सुषमा स्वराज के निधन पर रवीश कुमार की दुखती और चुभती श्रद्धांजली !

सुषमा स्वराज का जाना बीजेपी के लिए एक बड़ा नुकसान। 
सुषमा स्वराज के निधन पर रवीश कुमार की दुखती और चुभती श्रद्धांजली !
रवीश कुमार की सुषमा स्वराज को श्रद्धांजलीSocial Media

नई दिल्ली टेलीविजन लिमिटेड (NDTV) के रवीश कुमार, पत्रकारिता जगत में एक विख्यात नाम है, वो आज किसी परिचय के मोहताज नहीं है। लेकिन उन्होंने आखिर ऐसा क्या किया जो आज हम उनके बारे में बात कर रहे हैं ?

दरअसल दिवंगत पूर्व विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज के निधन के बाद,रवीश कुमार जी ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए अपना प्राइम टाइम शो चलाया जिसमें उन्होंने सुषमा जी के राजनीतिक सफर की चर्चा की।

उन्होंने 2014 तक तो सुषमा जी को बहुत अच्छी तरीके से चित्रित किया, परन्तु 2014 के बाद उन्होंने सुषमा जी को एक लाचार, मजबूर नेता के रूप में चित्रित किया, रवीश जी ने ये दिखाने का प्रयास किया, की मोदी कैबनेट में विदेश मंत्री रही श्रीमती सुषमा जी को वो सम्मान नहीं मिला जिसकी वो हक़दार थी।

सकरात्मक पत्रिकारता से नकरात्मक विचार की धारणा

वैसे कभी रवीश जी मेरे भी प्रेरणास्रोत रहे हैं। इसलिए सम्मान के साथ 'जी' शब्द का प्रयोग कर रहा हूं। मेरा एक प्रश्न है, रवीश जी, सुषमा जी को कितना जानते थे? ये बात तो तय है मुझसे कहीं ज्यादा। लेकिन किसी सरकार से वैचारिक मतभेद तो हो सकता है मगर, एक पत्रकार के लिए तराजू के दोनों पलड़े बराबर होने चाहिए ताकि वो पत्रकारिता में आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करता रहे।

रवीश कुमार अपने करियर के उस मुकाम तक पहुंच चुके है जहां आज के समय में किसी भी पत्रकारों का पहुंचना बहुत कठिन है। लेकिन क्या रवीश कुमार अपने आप को एक ऐसे पत्रकार के रूप में देखना पसंद करेंगे जो मात्र एक राजनीतिक पार्टी का आलोचक हो या मुदो को सिर्फ एक ही नज़र से देखता हो ? आज उनका ये दोहरा रवैया पत्रकारिता को भी दो भागों में बांट चुका है।

मैं, ये मानता हूं, कि किसी भी तरह की पत्रकारिता हो मगर बात सब की होनी चाहिए,चाहे वो एक प्रतिष्ठित पत्रकार ही क्यों ना हो। वो भी तो इसी समाज का भाग है।

अभद्रता का ट्रेंड

इनदिनों पत्रकारिता में एक नया ट्रेंड चल पड़ा है। जो हमें पसंद हो उसे हर प्रकार से समर्थन करेंगे। अपितु जो हमें पसंद नहीं हो उसपे अभद्र टिप्पणी करेंगे।

अभद्र टिप्पणी इस कदर तक होती है की पत्रकार के पूरे परिवार को ही सम्मिलित कर लिया जाता है। परन्तु एक पत्रकार सब सहता है क्योंकि पत्रकारिता का अर्थ ही धैर्य है।

पत्रकार कोई भी हो वो चाहे प्राइम-टाइम के रवीश कुमार हो या फिर आज-तक से रोहित सरदाना सभी अपने चैनलों के माध्यम से अपना कार्य करते हैं और हमसे-आप से बिना पूछे करते रहेंगे।

Summary

हमें अपने देश के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करते रहना चाहिए और किसी भी प्रकार की विपरीत खबरों का खंडन करना चाहिए । आखिरी में एक ही बात करना चाहता हूं, पुरस्कार से अगर किसी को सर्वश्रेष्ठ माना जाये तो पुरस्कार बेचने वाले से ज्यादा कौन श्रेठ होगा। जब जीवन है तो मृत्यु आनी ही है परन्तु अपने विचारों और मदभेदों से भी ऊपर उठ कर श्रद्धांजलि दी जा सकती है।

एक विचार- तेरे दहलीज पे आये हैं तेरे ही बुलाने पे,अब इतनी बेरुखी अच्छी नहीं जनाब।

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उदय बुलेटिन
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