Hyderabad Encounter
Hyderabad Encounter|Uday Bulletin
नजरिया

हैदराबाद में एनकाउंटर भारतीय ज्यूडिशियरी पर करारा तमाचा है

देश की न्यायिक व्यवस्था में विश्वास वापस लाना है तो अदालतों को रेप जैसे जघन्य अपराध में पीड़ित को न्याय जल्दी देना होगा ! सजा बस एक ही हो फांसी चाहें कोई मंत्री हो, विधायक हो या सांसद ! 

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

Summary

मुझे नहीं पता कि तेलंगाना के हैदराबाद में वेटनरी डॉक्टर के बलात्कारी कातिलों के साथ पुलिस ने क्या सीन रिक्रिएट किया लेकिन अंजाम देखकर मन विभोर हुआ एक आम आदमी होने के नाते इस खबर को सुनकर सुबह हरी हो गयी, लेकिन जैसे ही मुझे एक भारतीय नागरिक होने का भान हुआ तो अंदर से मन कराह उठा।

आखिर आरोपी गोलियों से भून दिए गए, मामला लगभग खत्म सा हो गया :

रात के धुंधलके में पुलिस ने सबूत जुटाने के लिए घटना स्थल पर सीन रिक्रिएट करने का प्लान किया और इसके आगे जो पुलिस ने कहानी दुनिया को सुनाई उसको लोग अजीब लगने के बाद भी सही मानने को तैयार हैं जो एक हिसाब से ठीक भी है, कहानी के अनुसार हुआ यह कि सीन रिक्रिएट करते वक्त चारो आरोपियों ने भागने का मौका पा लिया और किसी एक पुलिसकर्मी का हथियार छुड़ा कर भागने लगे।

पुलिस ने भागते हुए आरोपियों को रुकने का अल्टीमेटम दिया तो उन्होंने पुलिस से छीने गए हथियार से फायरिंग शुरू कर दी और साथ ही घटनास्थल पर उपलब्ध पत्थरों को उठाकर पुलिस पर फेंकना शुरू कर दिया चुटहिल होने पर पुलिस ने आत्मरक्षा में आरोपियों को निशाना बनाकर फायर किए और चारो बलात्कार के आरोपी जमीन पर लेटकर जमीन नापने लगे और कुछ ही देर में अपने कर्मों का हिसाब पूरा करने के लिए नरकगामी हो गए।

मरने वाले चारो आरोपियों में से एक के घर का दृश्य : (गोली कांड के बाद )

हालांकि हम पहले यह बताना चाहेंगे कि इस प्रकार का रोना-धोना हमें किसी प्रकार से विचलित नहीं कर पायेगा क्योंकि इनके बेटे ने मानवता को पहले ही तार-तार कर दिया है, जैसे को तैसा मिलना प्राकृतिक न्याय है, जो उन्हें मिल भी गया ।

देश खुश हुआ लेकिन बेमन से :

तेलंगाना पुलिस ने जो किया उसने पूरे देश की मीडिया समेत देश को एकबारगी नई खुशी सी दे दी, एक ओर जहां देश इस कांड को लेकर पुलिस प्रशासन और सरकारों की फजीहत करता नजर आ रहा था उसमे अजीब सी चेतना आ गयी और चारो तरफ सिर्फ एक ही आवाज नजर आ रही यही की "जो भी हुआ जैसे भी हुआ बहुत अच्छा हुआ"

कुल मिलाकर मुद्दा यह था कि कोई केस नहीं, कोई बहस नहीं, फैसला ऑन द स्पॉट " लेकिन असल समस्या तो अब पैदा होती है !

पुलिस ने वो किया जो उसके काम में शामिल ही नहीं था :

पुलिस आरोपियों को ले तो गयी थी क्राइम सीन रिक्रिएट करने लेकिन कुछ और ही क्रिएट कर आई, मतलब सुबूत जुटाने गयी थी और नया केस हो गया, हालाँकि यह स्पष्ट कर दिया जाए वो चारो आरोपी इसी तरह की सजा के हकदार थे लेकिन सजा गलत लोगों ने दी, आखिर ये हुआ कैसे ?

