Migrant workers
Migrant workers|Google Image
ब्लॉग

मजदूरों का होता पलायन कहीं उद्योगों की तस्वीर न बदल दे !

चलिये अभी तो मामला कोरोना का है लेकिन जब कोरोना के बादल छटेंगे और उद्योगों का संचालन होगा तब क्या भारत के उद्योगों वाले प्रदेश इस स्थिति को संभाल पाएंगे?

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

मजदूरों ने त्रासदी का मुँह देख लिया है:

दरअसल भारत में जैसे ही कोरोना का कहर बरपा भारत सरकार ने एतिहातन पूरे भारत मे चक्काजाम के साथ ही पूर्ण बंदी लगा दी, जिससे दिहाड़ी मजदूरों समेत तमाम उद्योगों में काम करने के लिए उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्यप्रदेश से महानगरों समेत औद्योगिक नगरों में मजदूरी करने वाले श्रमिकों के लिए ये समय बेहद दुखदाई रहा।

लॉकडाउन होने के तुरंत बाद या तो ठेकेदारों ने अपने मजदूरों से मुँह मोड़ लिया या फिर उन्हें सीधे तौर पर पहचानने से ही इनकार कर दिया, दरअसल गुरुग्राम, नोयडा, सूरत, पंजाब, और महाराष्ट्र के मुंबई पूना, तथा कर्नाटक इत्यादि के बड़े-बड़े कारखानों समेत अन्य जगहों पर भारी मात्रा में मजदूर न सिर्फ अटके बल्कि उनके लिए एक जून की रोटी हासिल करना भी मुश्किल हो गया।

सरकार ने भले ही गर गरीब को राशन , रोटी पानी, खाना देने की बात कही हो या फिर उनके निमित्त पैसा निकाला हो लेकिन असल मायने में ये सब उनके पास पहुंचा ही नही। सबसे बड़ी समस्या मजदूरों के सामने यह थी कि वह अपने गृह जनपद या प्रदेश जाए कैसे? कभी उन्हें कर्म क्षेत्र के प्रदेश द्वारा रोका गया तो कभी अपने प्रदेशों द्वारा, हालांकि इस मामले में उत्तर प्रदेश सबसे अव्वल रहा, जिसने कुछ हद तक अपने मजदूरों को लाने की कोशिश की, लेकिन ये भी संख्या के हिसाब से नाकाफी रही।

अब न लौटेंगे :

देश की राजधानी दिल्ली से भूख प्यास और बेइज्जत होकर लौटते हुए एक मजदूर ने उदय बुलेटिन से हुए संवाद में बताया कि हमे पहले तो खाना देने की बात कही गयी थी लेकिन वह मिला ही नहीं, फिर सूखे राशन के नाम और बहलाया गया लेकिन वह भी नही मिला। हाँ एक चीज बहुत मिली झूठा आश्वासन, जैसे कि हमने आपके प्रदेश जाने के लिए बसों की व्यवस्था करा दी है। सरकार का यह झूठ भी हमारी मेहनत के मुँह पर तमाचा साबित हुआ, आखिरकार हमने दिल्ली से 1600 किलोमीटर की यात्रा पैदल करना बेहतर समझा। लोगों के अनुसार पासपोर्ट वालो की गलती की सजा राशनकार्ड वालों ने भुगती, वो भी भूंखे रहकर, वापस जाने के सवाल पर सैकड़ो मजदूरों ने कहा कि हम घर मे रहकर छोटी मोटी मेहनत मजदूरी कर लेंगे लेकिन परदेश नहीं जाएंगे। सब बेगाने है और मतलबी साबित हुए है, जब तक हमसे काम निकला तो काम लिया और काम निकलने के बाद घी में पड़ी हुई मक्खी के समान बाहर निकाल दिया। हम वापस दिल्ली, नोयडा और सूरत नही जाएंगे।

अब क्या होगा उद्योगों का?

