the wire and the quint journalism
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नजरिया

ये पत्रकारिता का स्तर किस ओर जा रहा है, अब अगर अपराधी मुस्लिम और दलित है तो क्या उनके अपराध माफ कर दिए जाएं?

अपराधियों को भी जाति-धर्म में बाँट कर दिखाया जा रहा, किस जाति और किस धर्म के लोग ज्यादा जेल में है इसके आंकड़े कुछ न्यूज़ पोर्टल्स ने प्रस्तुत किये हैं।

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

अपराधी सिर्फ अपराधी होता है और आतंकी सिर्फ आतंकी इसके अलावा और कुछ नहीं लेकिन भारत में ऐसा नही, अगर आतंकी है तो पहले वह किसी समुदाय का नही अगर मर गया तो उसके संस्कार समुदाय के रीति रिवाज से होने चाहिए क्योंकि अब उसका धर्म उसकी पहचान हो गया और अगर बच गया है और जेल में है तो उसे समुदाय विशेष के होने या जाति विशेष के होने की वजह से जेल में डाला गया है। ये पत्रकारिता का कौन सा स्तर है, जिसको देखकर घुटन होती है, कुछ मीडिया हाउसेज अपनी गिरती हुई पत्रकारिता को उठाने के चक्कर मे इतना गिर जाते है कि उन्हें पता ही नही चलता कि अपराध करने के बाद अदालतें जाति या धर्म देखकर सजा का निर्णय नहीं देती है।

पत्रकारिता का यह कैसा रूप?

अब इसे पत्रकारिता में संविधान की अवहेलना करने की घुलती हुई भावना माने या कुछ और लेकिन अगर इस मामले पर सरसरी नजर ही डाल लें तो साफ नजर आता है कि पत्रकारिता की आड़ में समाज को जाति धर्म की दीवारों में बांटकर अपना उल्लू सीधा किया जा रहा है ताकि वो खुद को समाज विशेष और समुदाय विशेष की बात उठाने वाला बता सकें। चूंकि इस खबर का सार साफ-साफ नजर आता है कि आंकड़ों के साथ खेलकर सूचना सेवा प्रदाता समूह यह दर्शाने में जुटा है कि देश मे दलितों और मुस्लिमों पर अत्याचार हो रहा है क्योंकि इस वक्त देश में इनके विरोध की सरकार है। सूचना सेवा प्रदाता

"द क्विंट" ने इस बारे ने क्राइम ब्यूरो के आंकड़ों को आधार बनाकर एक रिपोर्ट पेश की है जिसमें यह बताया गया है कि जनसंख्या के अनुपात से अगर तुलना की जाए तो मुस्लिमों और दलितों की संख्या जेल में ज्यादा है।

द क्विंट हिंदी की फेसबुक पोस्ट, जिसपर लोगों की नाराजगी सामने आ रही है:

दोषी कैदियों में मुसलमानों की संख्या 16.6 फीसदी और दलित 21.7 फीसदी

Posted by Quint Hindi on Sunday, August 30, 2020

क्या जाति धर्म देखकर जेल भेजा जाएगा?

अगर द क्विंट हिंदी की इस खबर को पढ़ा जाए तो इसके कुछ मायने निकलते है कि शायद या तो वर्तमान सरकार निशाना लगाकर मुस्लिमों और दलितों को जानबूझकर जेल की यात्रा करवा रही है या फिर जो दलित और मुस्लिम जेलों में अपराध या आरोपों के तहत कानूनी अभिरक्षण में है उन्हें तत्काल प्रभाव से बाहर किया जाना चाहिए। साथ ही खबर में अगड़ी जातियों और ओबीसी जाति समुदाय के आंकड़े दिखाकर यह बताने की कोशिश की गई है कि ये लोग जेलों के बाहर मजे कर रहे है।

द वायर ने भी इसी नक्शे कदम पर खबर पब्लिश की है:

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के साल 2019 के आंकड़ो के अनुसार देश की जेलों में बंद विचाराधीन मुस्लिम क़ैदियों की संख्या...

Posted by The Wire Hindi on Sunday, August 30, 2020

इन खबरों का असल लक्ष्य क्या है?

देखिए भले ही नजरिये को अलग दिखाकर यह खबर लिखी गयी है लेकिन इसका मकसद बेहद साफ और सीधा है। इस खबर को लिखकर समाज मे यह संदेश दिया जा रहा है कि समुदाय विशेष और जाति विशेष के लोग वर्तमान समाज मे सुरक्षित नहीं है। हालांकि असल बात यह है कि जो अपराधी है अथवा आरोपी है वह जेल जाएगा फिर चाहे वह ब्राम्हण हो या क्षत्रिय अथवा अन्य कोई जनजाति या अनुसूचित जन जाति से हो। कानून को अपराध करने वाले व्यक्ति के धर्म और समुदाय से कोई लेना देना नही होता बल्कि कानून सिर्फ अपना काम करता है।

डिस्क्लेमर: लेख में लिखे गए सभी विचार वर्तमान परिदृश्य में चल रहे एक सुनियोजित कार्यक्रम को खोलने के लिए किए गए है, लेख को लेखक ने खुद के शब्दों में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है, उदय बुलेटिन लेखक के विचारों से पूरी तरह सहमत नहीं हो सकता है।

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उदय बुलेटिन
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