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Pro CAA vs Anti CAA
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नजरिया

धड़ो में बटता भारत, परिणाम बेहद भयानक होंगे। 

आज की कहानी उदय बुलेटिन के स्पेशल कोरेस्पोंडेंट शिवजीत तिवारी के बेहद निजी दृष्टिकोण से। 

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

Summary

दिल्ली का शाहीन बाग बिल्कुल उसी तरह है जैसे कभी कुम्भ का माहौल होता है या फिर हाजी अली दरगाह में जाते हुए जियारत करने वालों की भीड़, और लक्ष्य केवल एक है किसी भी तरीके से अपने पक्ष के कुछ सिक्के बटोरे जाए, लेकिन जैसे ही लोग उस जगह पर पहुंचते है लोगों की आंखों में लगे हुए बड़े-बड़े पावर वाले चश्मे एक झटके में उतर जाते है।

शाहीन बाग में बवाल क्या है :

बताने की कोई जरूरत नहीं है सब जानते है सरकार द्वारा लगाए गए नए कानून सीएए और काल्पनिक तौर पर लागये जाने वाले बिल एनआरसी के विरोध में एक माह से भी ज्यादा समय से एक बेहद व्यस्त सड़क पर प्रदर्शनकारियों ने अपना कब्जा कायम किया हुआ है। मंशा बेहद साफ है बिना किसी राजनैतिक साजिश के इतने बड़े पैमाने पर किसी आंदोलन का आयोजन ही नहीं हो सकता है। जहां बात-बात पर लोग तिरंगा फहराकर अपनी देशभक्ति का सुबूत देते नजर आ रहे है और लगभग हर एक घंटे में संविधान की प्रस्तावना को इमले की तरह पढ़ा जा रहा है। लेकिन असल सवाल यह है कि जिन लोगों के द्वारा संविधान की प्रस्तावना पढ़ी जा रही है उनको इस संविधान की नियमावली भी याद है?

लोगों की स्वतंत्रता का हनन :

भले ही प्रदर्शनकारियों के द्वारा आजादी की मांग पर सरकार के सामने सवाल खड़े किए जा रहे हो लेकिन इसका एक दूसरा पहलू है जिसमे वहां से पहुंचने वाले लोगों के संवैधानिक अधिकारों का हनन किया जा रहा है। इसको लेकर कहीं किसी के मन मे कोई शंका और चिंता नही है, हालांकि इस पर कोई दो राय नहीं है कि लोगों को संवैधानिक तरीके से प्रदर्शन करने का अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त है, लेकिन अगर किसी भी व्यक्ति समूह या समाज को इस प्रदर्शन से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप के कोई समस्या संवैधानिक अधिकारों को लेकर होती है तो निश्चित रूप से वह प्रदर्शन न सिर्फ असंवैधानिक हो जाता है बल्कि नैतिक रूप से वह समाज की प्रगति में ब्रेकर का काम करेगा।

अच्छे और बुरे पत्रकार की पहचान :

प्रदर्शन के सभी कारकों और मांगो का समाज के हर तबके तक पहुँचाना बेहद अनिवार्य है और इस क्षेत्र में लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अपनी भूमिका बखूबी निभाता है, लेकिन पिछले कुछ दिनों से भारत मे पत्रकारिता ने अपने निचले स्तर को छूकर अपना कीर्तिमान स्थापित किया है इसमें कोई शक और सुबह की गुंजाइश ही नहीं है फिर भी अगर कोई पत्रकार प्रदर्शन स्थल पर पहुँच कर लोगों से बात करना चाहता है तो वहाँ वह केवल पत्रकार की हैसियत से जाने के लिए अधिकृत होता है, लेकिन अगर वहाँ अच्छे या बुरे पत्रकार के तौर पर उसके साथ अनैतिक व्यवहार किया जाता है तो जाहिर तौर पर प्रदर्शनकारियों की मंशा पर सवाल उठते है, क्योंकि एक ओर जहां कुछ पत्रकारों को तंबुओं में जलेबी और बिरयानी खिलाई जाती है लेकिन जो आपकी विचारधारा का समर्थन नहीं करते और की गई सड़क जाम जैसी समस्याओं पर सवाल उठाते है तो आप उनको बाहर रहने का आदेश सुनाते है।

आखिर आपकी काल्पनिक समस्या समस्या है , दूसरों की मौत जायज है ?

दिल्ली का जामिया और लखनऊ का प्रदर्शन स्थल जहाँ पुलिस ने दंगाइयों और प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए बल प्रयोग किया तो लोगों के माथे पर बल पड़ गए लेकिन चूंकि मामला जो ठीक लगे उसको स्वीकार करना है बाकी जो आपके हिसाब से न हो वो गलत।

एक ओर जहां जामिया के दंगाइयों पर पुलिस ने लाठियां भांजी तो लोगों को बड़ी तकलीफ हुई, लेकिन उसी तर्ज पर झारखंड के रांची में जब कुछ लोग सीएए के समर्थन में रैली निकाल रहे थे तो सीएए के विरोधियों की पत्थरबाजी में नीरज राम प्रजापति नामक लड़के को गंभीर चोटें आई और ब्रेन हैमरेज जैसी गंभीर समस्या का शिकार हुआ और आखिर में अस्पताल में दम तोड़ दिया लेकिन मजाल क्या कि किसी बड़े प्लेटफार्म पर इसकी चर्चा हुई हो, खासकर जो मीडिया हाउस शाहीन बाग को हार्ट पल्स की तरह न्यूज में फ्लैश करा रहे है उनकी तरफ से ऐसा लगा मानो कुछ हुआ ही नहीं।

मृतक नीरज राम प्रजापति
मृतक नीरज राम प्रजापति
Uday Bulletin 

समस्या आपके प्रदर्शन को लेकर नहीं है लेकिन आपने जो मुद्दे चुने है वो नाकाफी है, और लोगों के लिए तकलीफ देने वाले, हालांकि संविधान आपको प्रदर्शन करने की आजादी देता है लेकिन अगर उसी प्रदर्शन की आड़ में आप भारत को टुकड़ो में बांटने और राज्य विशेष को देश से अलग करने की बात करते है तो जाहिर तौर पर आपके मंसूबे उजागर होते है।

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