अब चाहे सूरत का टेक्सटाइल व्यापार हो या दिल्ली में राजमिस्त्री का काम करने वाले दिहाड़ी मजदूर या फिर गुरुग्राम के औद्योगिक संस्थानों में ठेकेदारी के तहत काम करने वाले लोग, सबकी जुबान में "हमारे साथ अन्याय हुआ है, स्थानीय सरकारों ने हमारी तकलीफें नहीं समझीं हमे मरने के लिए छोड़ दिया" ऐसी चीजें होने के बाद हमे दोबारा वहां जाने के बारे में सोचना भी तकलीफ देता है। हम मार जाएंगे लेकिन वहां नही जाएंगे।

इस पर अर्थव्यवस्था के जानकार बहुत बड़ी चिंता जाहिर कर रहे है, जानकारो के अनुसार मैनपावर किसी उद्योग का बहुत बड़ा अहम हिस्सा है, जिसकी वजह से किसी उद्योग का चलना संभव होता है, अब जब लोग ही नहीं होंगे तो आप क्या मशीनों से बात करके काम चलाएंगे ?

पंजाब के खेतों में काम करने वाले श्रमिको के पलायन के बाद वहां की सरकार के ऊपर बहुत बड़ा दबाव पड़ रहा है लेकिन मजदूरों के जाने के बाद कुछ संभव नहीं है। पलायन के बाद केवल एक चीज हासिल होती है तरक्की में बाधा, लेकिन ऐसा नही है कि सरकारों को इस बाबत खबर नहीं हुई, सरकारों ने मजदूरों और श्रमिको के साथ हुए अन्याय को समझा और उनकी जरूरत महसूस हुई। लेकिन तब तक देर हो चुकी थी, फिर चाहे कर्नाटक से उत्तर प्रदेश आने वाले यात्रियों की ट्रेन रद्द करना हो या अन्य तरीके से लोगों को रोकने की कोशिश।

लेकिन इससे कुछ हासिल नही होता आपको उनके दिल मे जगह बनानी थी, इतिहास गवाह है कि किसी को ठोकर मारकर और ताकत से रोककर गुलाम नहीं बनाया जा सकता, उद्योगों समेत इन राज्यों की सरकारों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा।

राज्यो में होगी मजदूरों की भरमार :

इसका सीधा-सीधा लाभ और नुकसान उन प्रदेशों को होगा जहां मजदूर ज्यादा है और वो बाहर के राज्यो में नौकरी करते है, अगर उत्तर प्रदेश और बिहार की बात करें तो करीब 60 फीसदी से ज्यादा मजदूर दूसरे प्रदेशों में रहकर काम कर रहा था अब जब सभी मजदूर वापस घर लौटेंगे तो जाहिर सी बात है कि प्रदेश में बेरोजगारी का दबाव बढ़ेगा लेकिन इसके साथ ही कई फायदे होंगे, जैसे सस्ती मजदूरी जिसका फायदा मजदूर और काम कराने वाले दोनो पक्षों को होगा, क्योकि बड़े शहरों में रहने खाने का खर्चा भी बेहद महंगा हो जाता है, और पैसा नहीं बच पाता।

बात कुछ भी हो सरकार कुछ भी कहती रहे कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों और छोटे मोटे तकनीक कामगारों को दोबारा बुलाने के लिए सरकारों को नई नीतियां बनानी पड़ेंगी और उनका पालन सख्ती से कराना पड़ेगा। क्योंकि इसके बिना तो मजदूर जाने से रहे, अभी भी करीब 80 प्रतिशत मजदूरों और प्रवासी कामगारों का पैसा ठेकेदारों, कंपनियों के पास अटका हुआ है जिसको लेकर सरकारें सुस्त है, और मजदूर किसी बात को नहीं भूलता अगर सरकारों द्वारा अपने प्रदेशो में चल रही प्रणाली में सुधार नहीं लाया गया तो कारखानों में जंग लगने की नौबत आ सकती है।

उदय बुलेटिन के साथ फेसबुक और ट्विटर जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

उदय बुलेटिन
www.udaybulletin.com