न्याय व्यवस्था कहां गायब हो गयी ? :

सेसन कोर्ट, डिस्ट्रिक्ट कोर्ट, हाईकोर्ट, सुप्रीमकोर्ट, और पता नहीं कितने कोर्ट और इन कोर्टो में सड़ते हुए हज़ारों लाखो मुकदमे जिनका न तो कोई आधार है, न ही इन मुकदमों से कोई खास लाभ।

आपको पता है जिस देश मे हत्या, डकैती, बलात्कार के हज़ारों मुकदमे अदालतों की दराजो में धूल खा रहे हैं उस देश का सुप्रीमकोर्ट किसी मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर चिंतित है जिस देश मे आतंकियों जेलों में रखकर बिरयानी का बिल बढ़ाया जा रहा है उस देश के मुख्य न्यायाधीश इस बात को लेकर परेशान है कि दही हांडी की ऊंचाई कितनी होनी चाहिए।

जल्लीकट्टू में सांड किसको मारेगा या नहीं ये सुप्रीमकोर्ट बताएगा लेकिन किसी महिला के साथ बलात्कार हुआ है या नहीं इसके लिए न्यायिक प्रणाली को कोई खास फर्क नहीं पड़ता और इस वक्त पर हिंदी फिल्मों के अभिनेता का फेमस डायलॉग याद आता है तारीख पर तारीख और तारीख पर तारीख।

एक सोची समझी चाल की मदद से इन न्यायिक इंस्टिट्यूशन को बौना बनाया जा रहा है :

कानून और न्याय जब बेहद जरूरत हो तभी लाभप्रद होने चाहिए। लेकिन अगर न्याय मिलने में देरी हो तो फिर उस न्याय का मूल्य दो कौड़ी का साबित होता है। लेकिन अगर आप पिछले कुछ सालों के हजारो मामलों को खंगाले तो आपको कुछ चौकाने वाले मामले नजर आएंगे, दरअसल जानबूझकर सुप्रीमकोर्ट जैसे मुख्य संस्थान को इस प्रकार के फर्जी मामलों में कुछ ऐसे लोगों द्वारा जानबूझकर फसाया जा रहा है जिनका सीधे तौर पर इस मामले से कुछ लेना देना नहीं है तो जाहिर सी बात है अगर कोर्ट इन मामलों में अपना ध्यान लगाएगा तो असल मामलों को देखने-समझने में देर होगी और न्याय के लाभार्थियों को जस्टिस से दूर होना पड़ेगा, तो अब लोग इससे कई मायने निकल सकते है।

या तो फैसले को जल्दी पाने के लिए कानून को अपने हांथो में ले या फिर कोई दूसरा इदारा अपने काम की प्रव्रत्ति को छोड़कर वो काम करे जिसको अदालत द्वारा किया जाना चाहिए था।

पुलिस द्वारा की गई कार्यवाही पर प्रसन्न जनता ने पटाखे फोड़कर उत्सव मनाया:

तेलंगाना पुलिस का काम शायद इसी हताशा का नतीजा था:

देश की राजधानी में चलती बस में एक लड़की निर्भया के साथ दरिंदगी की जाती है और उसे मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। देश और समाज मे बड़ा भयंकर हो हल्ला होता है बड़ी मशक्कत के बाद पुलिसआरोपियों को अपने कब्जे में लेकर अदालत को सौंप देती है। फिर होता है असल खेल,

आरोपियों के द्वारा आरोप स्वीकार किया जाता है वो स्वीकार करते है कि उन्होंने ही लड़की के साथ वहशीपन किया था उसके बाद भी अदालत उन्हें अभिरक्षा में रखकर बिरयानी खिलाती है, कोई उन्हें सिलाई मशीन देकर अच्छा नागरिक बनाने की कोशिश करता है तो कोई इन दरिंदो को मौत से बचाने के लिए फांसी की फाइलों को मिट्टी में दबाकर रखता है और राष्ट्रपति के पास दया याचिका की मांग करता है।

शायद तेलंगाना पुलिस को यही बात खल गयी और कानूनी तरीक़े और या किसी और तरीके से इस काम को अंजाम दिया गया।

बहरहाल आज तेलंगाना पुलिस देश के हीरो के तौर पर उभर चुकी है। शायद इतिहास में किसी प्रदेश की पुलिस को ऐसा सम्मान नहीं मिला लोगों ने फूल बरसाए, तिलक लगाए, किसी बड़े नेता की तरह पुलिस के जयकारे लगाये, बच्चियों ने उन्हें देखकर शोर-शराबा किया, जो काबिले तारीफ है, पुलिस ने जो किया वो न सिर्फ ठीक ही था बल्कि न्याय के लिए जरूरी था, लेकिन ज्यूडिशियरी का क्या ?

अदालतें दही हांडी की ऊंचाई मापने के लिए है क्या ?

“यह बहस लेखक और लेखक के भतीजे शशि शेखर तिवारी के बीच हुई बातचीत पर आधारित है, हमारा उद्देश्य किसी सरकारी इदारे पर शंका करना नहीं है लेकिन अगर मामले आते है तो भारतीय नागरिक होने के कारण सवाल उठाने की आजादी तो है ही ना या सारी अभिव्यक्ति की आजादी जेएनयू के प्रौढ़ छात्रों तक ही सीमित है “   
लेखक उदय बुलेटिन के विशेष संवाददाता हैं।

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