दुबे जी बनने गए थे चौबे और छब्बे बनकर वापस आये, व्हाट्सएप कांड पर कथा सुनिये बतोले चचा से

व्हाट्सएप कांड पर सुनिए बतोले चचा की कहानी
दुबे जी बनने गए थे चौबे और छब्बे बनकर वापस आये, व्हाट्सएप कांड पर कथा सुनिये बतोले चचा से
व्हाट्सएप कांड पर कथा सुनिये बतोले चचा सेUday Bulletin

तो गुरु मौसम है सर्दी का और सर्दी माता हल्के-हल्के तरीके से तेवर में आ रही है लोग जिन जैकेट और स्वेटर को बेकार समझ कर रद्दी में फेंक चुके थे उन्हें बड़े प्यार से ईजी से धोकर सुखाया और पहना जा रहा है। लेकिन हमारा आज का मुद्दा सर्दी का नही है बल्कि स्वेटर और जैकेट वाली बात से जुड़ा है। नजर कीजिये कि व्हाट्सएप भैया कुछ दिनों से खलीफा बन के घूम रहे थे कि हम है तो कोई है ही नही लेकिन एक चाल ऐसी चल गए कि लेने के देने पड़ गए। रायता इत्ता फैल गया कि खुद समेटा नही हो रहा तो अखबारों में विज्ञापन देकर सम्भाला जा रहा है लेकिन हमारी नजर में ये रायता इत्ता सस्ते में सिमटना मुश्किल है। गुरु ये इंडिया है, यहां हमने सिकंदर को उलटा दिया था तुम तो जुगरबर्गवा की औलाद हो तुम्हारी कोई गिनती ही नही है।

व्हाट्सएप आया तो भौकाल में लेकिन मामला ही उलट गया:

तो मामला ये है कि एक जगजाहिर इंस्टैंट मैसेजिंग एप है नाम है व्हाट्सएप याद दिला दें कि यही वो एप है जिसने टेलीकॉम इंड्रस्टी की लंका लगाई थी जब 2 रुपये में 180 करेक्टर का मैसेज भेजा जाता था। तो हुआ कुछ ये की लगभग इसी वक्त जनवरी 2009 में जेन कूम नाम के खतरनाक सोच वाले आदमी ने सोचा कि क्यों न ऐसा कोई एप्लीकेशन बनाया जाए जिससे लोग मैसेज करके आपस मे बात कर सके और हुआ भी कुछ ऐसा ही। व्हाट्सएप आया और दुनियाभर में छा गया और 2014 में इसपर नजर पड़ी सोशल मीडिया के दादा (फेसबुक) की। जिसने व्हाट्सएप के निर्माता को लगभग 20 अरब डॉलर की भारी भरकम रकम देकर खरीद लिया और साथ ही दुनिया को जानकारी दी कि अब से हमेशा के लिए व्हाट्सएप मुफ्त मुफ्त मुफ्त रहेगा (वो बात अलग है कि सयाने कई बार बोल चुके है कि दुनिया मे कुछ भी मुफ्त नही है)।

तो अब कहानी ये हुए कि व्हाट्सएप आराम से लोगों के स्मार्टफोन में लगातार इंस्टाल होने लगे, लोग आराम से बतियाते और निश्चिंत रहते कि उनकी चैट और उनका डाटा बेहद सुरक्षित है कोई दूसरा पढ़ नही सकता और इससे पहले जब व्हाट्सएप ने अपनी नई डेटा नीति जारी की थी तो उसमें लोगों को यह विकल्प दिया था कि लोग चाहे तो अपने डेटा को फेसबुक के साथ शेयर कर सकते है ओर नही चाहते तो नही भी कर सकते।

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इसके बाद शुरू हुआ कनपुरिया बवाल लोगों ने पहिले तो व्हाट्सएप को खरी खोटी सुनाई और उसके बाद शुरू हुआ बहिष्कार आंदोलन। देश दुनिया से लोगों ने व्हाट्सएप को दरकिनार करने की मुहिम चलाई और विकल्प तलाशे जाने लगे और मिले भी कर्रे वाले विकल्प जैसे टेलीग्राम, सिग्नल और भी कई मैसेजिंग एप जो कई बार काम करने की क्षमता और डाटा सुरक्षा में व्हाट्सएप के पापा जी निकले।

फिर शुरू हुआ व्हाट्सएप का रोना धोना:

आखिर वही हुआ जिसकी उम्मीद थी व्हाट्सएप के तेवर जो कानपुर के घंटाघर के ऊपर छलक रहे थे वो आकर कनपुरिया विक्रम के सामने लुढ़क गए। पहले तो व्हाट्सएप ने ज्ञान दिया कि "भैया हम आपका कोई डेटा वेटा नही ले रहे है। मेरे तो मुँह से निकल गयी, अरी मैं मर जाऊंगा टाइप, साफ सफाई दी और जब इतने पर भी बात नही बनी तो व्हाट्सएप अपनी पालिसी के सुधारने के लिए अखबारों के कार्यालयों तक पहुँचे। लाखों करोड़ों रूपये फेंक कर बड़े बड़े अखबारों का पहला पन्ना किराए पर लिया और अपनी बात कही, लेकिन एक कहावत है कि जब तीर कमान से निकल जाता है तो उसकी दिशा नही बदली जा सकती। व्हाट्सएप को जो नुकसान हुआ था वो हो लिया। लोगों को व्हाट्सएप के विकल्प मिलने शुरू हो गए और जो व्हाट्सएप अभी तक भारत मे नम्बर एक कि पोजिशन पर था, आस पास भी कोई नही चार दिन के लफड़े में वही व्हाट्सएप नए लौंडे सिग्नल से भारत मे पिछड़ गया।

तो अब माजरा ये है कि व्हाट्सएप भी प्रयोग करने वालों की सर्दी को देखकर पुराने स्वेटर तलाश रहा है ताकि लोगों के जाने की सुरसुरी से निजात मिल सके। दरअसल व्हाट्सएप का प्लान था कि लोगों की जानकारी को फेसबुक के लिए प्रयोग किया जाएगा और खूब माल कमाया जाएगा (जैसा हमने पहले बताया था कि दुनिया मे कुछ भी मुफ्त में नही मिलता) लेकिन अब वही व्हाट्सएप लोगों से मिन्नतें करते हुए नजर आ रहा है, देखना यह है कि इस सारे घटनाक्रम में व्हाट्सएप की दशा क्या होती है।

डिस्क्लेमर: देखो अगर किसी को दुबे चौबे से टेंशन हो तो फालतू में टेंशन न लो हम भी पंडिते जी है, बांकी चाहे व्हाट्सएप हो या कोई और हमें जो खलेगा, लिखेंगे और लिखते रहेंगे, मस्त रहो और खूब सारे गर्म कपड़े पहनो ताकि सर्दी वर्दी से बचे रहो।

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उदय बुलेटिन
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