शुद्धता और अशुद्धता में फर्क 
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कोयला कितना ही काला क्यों ना हो, इंसान के अंदर की कालिमा पर असर नहीं दिखा सकता 

जब तक कोई पदार्थ शक्ति को क्षीण नहीं करता, उसे अशुद्ध नहीं माना जा सकता।

प्रो. ज्ञानप्रकाश शास्त्री

प्रो. ज्ञानप्रकाश शास्त्री

Summary

जो शुद्ध नहीं है वह अशुद्ध है, जो पवित्र नहीं है वह अपवित्र है, जो अमृत नहीं है, वह विष है और जो अखाद्य है, वह मल है, इतना कह देने मात्र से उपर्युक्त अशुद्धि, अपवित्रता, विष और मल का आशय स्पष्ट नहीं होता है।

पहली बार संसार की यात्रा पर आने वाली आत्मा शुद्ध है, पवित्र है, अमृत है और मलों से मुक्त है। संसार की यात्रा करते-करते जब उसके अंदर आसक्ति का जन्म होता है और उस आसक्ति के कारण अहंकार तथा उसके कारण मन और बुद्धि में विकार उत्पन्न होते हैं और इनके उत्पन्न होने से शरीर, अन्तःकरण और आत्मा अशुद्ध हो जाती है।

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अशुद्धि

जहाँ तक अशुद्धि के स्वरूप का प्रश्न है, जिसके कारण व्यक्ति या वस्तु की क्षमता का ह्रास हो जाता है, वह अशुद्धि है और जिससे वस्तु या व्यक्ति की क्षमता और अधिक पुष्ट हो जाती है, वह शुद्धि है। अशुद्धि को चिकित्सकीय भाषा में संक्रमण भी कह सकते हैं। जिससे व्यक्ति पहले स्वयं संक्रमित होता है और फिर जो-जो उसके संपर्क में आते हैं, वे सब उसके सम्पर्क से संक्रमित होते चले जाते हैं।

यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि पहले व्यक्ति अशुद्ध अर्थात् संक्रमित होता है और उसके पश्चात् उस के संपर्क में आने वाली वस्तु अशुद्ध हो जाती है। दूषित भोजन या जलवायु को ग्रहण करने से लोग बीमार होते हुए देखे जाते हैं अर्थात् दूषित भोजन को अशुद्ध कहे जाने का कारण यह है कि उससे ग्रहण करने वाले की शक्ति क्षीण हो जाती है।

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प्राचीन आरोग्यवेत्ता मन और शरीर दोनों को हानि पहुँचाने वाले खाद्य पदार्थों को अशुद्ध मानते थे, लेकिन आज के आरोग्यशास्त्री शरीर को हानि पहुँचाने वाले तत्वों को ही अशुद्ध मानते हैं। भोजन का उद्देश्य केवल शरीर को पुष्ट करना नहीं है, उससे भी बड़ा उसका उद्देश्य मन का निर्माण करना है। व्यक्ति जिस प्रकार का भोजन करता है, उसका मन उसी जैसा हो जाता है।

अशुद्धि का प्रभाव दो स्थानों पर होता है, मन और शरीर। अशुद्ध भोजन से मन के अशुद्ध हो जाने के कारण व्यक्ति की साधना बाधित होती है, लेकिन इसको वही व्यक्ति अनुभव कर सकता है, जो खाए गए भोजन की दृष्टि से अधिक शुद्ध हो, परन्तु जिन का अशुद्धि का स्तर भोजन की अशुद्धि के समान या न्यून है, उन पर मन की अशुद्धि के प्रभाव का आकलन नहीं किया जा सकता। कोयला कितना ही काला क्यों ना हो, यदि कोई व्यक्ति उस जैसी या उससे भी अधिक कालिमा को धारण किए हुए है, उस पर कोयले की कालिमा असर नहीं दिखा पाती।

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जो खाद्य पदार्थ शरीर की दृष्टि से हानिकारक होते हैं, वर्तमान में उनको ही अशुद्ध माना जा रहा है। जिस भोजन, या जल या वायु को ग्रहण करने से व्यक्ति रुग्ण हो जाता है, उसको अशुद्ध माना जाता है, क्योंकि इससे खाने वाले की शक्ति क्षीण हो गई है। जब तक कोई पदार्थ शक्ति को क्षीण नहीं करता, उसे अशुद्ध नहीं माना जा सकता।

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