विकास दुबे: एनकाउंटर और आरोपित जीवन

अधिकांश लोगों का मानना है कि अगर विकास दुबे को मारा नहीं जाता तो पीड़ितों को न्याय मिल जाता।
विकास दुबे: एनकाउंटर और आरोपित जीवन
Vikas Dubey EncounterGoogle Image

पुलिस भले ही इस एनकाउंटर को थ्योरिटिकल रूप से जायज ठहराया दे लेकिन इतिहास हमेशा इस मामले पर सवाल उठाता रहेगा क्योंकि जिस तरह के वाकये इस एनकाउंटर पर बताये गए है वो लोगों को किसी भी तरीके से न तो पच रहे हैं और न ही भरोसा हो रहा है।लोगों के अनुसार अगर पुलिस इसी तरह दंड का विधान खुद के हाथों में लेती रही तो फिर कानून और नियमावलियों का क्या होगा ?

क्या ये दीमकों के चाटने के लिए है ? लेकिन उसके बाद असल सवाल उठता है न्याय पालिका पर कि आखिर वह कहाँ ठहरती है, तो जनाब जिस आरोपी पर 60 मुकदमे पंजीकृत हो और कुछ मामलों में तो उम्र कैद की सजा भी मिल चुकी हो और उसी केस में जमानत पर बाहर आकर जिसने 8 पुलिसकर्मियों की हत्या की है तो फिर न्यायपालिका अपने हिस्से का जवाब कैसे देगी ?

लोगों के आरोप पुलिस ने अपनी खुन्नस निकाल ली:

हमने इस मामले पर कई लोगों से बात की और लोगों के मन की बात जानने की कोशिश की तो लोग इस मामले को लेकर कुछ मतिभ्रम से नजर आए। लोगों के मन मे विकास दुबे को लेकर रत्ती भर हमदर्दी नहीं है यहां तक कि लोग इस बात को लेकर खुश हो रहे थे कि आखिर ये दुर्दांत व्यक्ति अपने कर्मो की वजह से ऐसी स्थिति को प्राप्त हुआ और इसका किस्सा खत्म हुआ।लेकिन ये लोग जो इस मामले पर खुशी जता रहे थे उनके कुछ वाजिब सवाल भी थे। लोग इसे यूपी पुलिस की साख पर लगता हुआ बट्टा बताते नजर आए और यह भी सुनाई दिया कि पुलिस ने अपने दामन में लगे हुए दागों की सफाई की है। लेकिन तरीका गलत है, लोगों के अनुसार विकास किसी भी हालत में अपने आप को बचाने का प्रयास कर रहा था उसने मध्यप्रदेश में अपना दिमाग लगाकर सरेंडर किया ताकि पुलिस उसका एनकाउंटर न कर दे। फिर भला वह पुलिस कस्टडी से भागने की हिमाकत कैसे करता। यकीनी तौर पर पुलिस के सर पर वह बोझ था जिसको उतारने के लिए पुलिस ने अपना काम पूरा किया।

राजनीतिक बोझ एक झटके से उतार फेका गया:

लोगों की माने तो ये सिर्फ विकास का एनकाउंटर नहीं हुआ बल्कि इसके साथ हज़ारों सफेदपोश अपराधियों के राज भी उन्ही चार गोलियों के साथ विकास के सीने मैं पैवस्त कर दिए गए जो उसने लंबे वक्त के आपराधिक जीवन काल मे कमाए थे। लोग इस एनकाउंटर को राजनैतिक यज्ञ के शमन के तौर पर भी देख रहे हैं। लोगों को लगता था कि अगर विकास जिंदा रहता तो उसके संपर्कों की वजह से कई राजनैतिक लोगों के क़दमों से जमीन गायब हो सकती थी और विकास कई लोगों के जीवन का कांटा बन सकता था। नतीजन इस कांटे को हमेशा के लिए खत्म करने के लिए विकास को शांत कर दिया गया जिससे उनकी कुर्सी और राजनैतिक जीवन सुरक्षित रहे।

पुलिस की थ्योरी में कई लूप होल्स :

