kangana vs uddhav thackeray
kangana vs uddhav thackeray|Google Image
नजरिया

सत्ता सबसे बड़ा कोरोना वायरस है, यहां केवल मुँह बांध कर चलना है, बोलोगे तो संक्रमण फैलेगा

बीएमसी द्वारा कंगना का दफ्तर तोड़े जाने के बाद सोशल मीडिया पर जबरदस्त तरीके से 'डेथ ऑफ डेमोक्रेसी' का हैशटैग ट्रेंड करने लगा, कंगना ने कहा, इसे ही कहते हैं फासीवाद।

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

सत्ता सदियों पहले से ही समाज के हितों को ध्यान में रखकर रची गयी थी लेकिन कालांतर में यह निजी स्वार्थ और ऐशो आराम के लिए मुख्य साधन बनी। वक्त चलता रहा, सत्ताएं ताकत के बल पर आती जाती रही लेकिन एक वक्त ऐसा भी आया जब लोग सत्ता के लालच में अपने सगे भाइयों का गला रेत कर तख्त पर काबिज हुए। कभी सत्ता हासिल करने के लिए जन्म देने वाले बाप को जेल की सलाखों के पीछे डाला गया। फिर आया उपनिवेशवाद का दौर, ये दौर कहने के लिए तो लोगों को विकास की तरफ ले जाता गया लेकिन यहां पर सत्ता बेहद केंद्रित रही। यहां पर सत्ता के खिलाफ आवाज उठाने वालों को फांसी के फंदे पर लटकाया गया। कभी भरी भीड़ पर गोलियां चलाई गई, आखिरकार भारत मे उपनिवेशवाद का अंत तो हुआ और लोकतंत्र की बारी आई। शुरुआत में ये सुखद तो लगा लेकिन वक्त बीतते हुए यह भयानक तरीके से तकलीफ देने वाला बना और वर्तमान में कंगना रनौत उसका बेहतरीन उदाहरण है जिसके आवाज उठाने पर सत्ता इतनी भयभीत है कि अभिनेत्री के आशियाना को उखाड़ फेंका जा रहा है।

इस घटना को डेथ ऑफ डेमोक्रेसी करार दिया गया:

ये निरंकुशता किधर ले जाएगी?

कहते है सत्ता को कभी भी निरंकुश नही होने देना चाहिए, अगर कोई सत्ता के खिलाफ आवाज उठाये और तरीका गलत हो या झूठा आरोप हो तो उसके लिए न्यायालय है लेकिन अगर सत्ता सरकारी एजेंसियों को हथियार बनाकर इसको आवाज उठाने के खिलाफ प्रयोग करे तो जाहिर ही बात है कि इसमें सवाल उठेंगे। क्योंकि लोकतंत्र की सबसे बड़ी बात आवाज है, डायलॉग से ही बात बनती है, लेकिन महाराष्ट्र सरकार इसपर पूरे तरीके से विफल रही। दरअसल सुशांत सिंह राजपूत की संदिग्ध की मौत के बाद सिनेमा जगत में आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया, इस बीच कंगना रनौत ने महाराष्ट्र सरकार पर सुशांत सिंह मामले में मामले पर मिट्टी डालने समेत आरोप लगाए। जिसके साथ ही कंगना के साथ महाराष्ट्र सरकार का सीधा-सीधा वाद विवाद बढ़ता गया और नतीजन बात तकरार में बदल गयी। नतीजा सबके सामने है कि एक अभिनेत्री के बयानों की वजह से महाराष्ट्र सरकार विचलित नजर आने लगी।

कंगना वर्सेज महाराष्ट्र सरकार का आगाज:

आरोप तो मोदी सरकार पर भी लगे लेकिन विचलित नही हुई:

अगर पिछले कुछ परिदृश्य पर नजर डाले तो उसी सिनेमा जगत से तमामं एक्टर्स और प्रोड्यूसर के द्वारा वर्तमान मोदी सरकार पर हिंदूवादी सरकार होने और देश मे खुद को असुरक्षित होने के आरोप लगाए गए लेकिन इस पर मोदी सरकार के द्वारा वर्तमान महाराष्ट्र राज्य सरकार जैसा उदाहरण पेश नहीं किया। जो कि एक अच्छी बात है।

सरकार हमेशा से जनता के लिए जवाबदेह होती रही है। जनता की आवाज से सरकार का हिल जाना या पलटकर हमला करना बेहद निचले स्तर की राजनीति दिखाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आरोप लगने का वाकया अभी से नहीं बल्कि काफी पुराना है जब मोदी गुजरात की गद्दी संभाल रहे थे और एक अरसे के बाद भी देश मे अराजकता फैलाने के आरोप फ़िल्म अभिनेताओं द्वारा भी लगाए गए लेकिन आज तक भी किसी अभिनेता का बंगला नही गिराया गया।

क्या फायदा क्या नुकसान?

अगर फायदे और नुकसान की बात करे तो इस पूरे वाकये से कंगना को लाभ मिलना तय है। दरअसल सत्ता का एक व्यक्ति से विरोध करना जिसका कोई भी खुला लिंक किसी दूसरी पार्टी से साबित नहीं होता है समाज मे एक अलग दृश्य उपस्थित करता है। नतीजन इसका सीधा-सीधा नुकसान सत्ता को होना तय है और इसके साथ ही कंगना को सहानभूति मिलना तय है और अगर यही हाल चलता रहा तो भविष्य में कंगना के लिए राजनीतिक दरवाजे भी खुल सकते है जैसा कि पहले भी नवोदित नेताओं के साथ हुआ है।

मामले में कंगना को विपक्ष का मिलता हुआ समर्थन:

कहने का तात्पर्य यह है कि अगर सत्ता और समाज के बीच अगर कोरोना वायरस जैसी स्थिति आ जाये जहां जनता को बिना कुछ बोले मुँह बांध कर रहना पड़े तो यह स्थिति राजनीति के लिए बिल्कुल भी हितकारी नही है भले ही लंबे समय बाद हो लेकिन इसके दुष्परिणाम आने तय है। देखादेखी अन्य सरकारें भी अपने विरोधियों की आवाजें दबाने के लिए सरकारी मशीनरी का उपयोग करें तो कोई नई बात नही मानी जायेगी।

उदय बुलेटिन
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