सोशल मीडिया: इसके फन भी है और काटता भी है, और काटे जाने पर कोई इलाज भी नहीं। 

सोशल मीडिया समाज के लिए जहर बनता जा रहा है, लोग इसका सदुपयोग काम दुरपयोग ज्यादा कर रहे हैं।
Summary

विश्व की सबसे प्रशिद्ध एसाल्ट रायफल एके-47 के निर्माता मिखाइल कलानीशिकोव ने एक बार कहा था “मैंने इस हथियार का निर्माण मानवता की रक्षा के लिए किया था लेकिन जब इसका उपयोग सत्ता के गलियारों में निजी स्वार्थ के लिए होते देखता हूँ तो आविष्कार पर कष्ट होता है”

शायद यही कष्ट डायनामाइट और टीएनटी जैसे विस्फोटकों के खोजकर्ताओं को रहा होगा। लेकिन अब समय बदल रहा है लोग विस्फोटकों और हथियारों से भी ज्यादा कारगर हथियार तकनीकी रूप से उन्नत सोशल मीडिया का उपयोग मानवता के विनाश के लिए करने लगे हैं यही कारण है कि भारत के प्रधानमंत्री को इस बाबत बाकायदा लिखकर बताना पड़ा कि उन्हें भी लग रहा कि सोशल मीडिया को छोड़ देना चाहिए।

क्या है संभावनाएं :

संभावनाओं का क्या है ये होती जरूर है लेकिन इनकी तलाश न के बराबर ही होती है देश मे आज यकीनन उथल-पुथल की स्थिति है लेकिन मजाल क्या कि कोई सोशल मीडिया के दोष गुणों की चर्चा कर ले। सभी लोग राजनीति और नेताओं के बयान की चर्चा को आधार बनाकर बहसों की झडी लगाकर बैठे है।

सोशल मीडिया और समाज :

जब से तकनीकी मानव समाज मे आयी लोगों ने उसे दुधारू गाय की तरह लाभ-हानि का सोचे बिना इस कदर उपयोग किया कि नजीरे खड़ी कर दी। भारत मे भी देखे तो जिसके पास स्मार्टफोन है वह दंगे कराने का हथियार लेकर टहल रहा है और मजे की बात तो यह है कि कोई भी इस पर सीधा अंकुश लगाने में सक्षम नहीं है।

मुझे याद है जब हम तकनीकी की पढ़ाई करके अपने घर लौटे हमारे मित्रों की सूची में इजाफा हुआ लोग मिलते गए और कारवाँ बढ़ता गया, समय बढ़ता गया मोबाइल नम्बर भी बदलते गए मित्रों से संपर्क भी छूटते गए। एक वक्त आया जब किसी भी मित्र का संपर्क मेरे पास उपलब्ध नहीं था। फिर आया सोशल मीडिया का दौर ।

मित्रों का खोजना शुरू हुआ, कुछ को मैंने खोजा और कुछ ने मुझे, आज लगभग हम सभी मित्र व्हाट्सएप और फेसबुक के साथ ट्विटर पर वर्चुअल रूप से हमेशा इकट्ठे रहते है। चर्चाएं होती है खुशी और गम के पल एक सेकेंड की देरी के बिना साझा किए जा सकते है लेकिन जितना उपयोग हम करते है कलुषित मस्तिष्क वाले इससे आगे का सोचते है और कई बार सफल भी हुए है।

एक अफवाह और बवाल शुरू :

मानव अपने इतिहास से ही सनसनीखेज टाइप का रहा है, उसको जैसे ही किसी चटखारे वाली ख़बर मिलती है वह बिना तथ्यों को जाने बवाल खड़ा कर देता है। अगर वह खुद बवाल खड़ा करने की हिम्मत और समय रखता है तब तो ठीक है नहीं फिर वह उसी ख़बर और अफवाह को बिना सत्यता जाने आगे की ओर बढ़ा देता है और धीरे-धीरे यह मामला दंगो में परिवर्तित हो जाता है। शायद यही कारण था कि दंगो का दंश झेल चुकी दिल्ली में अफवाहों की बातें फिर जोर पकड़ रही है कभी दूसरे धर्म की बातों को झूठा गढ़कर समाज मे आक्रोश तैयार किया जाता है तो कभी पुलिस की बर्बरता की कहानी रचकर समाज को उकसाया जाता है। शायद यही कारण था कि भारत के प्रधानमंत्री को खुद यह लगा कि यह सोशल मीडिया समाज के लिए हितकारी से ज्यादा जहरीला है।इसे छोड़ देना चाहिए !

बचाव ही उपचार है :

भले ही सेवा प्रदाताओं के द्वारा तमाम प्रकार के दावे हो लेकिन असल मे इनकी स्थिति बहुत ज्यादा अच्छी नहीं है। आप किसी भी वायरस और फेक न्यूज़ को किसी हद तक तब ही रोक सकते है आप इस तरह की मानसिकता रखे कि आपको समाज मे जहर नहीं घोलना है वरना आप चाहे कितना भी इंटरनेट बंद कर दे। कुछ भी हासिल नहीं होने वाला और अगर आप इंटरनेट भी बंद कर देते है तो उसके साथ कुछ और चीजे भी बर्बाद होती है जिसके नतीजे बेहद खतरनाक साबित होते है।

इस मौके पर हिंदी के महान कवि रामधारी सिंह दिनकर की चंद लाइने याद आती है जो शायद इसी संदर्भ के लिए लिखी गयी थी।

सावधान, मनुष्य ! यदि विज्ञान है तलवार,तो उसे दे फेंक, तज कर मोह, स्मृति के पार।हो चुका है सिद्ध है तू शिशु अभी नादान,फल काँटों की तुझे कुछ भी नहीं पहचान ।खेल सकता तू नहीं ले हाथ में तलवार,काट लेगा अंग, तीखी है बड़ी यह धार।परसवती भू के मनुज का श्रेय,यह नहीं विज्ञान कटु, आग्नेय।श्रेय उसका प्राण में बहती प्रणय की वायु,मानवों के हेतु अर्पित मानवों की आयु।​

डिस्क्लेमर : ब्लाग में लिखे गए सभी विचार लेखक शिवजीत तिवारी के निजी विचार है।

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उदय बुलेटिन
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