नट बली मंदिर बाँदा
नट बली मंदिर बाँदा|Uday Bulletin 
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मकर संक्रांति के दिन हुआ नट बली के मेले का आयोजन 

प्रेम और जंग दोनो की कहानियां है, आपको जो बेहतर लगे मान लीजिए।  

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

Summary

मेले का इतिहास लोक कथाओं और इतिहास में नजर आता है, यह मेला जहाँ सूर्य के मकर राशि मे प्रवेश करने के पहले शुरू हो जाता है जो कि संक्रांति तक चलता है, वहीँ इसके साथ एक प्रेम की अद्भुद कहानी जुड़ी हुई है, शायद इसलिए यहाँ प्रेमी प्रेमिकाओं का जमावड़ा सा लग जाता है।

केन नदी की ओर किले की दीवार के बिल्कुल नीचे जहां नट बली के मेले का आयोजन होता है, हर वर्ष की भांति दिनांक 14 जनवरी को मेले का आयोजन हुआ, इस मेले में शहर के आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रो और शहरों के बाशिंदों ने मेले का लुत्फ उठाया इस मेले में प्रेमी प्रेमिकाओ के जोड़ो के जत्थे नजर आए।

नट बली मेला 
केन नदी
भूढ़ के किले के नदी के किनारे वाला दृश्य

मेले के संदर्भ में लोक कथा :

चूँकि भूरागढ़ का क्षेत्र किलेदार के आधीन था और करीब 167 साल पहले वर्तमान में महोबा जिले के अंतर्गत आने वाले एक बड़े गांव "सुंगिरा" का नोने अर्जुन सिंह भूरागढ़ का किलेदार बना बैठा हुआ था। उस समय नटों और खेल तमाशा दिखाने वालों को लोग बड़े चाव से देखा करते थे, भूरागढ़ किले से करीब 20 किलोमीटर दूर स्थित गांव "सरबई" में बहुत संख्या में नट निवास करते थे, वो बहुधा बाँदा और इसके आस-पास आने वाली रियासतों और किलो में जाकर अपनी कला का प्रदर्शन करते थे जिससे उनकी आमदनी बनी रहे। उसी प्रकार से एकबार सरबई की एक मंडली भूरागढ़ जा पहुंची और खेल दिखाने का लंबा कार्यक्रम शुरू हुआ, चूंकि ये खेल एक दिन नहीं बल्कि लंबे समय तक चलता था इसलिए लोगों का लंबा हुजूम जुट जाता था।

खेल शुरू होने के बाद जत्थे के एक नट के ऊपर किलेदार नोने अर्जुन सिंह की इकलौती बेटी रीझ गयी और इश्क कर बैठी, इधर किलेदार की बेटी से संकेत मिलने के बाद नट भी लड़की पर रीझ गया, इधर जैसे-जैसे दिनों दिन खेल होता गया, नट और किलेदार की बेटी का प्यार परवान चढ़ता गया।

लेकिन जिसका डर था वही हुआ एक दिन किलेदार ने इस घटना को सुना तो नोने अर्जुन सिंह बेहद नाराज हुआ और अपनी बेटी की शादी एक शर्त पर करने को राजी हुआ, की अगर नट सैकड़ो मीटर चौड़ी केन नदी को केवल एक रस्सी के बल पर पैदल पार कर के किले तक पहुंचे तो वह शादी कर देगा।  

शक्ति प्रदर्शन और गद्दारी :

आखिरकार युवा नट ने इस चुनौती को स्वीकार किया और केन नदी के दोनो तरफ से सैकड़ो मीटर (लगभग एक किलोमीटर) लंबी रस्सी बांधी गयी, और युवा नट ने रस्सी के ऊपर चलकर नदी पार करनी शुरू कर दी। वहीँ नदी के इस पार नट समाज के लोग दुंदभी और वाद्ययंत्र बजाकर उसका उत्साह वर्धन कर रहे थे और खुद किलेदार की बेटी अपने पिता के साथ किले की ऊँचाई पर चढ़कर अपने प्रेमी का करतब देख रही थी। उस समय जब युवा नट ने अपने शारीरिक संतुलन के बल पर पूरी नदी पार कर ली और किले में पहुंचने वाला ही था तभी किलेदार ने किले पर बंधी रस्सी काट दी, और युवा नट की इतनी ऊंचाई से गिरने और पत्थरों से टकराने पर मौत हो गयी। किलेदार की बेटी यह सहन न कर सकी और उसने किले की ऊँचाई से नट के बगल में ही कूदकर आत्महत्या कर ली, तभी से उन दोनों प्रेमी प्रेमिकाओ की याद में इस मेले का आयोजन होता है।

लेकिन इतिहासकार इससे इतर राय रखते है :

अगर इतिहासकारों की माने तो ये कहानी मात्र मनोरंजन के लिए रची गयी एक कथा है जिसका सच्चाई से कोई लेना देना ही नही है, बुंदेलखंड के प्रसिद्द इतिहासकार राधाकृष्ण बुंदेली के अनुसार भूरागढ़ किले पर जब अंग्रेजो ने हमला किया तब सरबई के नटों ने अंग्रेजो से जी भर लोहा लिया और कई मौकों पर अंग्रेजो को लगा कि वो जंग हार चुके है। लेकिन अत्याधुनिक हथियारों और शारीरिक कलाबाजी का क्या मुकाबला, आखिरकार भारी मात्रा में नटों को वीरगति प्राप्त हुई और नट समाज किले की रक्षा करते हुए काल कवलित हुए, यहाँ आपको बताते चले कि उस वक्त अंग्रेजी सेना का नेतृत्व ब्रिटिश सेनानायक व्हितल्क ने दश हजार की सेना के साथ किया था जिसने सबसे पहले गोयरा मुगली गांव पर अपना कब्जा किया और उसके बाद मात्र 8 किलोमीटर की दूरी पर बसे भूरागढ़ किले पर नजर गड़ाई, इतिहासकार के अनुसार इस मुकाबले में क्रांतिकारियों की ओर से नेतृत्व नवाब अली बहादुर सानी ने किया था जिसमे सरबई, के नटों ने भीषण युद्ध किया और वीरगती को प्राप्त हुए, इस युद्ध मे नटों के अलावा हर जाति और धर्म के लोग भी अंग्रेजो के विरुद्ध बराबर से लड़े और मारे गए, सन 1857 की क्रांति से भी पहले इस जंग को लड़ा गया था लेकिन बड़े स्तर के लेखकों ने इस क्रांतिकारी आंदोलन को इतिहास में जगह देना उचित ही नही समझा, उक्त प्रमाणों को जानने के लिए बाँदा के ब्रिटिश गजेटियर को देखा जा सकता है जिसमे अंग्रेजो द्वारा लिखे गए दस्तावेज उपलब्ध है जिंनमे इन सभी घटनाओं का उल्लेख है।

  • मामला चाहे जंग का हो या फिर प्रेम का, वर्तमान समय मे नट बली और किलेदार की बेटी दोनो के मंदिर उपलब्ध है, और मेला उसी आधार को लेकर मनाया जाता है।

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