कैसे एक क्रीम ने किया था अंग्रेजी हुकूमत का विरोध, कहानी आपको चौंका देगी

जानिए कैसे बोरोलीन क्रीम ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ खोला था मोर्चा
कैसे एक क्रीम ने किया था अंग्रेजी हुकूमत का विरोध, कहानी आपको चौंका देगी
कैसे एक क्रीम ने किया था अंग्रेजी हुकूमत का विरोधGoogle Image

अगर बात आज़ादी के परवानों की होगी तो भारत के कई वीर सपूत इस फेहरिस्त में सामने आएंगे लेकिन अगर आपसे यह कहा जाए कि एक एंटीसेप्टिक और सौंदर्य प्रसाधन में प्रयुक्त क्रीम अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ उतरी थी तो आपके दिमाग की घंटी बज जाएगी। ये महज कोई कहानी नही, बल्कि एक सत्य घटना है जिसमें अंग्रेजी हुकूमत की आर्थिक नीतियों के खिलाफ हल्ला बोला था यही नही भारत देश के गरीबों के लिए महंगे अंग्रेजी उत्पादों से निजात दिलाने की मुहिम शुरू की थी।

बोरोलीन-नाम तो सुना होगा:

बोरोप्लस हो या बोरोसेफ ये सब तो आज के उत्पाद है, इस प्लस वाले फार्मूले पर सबसे पहले भारत मे निर्मित की गई थी बोरोलीन, वही जो गहरे हरे रंग के मेटल की ट्यूब में क्रीम आती थी जिसका प्रयोग लगभग त्वचा की हर बीमारी में अनायास ही कर लिया जाता है। फिर चाहे वह कटा फटा हो, घाव हो, होंठ फटे हो, गाल फटे हो या त्वचा रूखी हो। लगभग हर त्वचा सम्बंधित बीमारी का घरेलू वैद्य। आज हम उसी क्रीम की चर्चा करेंगे जिसने अंग्रेजी हुकूमत की मार्केटिंग नीति को घुटनों पर ला दिया था। जिस क्रीम ने भारत को सिखाया की वह आत्मनिर्भर होकर अपने उपभोग के उत्पादों का निर्माण अपने तरीके से कर सकता है।

1929 का साल जब देश मे अंग्रेजी हुकूमत के साथ टकराव के लगातार मामले सामने आ रही थे। एक ओर जहां क्रांतिकारी हथियारों के बल पर अंग्रेजी सरकार को उनके खून का स्वाद चखा रहे थे वही नरम दल के देशभक्त धरनों और आंदोलनों से अंग्रेजी हुकूमत की नींव को हिला रहे थे उसी समय बंगाल की जमीन पर एक मध्यम वर्ग का उद्योगपति गौर मोहन दत्ता अंग्रेजी वाणिज्य नीतियों कब खिलाफ बिगुल फूँक रहा था। दरअसल उस वक्त ब्रिटिश सरकार अपने देश में बने अंग्रेजी उत्पादों को बेहद महंगे दामों में भारतीयों को खरीदने पर विवश कर रही थी, उस वक्त दत्ता ने जीडी फार्मास्युटिकलस के नाम से एक कंपनी खड़ी की और उस कंपनी में निर्माण की जाने लगी बोरोलीन एंटीसेप्टिक क्रीम और इस क्रीम का खुमार भारत मे इस तरह चढ़ा की क्रीम के सामने महंगे अंग्रेजी उत्पाद पानी भरते हुए नजर आने लगे। क्रीम ने अपनी उपयोगिता और सस्तेपन की वजह से बेहद लोकप्रियता पाई और आज करीब 90 साल बाद भी हर भारतीय के घर मे बोरोलीन का मिलना बेहद आम है।

आयुर्वेदिक क्रीम बनी विदेशी उत्पादों का विकल्प:

अगर आपको लगता हो कि ये क्रीम कोई अंग्रेजी साल्ट पर बनी क्रीम हो तो ये आपका वहम है। दत्ता ने इस क्रीम को बेहद आयुर्वेदिक फार्मूले पर निर्मित किया और हर मामले में क्रीम अंग्रेजी दवाओं और सौंदर्य प्रसाधन के ऊपर बढ़ाती हुई नजर आयी। इस क्रीम में मुख्य रूप से टंकण आमला (बोरिक एसिड), जसद भष्म (जिंक आक्साइड) सुंगंधित इत्र( एरोमा/ या परफ्यूम) मोम (पैराफिन) नीम निबौली का तेल (ओलियम आयल) इत्यादि घटक शामिल थे, एक वक्त यह भी आया कि जब ब्रिटिश हुकूमत को यह लगा कि यह क्रीम अब बंगाल की जमीन से निकल कर पूरे भारत मे भेजी जा रही है और जमकर बिक्री हो रही है तो सरकार ने कई नियमावली बिना वजह लाद दी और नियमो का हवाला देते हुए कई बंधन भी बढ़ाये ,लेकिन कहते है ना कि सच्चाई की जीत होती है। एक वक्त यह भी आया कि जब बोरोलीन पने शाबाब पर थी और ब्रिटानिया सरकार भारत छोड़कर अपने ब्रिटेन की तरफ जा रही थी, यही कारण था जब भारत को 15 अगस्त 1947 में मध्य रात्रि को आजादी मिली तो दत्ता की कंपनी ने जरूरतमंद लोगों के बीच करीब एक लाख क्रीम की ट्यूब मुफ्त में बाट दी थी।

सबसे अहम बात:

अगर बात गुणवत्ता और कार्यकुशलता की आती है तो बोरोलीन इस मामले में सबसे आगे नजर आती है, जानकार बताते है कि इस क्रीम की मनमोहक खुशबू और असर आज भी उतना ही है जितना वर्षों पहले था, बस अंतर हुआ है तो पैकिंग का पहले धातु की ट्यूब में पैकिंग होती थी अब वह प्रतिस्पर्धा के कारण प्लास्टिक की ट्यूब और डिब्बी में आ चुकी है, कंपनी की हालत की बात करें तो यह शायद भारत मे अपने प्रोफेशन से जुड़ी पहली कंपनी है जिसके ऊपर भारत सरकार का 90 वर्षों में भी एक रुपया कर्ज नही है।

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उदय बुलेटिन
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