ट्रंप को नसीहत और भारत में चुप्पी, पढ़े शिवजीत तिवारी का लघु ब्लॉग

जो बाइडेन जीत चुके है तो इतना हो हल्ला क्यों ?
ट्रंप को नसीहत और भारत में चुप्पी, पढ़े शिवजीत तिवारी का लघु ब्लॉग
ट्रंप को नसीहत और भारत में चुप्पीGoogle Image

लकवा बेहद तकलीफदेह बीमारी है जिसकी वजह से शरीर की मांसपेशियां ऐंठ जाती है स्नायुतंत्र अकर्मण्यता को अपना अधिकृत मान लेता है। सबसे विलक्षण बात तो यह है कि यह बीमारी बेहद विलक्षण है इसके होने और न होने के कई कारण है। यह अंग प्रत्यंग पर अलग अलग प्रकार से कार्य करता है। जब यह शरीर के पक्ष में अपना प्रभाव जमाता है तो इसे पक्षाघात कहा जाता है और जब यह जुबान जैसी महत्वपूर्ण जगह पर लगता है तो यह सिर्फ लकवा ही कहलाता है। खैर हम भी कहाँ किसी बीमारी के बारे में चर्चा करने बैठ गए हमारा उद्देश्य तो भारत और अमेरिका में एक काल खंड में हुई घटनाओं का समानांतर विश्लेषण करने का था, खैर लौट आते है असल मुद्दे पर।

अगर आपने उत्तर भारत के ग्राम पंचायत के चुनाव देखे होंगे तो आपको अमेरिकी चुनावों से कोई खास अलग नजर नही आया होगा, एक हारा हुआ प्रधान दूसरे जीते हुए प्रधान के उपर जानबूझकर। मिल मिलाकर चुनाव हराने के आरोप लगाता है। ठीक ऐसा ही कुछ अमेरिका के चुनावों में हो रहा है, अमेरिका में हुए हाल के चुनावों में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जो बाइडेन ने डोनाल्ड जे ट्रंप को भारी मतों से हराया है लेकिन ट्रंप है जो इस बात को स्वीकारने के पक्ष में ही नही ही, खैर देर सबेर इस बात का एहसास ट्रंप को होगा कि आखिर ये सब टंटा क्यों? चुनाव प्रक्रिया को अपवाद कारणों के चलते प्रभावित तो किया जा सकता है लेकिन हार जीत वो भी इतने बड़े अंतर से असम्भव वाली बात है।

इस दौरान कुछ ऐसा हुआ जिसकी किसी को उम्मीद नही थी। ट्रंप समर्थको ने कैपिटल बिल्डिंग पर धावा बोलकर अपना विरोध जताया। यह अमरीकी इतिहास का पहला क्षण था जब किसी चुनाव को लेकर इतनी खींचातानी नजर आयी हो। जीते हुए प्रत्याशी बाइडेन ने तो इसे अमेरिकी इतिहास का काला अध्याय तक कह डाला। इस पर भारत के बुद्धिजीवियों की तरफ़ से बयान नही आये थे जिसको लेकर मुझे निजी तौर पर चिंता हो रही थी, आखिरकार मेरी इच्छा पूर्ण हुई, भारत मे बैठे नेता, राजनेताओं, पत्रकारों और विश्विद्यालयों में पढ़ाने वाले युवा प्रोफेसरों, अभिनेत्रियों की तरफ से झकाझक बयान आने शुरू हो गए। सभी ने आशा अनुरूप ट्रंप और उनके समर्थकों की इस हरकत को गलत ठहराया।

लोगों ने कहा कि जब चुनाव हो ही गए है बाइडेन जीत चुके है तो इतना हो हल्ला क्यों ? बात भी सही है आखिर जब किसी जंग में दो योद्धा लड़ते है तो उनमें से किसी एक को हारना पड़ता ही है। इसलिए ट्रंप को चाहिए कि वो जनादेश को स्वीकार करें और अपने बयानों, नीतियों और हरकतों पर आत्ममंथन करें।

लेकिन अपना क्या?

भारत मे 2014 के बाद से शायद कोई ऐसा चुनाव हो जिसमें सत्तारूढ़ पार्टी (भाजपा) ने चुनाव जीता हो और ईवीएम पर बेवफाई का आरोप न लगाया गया हो। यही नही कई बार तो इलेक्ट्रॉनिक कारपोरेशन ऑफ इंडिया और भारत इलेक्ट्रॉनिकश लिमिटेड द्वारा बनाई गई ईवीएम की नकलची कॉपी लेकर बाकायदा विधानसभाओं में अभिनय भी किया गया। सत्ता न पाने की स्थिति में मतदान की प्रक्रिया को न सिर्फ दोषी बनाया गया बल्कि इसे कंडक्ट कराने वाले चुनाव आयोग पर लांछनों का पुलिंदा फेंका गया। अगर भारतीय चुनावों पर नजर डाले तो शायद कोई भी ऐसा चुनाव नहीं हुआ जिसमें इस तरह के बवाल न हुए हो। देश की संसद से लेकर विदेशों की सरजमीं तक इस तरह के आरोपों प्रत्यारोपों को दिखाया गया और सबसे मजेदार बात यह है कि ये वही लोग है जो ट्रंप की बेहूदगी वाली हरकत को गलत ठहरा रहे है।

मार जाता है जुबान पर लकवा:

दरअसल ये वो स्थिति है जब जब किसी व्यक्ति को ज़ुबान पर लकवा मार जाए अब इसे पूर्वाग्रह कहा जाए या फिर खुद गुड़ खाकर मिठाई की आलोचना करना कहा जाए। अगर बुद्धिजीवियों की आलोचना को देखा जाए गो इसमें यह साफ साफ नजर आता है कि इन्हें अमेरिका में होते अनैतिक विरोध का मतलब तो समझ मे आता है लेकिन भारत मे ईवीएम के लिए मचता हुआ हो हल्ला समझ मे नही आता है।

डिस्क्लेमर: लेख में लिखे गए विचार लेखक के निजी विचार है, लेख को तुलनात्मक ढंग से लिखा गया है इसे किसी पार्टी द्वारा प्रमोटेड लेख न समझा जाये

⚡️ उदय बुलेटिन को गूगल न्यूज़, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें। आपको यह न्यूज़ कैसी लगी कमेंट बॉक्स में अपनी राय दें।

Related Stories

उदय बुलेटिन
www.udaybulletin.com