जिन्होंने चीन के सैनिकों को कूट दिया उनको जानते भी हो क्या?

बतोले चचा से जानिए उन वीर भारतीय सैनिकों के बारे में जिन्होंने चीन के सैनिकों को नानी याद दिला दी थी।
जिन्होंने चीन के सैनिकों को कूट दिया उनको जानते भी हो क्या?
Special frontier forceUday Bulletin (Edited)

तो बीते दिनों चीन सीमा पर चीनी सिपाही अपना बोरिया बिस्तर फैला कर भारत की तरफ आंखे निकाल कर बैठे थे लेकिन तभी भारतीय सीमा की तरफ से काले सायों ने तेज तरीन हमला करके चीनी छोटी आंखों को बड़ा कर दिया और खसोट के पीछे की तरफ फेंक दिया, लेकिन मजे की बात यह रही कि इसमें भारतीय सेना की जगह एक बेहद अलग फोर्स के सिपाही थे जो कहिने को तो पैरामिलिट्री है लेकिन तामझाम, साजो सामान बिल्कुल अलग दरअसल ये थी स्पेशल फ्रंटियर फोर्स।

इस बल के बारे में लोग उतना ही जानते है जितना वो बताना चाहती है" एक कहावत है सोई जानय जेहि देव जनाई" कहने का मतलब अगर कोई महापुरुष आपके सामने आकर ये ज्ञान दे कि हम स्पेशल फ्रंटियर फोर्स के बारे के सब जानते है तो गुरु ये समझ लो सामने वाला ज्ञानी या तो कोरा झूठ फेंक रहा है या कोई सस्ता नशा करके आपके पास उतारने आया है। कहने का मतलब यह है कि भैया इस बल के बारे में पूरा और पक्का केवल स्पेशल फ्रंटियर फोर्स वाले ही जानते हैं और वो आपके पास आकर बताने से रहे और बांकी वहां जाकर जानकारी लेने की औकात हमारी और आपकी तो छोड़ो उनकी भी नही जिनके चाचा विधायक हैं।

तो कुल मिलाकर जितनी जानकारी रिसर्च में सामने आई है वो ज्ञान की घुट्टी आपको पिलाते हैं और अपने देश के इस बहादुर बल के बारे में जानकर गर्व महसूस करो।

शुरुआत की कहानी:

इस बल के गठन के बारे में भी क्षेत्रवाद का खासा बोलबाला है दरअसल इस बल का गठन भी चीन के दुराचार को माकूल जवाब देने के लिए तैयार किया गया था इसकी शुरुआत सन 1957 से चीनी प्रभुत्व के विद्रोह के कारण हुई। दरअसल उस समय चीन अपने प्रभाव के बल से आसपास के देशों पर कब्जा करने की निति पर काम कर रहा था और इसका शिकार तिब्बत भी बना, तिब्बत मने दलाई लामा वाला।

तो हुआ क्या कि चीन के कष्टों की वजह से तिब्बतियों ने एक सेना टाइप का सिस्टम तैयार किया जिसमें युवा और जुझारू लड़ाके तैयार किये गए नाम रखा गया "चुशी गैंगड्रुक" (Chushi Gangdruk) और इस दल का काम था चीनी सेना के जुल्मों सितम का जवाब देना। उस वक्त चीन के वर्चस्व को दबाने के लिए दुनिया के दादा अमेरिका ने इस गठन पर अपनी नजर जाहिर की कहा तो ये भी जाता है कि चीन की सेना को तमाचा मारने के मूड में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने इन करीब 20 हजार लड़ाकों को ट्रेनिंग भी दी और हथियार देने की बात भी कही।

तिब्बती विद्रोही दल को यह उम्मीद थी की अमेरिका चाचा हथियार दे देगा और ऐन वक्त पर अमेरिकी एजेंसी ने ठेंगा दिखा दिया कहिने का मतलब हथियार तो दिए लेकिन फुस्सी पटाखा जैसे मतलब काफी पुराने और प्रयोग में न आने वाले हथियार। विद्रोही दल ने चीन की सेना का विरोध किया लेकिन फुस्सी हथियारों के दम पर कुछ बन बिगड़ नहीं पाया और चीन ने तिब्बत का विद्रोह को दबा दिया और दलाई लामा पर इतने जुल्मो सितम हुए कि दलाई लामा को वहां से निकलना पड़ा।

उसी दौरान सन 1962 में भारत की चीन के साथ ठन गयी और राजनीतिक कारणों के साथ-साथ सैन्य कारणों से भारत को हार के साथ साथ सैन्य जीवन की भारी हानि हुई। भारत ने चीन के साथ बातचीत तो जारी रखी लेकिन भविष्य की संभावनाओं के लिए पहिले से तीर तलवार तैयार रखने की योजना बनाई। दलाई लामा तिब्बत से निकल कर निर्वासित रूप में भारत आये और उनके साथ आये तिब्बती लड़ाके, अपने दिल मे आजाद तिब्बत का सपना लिए हुए। जिसमे उनकी चाहत में पंख लगाए भारत ने।

भारत में हुआ गठन:

अब इसे आपदा में अवसर खोजना जैसा कहें या तकलीफ में आये लोगों को पनाह देने वाली बात हो, चूंकि दलाई लामा के साथ आये लोगों में दलाई लामा के प्रति आस्था तो थी ही साथ ही आजाद तिब्बत का सपना भी। जिसे भारत के सैन्य अधिकारियों और खुफिया एजेंसी इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) ने एक प्लान बनाया कि काहे न रिबेल सिपाहियों को उसी चीन के खिलाफ प्रयोग किया जाए जिसने उन्हें उनकी सरजमीं से बेदखल कर दिया। उस वक्त के इंटेलिजेंस ब्यूरो के मुखिया बीएन मलिक ने इसके बाद इस बारे में एक योजना बनाई और भविष्य के तामझाम के लिए प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को अवगत कराया। चाचा नेहरू पहले ही चीन के हाथों शिकस्त खाये बैठे थे सो मामला पक्का होना तय था, सो सेना के कुछेक बड़े अधिकारियों जैसे मेजर जनरल सुजान सिंह जैसे अधिकारियों को जिम्मा दिया गया कि इन लड़ाकों को जो पहिले से दिल मे सुलगती आग को दबाए बैठे थे इनको बाकायदा ट्रेनिंग दी जाए, बढ़िया हथियार और नई युद्ध कलाएं सिखाई जाए, आखिरकार वक्त गुजरता रहा और एक पुराने ट्रेनिंग सेंटर में इन लड़ाकों को ट्रेनिंग दी जाती रही और 14 नवंबर 1963 में एस्टेब्लिशमेंट 22 फोर्स (establishment 22 force) नाम से एक बल का गठन किया गया लेकिन 1967 के आते-आते इसे स्पेशल फ्रंटियर फोर्स (special frontier force) नाम भी दे दिया गया।

बल की विशेषता और कार्यप्रणाली:

इस बल का गठन भी बेहद खुफिया ऑपरेशन के लिए ही किया गया था जिसका मुख्य काम था बेहद गोपनीय जानकारी जुटाना, जरूरत पड़ने पर मुंहतोड़ जवाब देना। लेकिन यह बल सेना से लगभग अलग ही रहा, भले ही इसके अधिकारी मुख्यतः सेना से ही होते हैं लेकिन इस बल का सेना से घुलना-मिलना नहीं रहता। ये बात अलग है कि ये यह बल सेना के सहयोगी बल के तौर पर कार्य करता है जब भी जरूरत होती है यह बल अपनी पूरी ताकत के साथ दुश्मन के छक्के छुड़ाता है।

वक्त बीतता रहा यह बल इंटेलिजेंस ब्यूरो से हटकर रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (RAW) के अन्तर्गत आया जो पहले से खुफिया काम करने के लिए जानी जाती है और इस एजेंसी का काम देश को बाहरी और कुछ मामलों में आंतरिक खतरों से बचाना भी होता है। इस दौरान यह आवश्यकता महसूस हुई कि अगर डायरेक्ट हमले की जरूरत पड़े तो RAW के पास एक निजी बल होना चाहिए जो सीधे रॉ और प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करे। खैर SFF को RAW के अंतर्गत लाया गया और यह बल तब से भारत को अपनी सेवाएं अनवरत रूप से दे रहा है।

क्या है इस बल की क्षमता?

देखो चाहे हिमालय की ऊंचाइयों पर चढ़वा दो या तिब्बत की ऐसी जगहों पर जहाँ पर आम आदमी (राजनैतिक दल वाले नहीं) को सांस लेने में तकलीफ हो वहां ये लड़ाके कबड्डी खेल सकते हैं। मतलब भगवान ने इनके जमीनी हिसाब से इतनी क्षमता दे दी है कि ये पैदाइशी खिलाड़ी और पहलवान होते हैं। इस बल के जवान गुरिल्ला वारफेयर, खुफिया जानकारी जुटाना, जरूरत पड़ने पर सामने वाले को जमीन पर लिटा देना बढ़िया तरीके से करते हैं। इस बल की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) में इस बात का हमेशा से ख़ौफ़ रहता है कि भगवान करे उनका सामना SFF वालों से न हो, कहिने का मतलब पावर हाई है।

बेहद गोपनीय है जीवन:

अगर इस बल की बात करे तो इसमे शामिल लड़ाके ( जिसमे महिलाएं भी शामिल है) केवल पैसे के लिए काम नहीं करते उनकी आँखों मे एक सपना है आजाद तिब्बत और इसके साथ ही बेहद खुफिया होने की वजह से किसी अन्य आदमी को पता ही नहीं होता कि बगल में बैठा आदमी SFF से है इनकी भर्ती, ट्रेनिंग और लगभग हर चीज बेहद गोपनीय होती है। मौका पड़ने पर देश की सेवा के लिए हमेशा तत्पर रहती है फिर चाहे वह मामला कारगिल का हो या ऑपरेशन ब्लू स्टार या 1971 का चटगांव ऑपरेशन सभी जगह इस बल ने भारत की तरफ आंख उठाने वाले की आखों में आक का दूध डालकर अंधा कर दिया।

उदय बुलेटिन इस बल की वीरता और साहस को प्रणाम करता है।

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उदय बुलेटिन
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