उदय बुलेटिन
www.udaybulletin.com
 प्राचीन भारत
प्राचीन भारत|google
नजरिया

सिमटता हुआ भारतीय संस्कृति का इतिहास 

हम भारतीय भले हम विश्व के किसी भी कोने में रहें, किसी भी ज़माने में भारत से दूर गए हों, कोई भी कारण रहा हो, पर हम दिल से भारतीय ही हैं, हम जहाँ भी हैं वहांअपनी संस्कृति को साथ लेकर चल रहे हैं 

Divyanshu Singh

Divyanshu Singh

"भारत सिर्फ एक देश नहीं, एक सोच है" ये कथन ओशो रजनीश जी का है। जो आदिकाल से आज तक, हर समय, हर जगह, अपने आप को सत्यापित करता है की भारत सिर्फ एक भूभाग नहीं , एक सोच है, इसका सबसे बड़ा उदाहरण हम भारतीय ही हैं, भले हम विश्व के किसी भी कोने में रहें, किसी भी ज़माने में भारत से दूर गए हो , कोई भी कारण रहा हो , पर हम दिल से भारतीय ही हैं, हम जहा भी हैं वहां अपने भारत और अपनी संस्कृति को साथ लेकर चल रहे हैं।

पर भारत में रह रहे भारतीय, समय के साथ आधुनिकता के दौर में अपनी संस्कृति को या तो कम महत्त्व दे रहे हैं या उसे भूल भूलते जा रहे हैं ।

एक जमाना था जब बूढी दादी अम्मा दोपहर के वक़्त सूरज की चाल देख कर समय का सही ज्ञान देतीं थी , एक जमाना वो भी था जब राजा महाराजा के ज़माने में समय की जानकारी सबको मिल सके इसके लिए एक खास आदमी होता था जो हर घंटे बड़े से घंटे को बजाया करता था , इस बात का उल्लेख हमें प्राचीन काल की कहानियों में मिलता है , समय बदला , समय मापने के यन्त्र आ गए और वो जमाना बस एक कहानी रह गया ।

कुछ इसी तरीके से हम अपने कैलेंडर को भी भूल रहे हैं, आजकल हम इसका इस्तेमाल विशेष तौर पर लग्न और मुहूर्त देखने के लिए ही करते हैं । जब हमारे पास अंग्रेजी कैलेंडर नहीं था या यूँ कह लें की इसकी उत्पत्ति भी नहीं हुयी थी तब भी हम भारतीय दिनों का , महीनों का ,सालों का सही और सटीक हिसाब रखते थे। भारत में उपयोग आने वाले कलेण्डरों में से एक विक्रम संवत का चलन भारत में 57 ईसा पूर्व से ही है।

मगर अब इस कैलेंडर के महीनों का नाम कुछ विशेष आयोजन और कुछ मशहूर गानों तक ही सिमित है

जैसे "मेरे नैना सावन भादो फिर भी मेरा मन प्यासा" इस गाने में सावन और भादो विक्रम सवंत के दो महीनो के नाम का जिक्र है , हिंदी साहित्य के प्रख्यात लेखक मुंशी प्रेमचंद की कहानी "पूस की रात" में हमे पौष महीने ( पूस ) का उल्लेख मिलता है , और भी कई सारे ऐसे उदाहरण है जिनमे विक्रम संवत के महीनो का नाम मिल ही जाता है, मगर आज की जीवन शैली में जहाँ अंग्रेजी कैलेंडर हमारी जरुरत हैं वहीं विक्रम सवंत कैलेंडर महज कुछ विशेष कार्यो में इस्तेमाल होता है।

इसकी उपयोगिता सिर्फ दिन महीने साल तक सिमित न होकर बल्कि ग्रह, नक्षत्र, लग्न, मुहूर्त चंद्रग्रहण, सूर्यग्रहण तक की सटीक जानकारी देने की है और इसका उपयोग हम भारतीय अंग्रेजी कैलेंडर भारत में आने तक किया करते थे।

विक्रम संवत के महीने क्रमानुसार - चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण (सावन), भ्रादपद (भादों), आश्विन (कुवार), कार्तिक, मार्गशीर्ष (अगहन), पौष (पूस), माघ, फाल्गुन (फागुन ) हैं।