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Bollywood movies impact on Society
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नजरिया

फ़िल्मकार फिल्मों में अंग प्रदर्शन और हिंसा से समाज को क्या देना चाहता है?

फिल्मों में हिंसा और अंग प्रदर्शन समाज को कौन सी दिशा दिखाता है? फ़िल्मकार ऐसी फिल्मों से समाज को क्या संदेश देना चाहता है?

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

Summary

किसी महान आदमी ने कहा था कि फिल्म समाज का आईना होती है, फिर किसी ने कहा कि फिल्म समाज को दिशा देने का काम करती है, आजकल फिल्मस्टार समाज के मुद्दों पर अपनी मुखर राय रखने लगे है, लेकिन जरा ठहरिए! सोचिए कि अगर फिल्में समाज को संदेश दे सकती है तो जहर भी घोल सकती है, नमूने आपके सामने है, खोज डालिये।

आजकल फिल्म छपाक को लेकर बड़े चर्चे है, दीपिका पादुकोण अभिनीत इस फ़िल्म में एक एसिड अटैक सर्वाइवर को लेकर सत्य कहानी दिखाई गई है, वो बात अलग है कि फ़िल्म की प्रोड्यूसर और लीड एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण की निजी वजहों से फ़िल्म को टिकिट बेचने के लाले पड़ रहे है लेकिन सच्चाई यह है कि फ़िल्म में एक बहुत अच्छा सन्देस दिया गया है और जागरूकता फैलाने का काम किया गया है, लेकिन इन समाज संदेश प्रसारक फिल्मों की साथ साथ उन फिल्मों का जिक्र करना भी जायज है जिन्होंने संदेशों को तार तार कर दिया और फिर भी लोगो ने इसे हांथो हाँथ लिया।

कबीर सिंह :

अभी हाल में ही आयी फ़िल्म "कबीर सिंह" ने कमाई और एक्टिंग के नाम पर झंडे गाड़ दिए फ़िल्म में एक ऐसे योग्य सर्जन की कहानी है जो पागलपन की हद में जाकर भी योग्य डॉक्टर ही रहता है और उसका प्रेम एक स्तर पर जाकर विकृत हो जाता है। फ़िल्म के कई हिस्सों पर वह अपनी प्रेमिकाओ के ऊपर हाँथ उठाने से नहीं चूकता, और ऐसे तमाम दृश्य है जो नारी को मात्र उपभोग की वस्तु मानकर रचे गए है, आखिर स्वस्थ समाज मे एक नशेड़ी और चरित्रहीन व्यक्ति नायक कैसे हो सकता है।

क क क किरन (डर):

आपको शाहरुख खान और जूही चावला, सनी देओल अभिनीत डर फ़िल्म का पूरा किस्सा याद होगा, कि कैसे एक सनकी आशिक अपने एक तरफा प्यार में हिंसा को अंजाम देता है, और सो काल्ड प्रेमिका को अपनी जागीर समझ कर जूही के ऑन स्क्रीन पति सनी देओल पर कातिलाना हमला करता है, हालांकि बाद में अपनी हरकतों की वजह से मारा जाता है, आपको भरोसा नहीं होगा ऐसा गंदा संदेश देने वाली फिल्म अपने समय की ब्लॉकबस्टर फ़िल्म साबित हुई थी।

काशी का छोरा जो जेएनयू को बनारस ले आया :

धनुष, जोकि मेगा सुपरस्टार रजनीकांत जी के दामाद भी है उनकी फिल्म ‘रांझणा’ में प्यार का अलग रूप दिखाया गया, हालांकि सारा कुछ ड्रामेटिक था लेकिन सन्देश के नाम पर निल्ल बटे सन्नाटा, एक लड़का-लड़की बचपन मे प्यार करते है, लड़का सिलेंडर वगैरह ढोकर प्यार की पींगे बढ़ाता है और लड़की मौका पाकर अपने छात्र नेता आशिक के साथ रफूचक्कर हो जाती है, खैर जो भी हो इस फ़िल्म से संदेश लेने की कोशिश बेकार जाती है।

मर्डर :

एक विशेष उपाधि  से नवाजित कलाकार इमरान हाशमी की फ़िल्म जिसमे जी भर कर आपत्तिजनक दृश्यों को कलात्मकता के नाम पर परोसा गया, और यह दिखाया गया कि  कैसे कोई पत्नी अपने पति से पहले बेवफाई और फिर बाद में प्यार करती नजर आयी थी, हालाँकि इस फ़िल्म से मुझे कोई संदेश तो नही मिला, आपको मिले तो जरूर बताइएगा !

  • ऐसी एक लंबी फेरहिस्त है जिसमें मनोरंजन के नाम पर कुछ भी परोसा गया और लोगों ने इन्हें दिल खोल कर समेटा, लेकिन इनसे समाज को क्या मिला? इसका यक्षप्रश्न बाकी है !