Hindi Poet Shyam Narayan Pandey
Hindi Poet Shyam Narayan Pandey|Uday Bulletin
ब्लॉग

एक कवि जो सत्ता की टेड़ी नजर से मारा गया, अगर नाम भी याद हो तो बताना। 

कवि भले ही लोकतंत्र के किसी स्तम्भ में न गिना जाता हो, लेकिन शायद कोई ऐसा स्तम्भ नहीं होगा जिसमें कवि की आवश्यकता न होती हो !

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

Summary

कवि भले ही लोकतंत्र के किसी स्तम्भ में न गिना जाता हो, लेकिन शायद कोई ऐसा स्तम्भ नहीं होगा जिसमें कवि की आवश्यकता न होती हो, लेकिन एक कवि भारत मे ऐसा भी हुआ जिसे राजनैतिक उपेक्षा के कारण न सिर्फ गुमनाम करार दिया गया बल्कि उसे साम्प्रदायिक भी घोषित कर दिया गया।

“रण बीच चौकड़ी भर-भर के चेतक बन गया निराला था, राणा प्रताप के घोड़े से पड़ गया हवा का पाला था”

ये कविता तो याद है न, कवि का नाम बताइए ? जरा जोर डालिये !

याद नहीं आया होगा, चलिये बता देते हैं, ये पंक्तियां कवि " श्याम नारायण पांडेय जी" ने लिखी थी। जब कभी भी राणा प्रताप का वर्णन आएगा तो यकीनी तौर पर पांडेय जी की ये पंक्तियां आपको राणा के चरित्र चित्रण में सहायक होगीं। पिछले हफ्ते की 27 वी तारीख उनकी पुण्यतिथि मानी जाती है, आज उनकी लेखनी पर प्रकाश डालने का प्रयास होगा।

जन्म और शिक्षा :

भारत का यूनाइटेड प्रॉविंस और इस समय का उत्तर प्रदेश, जिसके एक जिले आजमगढ़ के गांव डुमरांव में श्री रामाज्ञा पांडेय के यहाँ पुत्र रत्न के रूप में जन्मे और जन्म के कुछ समय बाद ही पिता असमय काल कवलित हो गए। मरते समय बच्चे श्याम को श्री रामाज्ञा पांडेय जी ने अपने छोटे भाई को अपने बेटे की जिम्मेदारी दी और छोटे भाई ने अपने भतीजे की शिक्षा-दीक्षा में कोई कसर नही छोड़ी। यही कारण था कि योग्यता के बल पर श्याम नारायण पांडेय जी आगे चलकर "माधव संस्कृत महाविद्यालय काशी में आचार्य के पद पर सुशोभित हुए, आचार्य जीवन पर्यंत कविताओं में समय खपाते रहे।

ओजपूर्ण कविताओं से भरा रहा कोष :

कविता पाठ में उनके समकालीन कोई ऐसा ओजस्वी वक्ता नजर नहीं आता। लोग उनके कविता पाठ को सुनने के लिए मिलों पैदल चलकर आते थे। 1939 में उनकी कालजयी रचना "हल्दीघाटी" एक ऐसा खण्डकाव्य बनी जो युवाओं और विद्यार्थियों की "गीता" साबित हुई। उस वक्त हर युवा में राणा प्रताप मानो बस से गए थे। गर्म दल के क्रांतिकारी भी इसे पढ़कर खून को गर्म कर लेते थे। उनकी रचनाओं में "जौहर, तुमुल, जय हनुमान, जय परसुराम, शिवाजी, माधव, रिमझिम, आरती, मुख्य है जिंनमे उनकी लेखनी ने जो भी लिखा अद्भुत लिखा।

तत्कालीन राजनीति और उनकी कविता :

देखिए सत्ता का वर्चस्व सदैव से उन्मुक्त रहा है शायद यही पांडेय जी के साथ हुआ, पांडेय जी कभी भी राज्याश्रयी नहीं हुए यही कारण था कि उन्होंने केवल एक व्यक्तित्व पर एक कविता ही लिखी जिसके कारण उन्हें लंबे समय तक सांप्रदायिक माना गया।उन्होंने उस समय संघ के सर्वेसर्वा माननीय केशव हेडगेवार जी को समर्पित कुछ पंक्तियां सौपी थी।

केशव तुमको शत शत प्रणाम,आदमी की मूर्ति में देवत्व का आभास,देवता की देह में हो आदमी का वास,तो उसे क्या कह पुकारे ? कैसे आरती उतारे?

सन 1989 का साल उन्होंने इस देह का त्याग किया लेकिन 1947 के बाद से ही उन्हें मुख्य कविधारा की पंक्तियों से बाहर निकाल कर रखा गया। कारण सिर्फ एक था कि उन्होंने उस वक्त के नेताओं की महिमा का गायन नहीं किया। अब शायद किसी पाठ्यक्रम में ही आपको हल्दीघाटी पढ़ने को मिले।

उदय बुलेटिन के साथ फेसबुक और ट्विटर जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

उदय बुलेटिन
www.udaybulletin.com