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नजरिया

जामिया का बवाल, गर्म तवे में रोटियां कोई और सेक गया ! 

वो कहते है न कि जब आग लगी है तो तमाम फ़ुरसतिया लोग हाँथ सेंकने आ जाते है, ठीक वैसा ही कुछ बवाल दिल्ली के जामिया विश्वविद्यालय में हुआ, फिर क्या था करे कोई और भरे कोई । 

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

Summary

दिल्ली का जामिया विश्वविद्यालय इलाका, जहाँ कुछ समुदाय विशेष के लोग सरकार के एक बिल का विरोध करते हुए बढ़ रहे थे उसी के साथ-साथ जामिया विवि में पढ़ने वाले छात्र विरोध प्रदर्शन के साथ आगे बढ़ने लगे। विरोध का शांतिपूर्ण प्रदर्शन तो तब तक ठीक था जब तक प्रदर्शन की जगह पर भीड़ की तरफ से पुलिसकर्मियों पर पत्थर नही फेंके गए, और रास्ते मे खड़ी हुई बसों पर लाठी डंडे नही चलाये गए।यात्रियों से भरी बसों पर उत्पातियों द्वारा आग लागई गयी और पुलिस द्वारा भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पारंपरिक दंगा और भीड़ नियंत्रक प्रणाली जिसमे आँसू गैस गोले प्रयोग किये गए, नतीजन पुलिस को मजबूर होकर लाठियां भी भांजनी पड़ी।

भीड़ विवि में घुसी तो पुलिस गुस्से में घुसकर दंगाइयों को पकड़ने लगी :

जैसे ही प्रदर्शनकारियों की भीड़ जामिया विश्वविद्यालय के अंदर पहुंची छात्रों की आड़ में कुछ पूर्व अपराधियों ने पुलिस पर पत्थर फेंकने शुरू किए, नतीजन पुलिस ने उक्त लोगों को कब्जे में लेने के लिए त्वरित कदम उठाने के तहत यूनिवर्सिटी परिसर में जाने का प्रयास किया और पुलिस इसमें सफल भी हुई। इसके बाद पुलिस ने विश्वविद्यालय परिसर के अंदर जाकर पत्थर फेंकने वालों समेत छात्रों को अपने निशाने पर लिया और फिर वही हुआ जिसके लिए भारतीय पुलिस जानी जाती है।

छात्रों समेत पत्थर फेंकने वाले लोगों पर आंसू गैस समेत अन्य दंगा नियंत्रण हथियारों का प्रयोग किया और कुछ लोगों को पुलिस की लाठियों का सामना करना पड़ा जिससे वो गंभीरता के साथ घायल भी हुए।

छात्रों के साथ पुलिसकर्मी भी घायल हुए :

पूरे देश मे दिल्ली पुलिस के द्वारा जामिया विश्वविद्यालय के अंदर घुसकर छात्रों समेत अन्य लोगों के पीटने को लेकर तीखी प्रतिक्रिया आ रही है जिसमें सिनेमा जगत के बड़े नामचीन चेहरे और अन्य राजनैतिक पार्टियां सरकार और दिल्ली पुलिस के सामने विरोध प्रदर्शन करते नजर आ रहे है। लेकिन इस विरोध के बाद भी किसी ने यह पूछने की जहमत नहीं उठायी कि आखिरकार पुलिसकर्मी जो पत्थरो से गंभीर रूप से चुटहिल हुए है उनकी वेदना समझने का कार्य कौन करेगा? क्या जिन पुलिसकर्मियों ने इस प्रदर्शन के दौरान अपने अंगों पर पत्थर खाये वो कम चोट देने वाले थे ? या उन्हें इस प्रकार के पत्थरों से चोट नहीं लगती।

मामला छात्रों का नहीं राजनैतिक था, छात्र तो चक्कर मे पिस गए :

दरअसल इस मामले को लेकर छात्रों ने प्रदर्शन किया वो बेहद सामान्य रहा लेकिन अचानक इसमे हिंसा जैसी वारदातों को किसने रखा? कुछ सूचनाओं के हिसाब से जामिया विश्वविद्यालय में कुछ फर्जी छात्रों के नाम और परिचय पत्र भी बरामद किए गए जिनपर अन्वेषण किया जा रहा है। इस प्रकार से अगर देखा जाए तो ये मामला राजनैतिक पूर्वाग्रह से प्रेरित माना जा सकता है। अगर इस मामले में यह कहा जाए कि राजनैतिक पार्टियां चाहे वह सत्ता की हो या विपक्ष की हमेशा मौके की तलाश में रहती है और इस बार मौका किसी विपक्षी दल के पास था ( यहाँ हम किसी पार्टी विशेष का नाम उल्लेखित नहीं करना चाहते ) सो उन्होंने इस मामले को हिंसात्मक रूप से टेकल करने का सुझाव दिया और किसी हद तक वह सफल भी रहे जिसका परिणाम जामिया जैसा बवाल हुआ ।

अफवाहों का बाजार अभी भी गर्म है :

जनाब चाहे मीडिया हो या सोशल मीडिया सब जगह तर्कों को ताक पर रखकर मामलों को हाइप करके दिखाया जा रहा है। एक आईएएस अधिकारी है टीना डाबी तेजतर्रार है और जनता के बीच अच्छी खासी पहचानी जाती है और रैंक के हिसाब से काफी फेमस है, अफवाह बाजो ने उन्हें भी नही छोड़ा। टीना डाबी खान जैसे नामों से फेक प्रोफ़ाइल बनाकर सरकार के बिलों जैसे सिटीजन एमेंडमेंट बिल और एनआरसी को लेकर भ्रांतियां फैलाई गई। ताकि समाज मे वैमनस्यता पैर पसार सके हालाँकि जब मामला टीना डाबी के पास खुद फैला तो उन्होंने उसके बारे में शिकायत दर्ज कराई ताकि समाज को इस प्रकार के बवाल से बचाया जा सके और इस मामले को लेकर टीना डाबी ने फेसबुक पर खुद पोस्ट डाली।

You have heard my critics, here is my side of the whole story. Sharing the TED Talk which I had delivered at Hansraj College, Delhi University recently. https://youtu.be/md4wAywgDEw

Posted by Tina Dabi on Monday, October 22, 2018

पुलिस एकदम से गलत नहीं हो सकती, शायद मौके की नजाकत ने उन्हें मजबूर कर दिया :

आखिर पुलिस भी इंसान ही है उन्हें भी दया, करुणा, क्रोध आता है वो वास्तव में सरकारी इच्छाओं और अधिकारियों के निर्देशों के वश में होते है, और ऐसा कई बार होता है कि पुलिस को न चाहते हुए भी वह करना पड़ता है जो ठीक नहीं है। लेकिन अगर सीधी-साधी गाय को भी लगातार मारेंगे तो एक बार वो भी पलट कर मारेगी ठीक ऐसा ही कुछ दिल्ली पुलिस के साथ हुआ अन्यथा नीचे दिल्ली पुलिस की पीस मीटिंग्स के मामले है जिन्हें आप खुद देख सकते है।

जितना कष्ट छात्रों के लिए है उतना पुलिस के लिए भी :

जिन छात्रों को इस विरोध में पुलिस के द्वारा प्रताड़ित होना पड़ा है उनके लिए मुझे कष्ट है लेकिन उसके साथ मुझे कष्ट उन पीड़ित पुलिसकर्मियों के लिए भी है जिन्हें उन्मादियों ने कानून और नियमों की आड़ लेकर पत्थर बरसाए।

  • नोट : उक्त विश्लेषण में व्यक्त किये गए विचार लेखक के निजी विचार है।