Hindi Diwas
Hindi Diwas|Uday Bulletin
ब्लॉग

हिंदी अज्ञानता की नहीं, श्रेष्ठ भाषा की परिचायक है।

भारत विभिन्न भाषाओं का देश है और हर भाषा का अपना महत्व है परन्तु पूरे देश की एक भाषा होना अत्यंत आवश्यक है जो विश्व में भारत की पहचान बने !

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

Summary

“अ कुमार ट्रेन में यात्रा कर रहे थे, उनका रिजर्वेशन वेटिंग का था, उन्होंने टीटी से बेहद मधुर तरीके से हिंदी में बात की, हालांकि उससे कोई खास फर्क नही पड़ा, लेकिन जैसे ही टीटी के पास ब कुमार आये और उन्होंने अंग्रेजी का मारक शब्द” एक्सक्यूज मी” का प्रयोग किया टीटी ने न सिर्फ उन्हें सीट मुहैया कराई बल्कि बाद में थैंक्स भी कहा !

भाषागत विभेद यहीं से परिभाषित हो जाता है, हिंदी ने आपको आज के परिवेश में प्रिमिटिव घोषित बना कर रखा हुआ है, आप चाहे अनचाहे इस भितरघात का शिकार होते चले जाते है।

आखिर कैसे हुआ यह पतन :

सही-सही कारण तो ज्ञात नहीं लेकिन इसमें किसी आम नागरिक या भाषा के बोलने वाले की करतूत नही, दरअसल यह एक सोची समझी साजिश के तहत किया गया बड़े स्तर का काम है, विदेशियों ने भारत मे जब अपने कदम मजबूत किये तो उनका सबसे पहला काम भारत की आत्मा को कुचलना था, और आत्मा तो आम बोलचाल की भाषा ही थी, हालकि भारत मे हिंदी के अलावा भी तमाम भाषा रही लेकिन अधिकतर हिंदी से मिलती जुलती या हिंदी से उत्पन्न थी, तो सबसे ज्यादा दंश हिंदी ने ही झेला, कभी फ़ारसी , तो कभी अंग्रेजी ने अमरबेल की तरह हिंदी को अपने कब्जे में लेकर इसका रस निचोड़ कर खुद को पल्लवित किया, जिसका परिणाम आपके सामने है।

दरअसल समस्या दूसरी भाषाओं या उनके प्रयोग की नही है , समस्या हमारे बर्ताव और दूसरे की भाषा को सहन करने की स्थिति में है, हम अगर किसी को अंग्रेजी बोलते हुए देखते है, हम वैचारिक रूप से उसके सामने हथियार फेक कर नतमस्तक हो जाते है,

गौर करने वाली बात तो यह है कि आज न तो कोई विदेशी आक्रमणकारियों का भय है न ही विदेशी हुकूमत का ,लेकिन हम अब भी अपने ट्रैक पर दौड़े जा रहे है।

भाषा कभी स्तर का पर्याय नही होती:

इफ, नो, बट, आपको पता है ये शब्द आपकी गरिमा को नही बढ़ा सकते, आज कल अधिकतर लोग सब्जी वाले ठेले के पास खड़े होकर ग्रामर की टांग उखाड़ते नजर आ जाते है, सब्जी वाला भी आपको मन ही मन गरियाता हुआ 2 रुपये एक्सट्रा लगाकर चेप देता है और आप अपने को बुद्धिमान मानकर घर को लौट आते है।

मेरे हिसाब से मैं जो बोलता, लिखता हूँ, जिसमे मुझे महारत हासिल है, अंग्रेजी में भी सिद्धहस्त हूँ, लेकिन अगर मुझे कहीं अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का मौका मिलता है ,चाहे वह कोई मंच या स्थान हो , उसमे हिंदी का प्रयोग मेरे लिए बेहतर होगा, क्योकि मैं अपनी भावनाएं अपनी मातृ भाषा मे ज्यादा अच्छे तरीके व्यक्त से कर पाऊंगा।

हिंदी हमारी ''मात्र भाषा" नही ''मातृभाषा'' है:

हमें इस वाक्य की गहराई को समझना होगा, हिंदी केवल एक भाषा तक सीमित नही है, इसमें हमारा इतिहास है, इसमें हमारा भविष्य है, हमारी भावनाएं है, यहाँ एक बात का उल्लेख करना सर्वथा ठीक रहेगा कि दूसरी भाषाओं में कोई बुराई नही है, लेकिन एक तथ्य को स्वीकारा जाएगा कि जो स्नेह और समर्पण आपको अपनी माँ दे सकती है वह मौसी नही।

हिंदी के देश मे हिंदी दिवस मनाना किसी गाली से कम नही:

कैसा लगेगा जब आपके घर मे ही आपको जिंदा समझने के लिए एक दिन निश्चित कर दिया जाए, ये हिंदी के लिए बेहद शर्मिंदगी वाली बात होगी,

एक मंत्र जो हर बार हमारे द्वारा कहा जाता है कि

"हिंदी आपको अ अज्ञानी से लेकर अंत मे ज्ञ से ज्ञानी बना देती है"

उदय बुलेटिन के साथ फेसबुक और ट्विटर जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

उदय बुलेटिन
www.udaybulletin.com