विकास एनकाउंटर में यूपी एसटीएफ और यूपी पुलिस ने जो कहानी सुनाई वो काफी रोमाचंक तो है लेकिन गले नहीं उतरती फिर भी एक बार जो कहानी पुलिस ने बताई उसको ही आधार बनाकर देखते हैं।

पुलिस ने जो कहानी सुनाई है वह इस प्रकार है:

विकास को सड़क मार्ग से झांसी के आगे तक लाया जा रहा था तभी कानपुर के पहले आने वाले टोल प्लाजा के आगे चलकर जिस गाड़ी में विकास बैठा हुआ था वह डिवाइडर से टकरा कर असन्तुलित होकर पलट गई। विकास दुबे ने मौके का फॉयदा उठाते हुए घायल कमांडो की पिस्टल लेकर भागने की कोशिश की जिसपर अन्य कमांडोज ने उसे सरेंडर करने और वापस आने के लिए कहा लेकिन पुलिस पार्टी की ओर फायर करने और सरेंडर न करने पर कमांडोज़ ने जवाबी गोलियां चलाई जिसमे विकास घायल हुआ। विकास को घायल अवस्था मे कानपुर के एलएल आर हॉस्पिटल लाया गया जहां पर उसे डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया।

हालांकि पुलिस ने जो कहानी बताई वो किसी हिंदी सिनेमा की एक्शन थ्रिलर फिल्म से कम नहीं है, लेकिन इसमें भी झोल नजर आता है क्योंकि घटना स्थल से पूर्व पड़ने वाले टोल प्लाजा में ही जो पत्रकार गाड़ियों सहित काफिले का पीछा कर रहे थे उन्हें सुरक्षा का हवाला देकर क्यों रोका गया ?

मौके पर उपलब्ध आजतक के पत्रकार ने इस बात की तस्दीक दी कि विकास टाटा सफारी की स्ट्रोम मॉडल कर में बैठा हुआ था, फिर अचानक विकास महिंद्रा की टीयूवी कार में कैसे पहुँचा? आजतक ने दावा किया है कि उनके पास इस मामले के पुख्ता सबूत है विकास उस गाड़ी में था ही नही जिसके बारे में यह बताया जा रहा है कि वह उसमें सवार था।

मामले पर ए एन आई ने कुछ इस प्रकार जानकारी दी:

हालांकि लोगों ने विकास के भविष्य के बारे में पहले ही भविष्यवाणी करना शुरू कर दिया था और नई नई कहानियां बनाना शुरू कर दिया था

कवि कुमार विश्वास ने यूपी पुलिस की कहानी पर तंज कसा

न्याय पालिका और एनकाउंटर:

लोगों के द्वारा पुलिस पर यह आरोप लगाए जा रहे है कि आखिर जिस अपराधी से पूंछताछ करके उसके स्याह इतिहास के बारे में राज उगलवाने थे उसे बिना न्याय पालिका के प्रकाश में लाये ही मार दिया गया लेकिन इसका एक दूसरा पहलू है, संतोष शुक्ला हत्याकांड के बाद भी विकास अदालत में पेश होने के बाद जमानत पर आकर पुलिस को गोलियों से भून देता है इसकी क्या गारंटी थी कि वह इस बार ऐसा नहीं करता। चूंकि ऐसे अपराधी अक्सर कानून के बड़े-बड़े छेदों से निकलने में माहिर होते है। इस बारे में न्याय पालिका को भी भविष्य में होने वाले फैसलों को लेकर सोचना पड़ेगा कि कहीं इस बार की तरह पुलिस को ही दंडाधिकारी बनकर अपराधियों को सजा न देनी पड़े।

उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह का भी मानना है कि उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर पुलिस रिमांड में लेकर पूछताछ की जानी चाहिए थी। एनकाउंटर से अपराधी तो ख़त्म हो गया लेकिन अपराध नहीं।

डिस्क्लेमर: हमारा उद्देश्य अदालत व उत्तर प्रदेश की अवमानना करना नहीं है, लेख को विभिन्न लोगों के साथ हुई बातचीत के आधार पर लिखा गया है।

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उदय बुलेटिन
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