बुलेटिन सभी मुस्लिम धर्मावलंबियों को शुभकामनाएं प्रेषित करता है।

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उदय बुलेटिन
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