कानून के विरोध में किसानों ने प्रदेश की फजीहत करवा दी पढ़े शिवजीत तिवारी का लघु ब्लाग

पंजाब में किसान आंदोलन के दौरान अब तक कुल 1411 मोबाइल टावर तोड़े जा चुके हैं। पंजाब में कई जगहों पर जियो के टावरों को नुकसान पहुंचाया गया है जिससे दूरसंचार सेवाएँ बाधित हुई हैं।
कानून के विरोध में किसानों ने प्रदेश की फजीहत करवा दी पढ़े शिवजीत तिवारी का लघु ब्लाग
पंजाब में किसान आंदोलन के दौरान अब तक कुल 1411 मोबाइल टावर तोड़े जा चुके हैं।Uday Bulletin

किसानों को यह पता ही नही कि उन्होंने जिन 1600 जियो के टावर्स के साथ लूटपाट (लूटपाट शब्द से आपत्ति भी हो तो भी इसे यही लिखा जाएगा) की उन्हें नही पता कि इन उपक्रमों में काम करने वाले उन्हीं किसानों के बेटे है। जरूरी नही की किसानों के विरोध करने का यही एकमात्र यही तरीका है। जानकारों के अनुसार किसान आंदोलन भी शाहीन बाग की तरह अपनी दुर्गति की ओर जा रहा है। भला रिलायंस जियो के टावर्स को तोड़कर किसान किस कंपनी को नुकसान पहुँचा रहे है, वैसे भी कोई भी कंपनी ऐसी स्थितियों में इंश्योरेंस जैसे विकल्प को बचा कर रखती है लेकिन इससे पंजाब को लेकर कंपनियों में एक खतरनाक संकेत जाएगा जिसका खामियाजा वहां के युवाओं को लंबे वक्त तक भुगतना पड़ेगा।

लगता है किसान भटक गए है या फिर इन्हें किसी कठपुतली की तरह नचाया जा रहा है:

आइये सबसे पहले किसानों के आंदोलन का मुख्य सार समझते है दरअसल भारत में केंद्र में सत्ता पर काबिज भाजपा सरकार ने नए कृषि विधेयक पारित किया जिसका मुख्य उद्देश्य भारत के किसानों की आय बढ़ाना था लेकिन पंजाब और हरियाणा को तीन कृषि कानूनों से आपत्ति होनी शुरू हो गयी जिसमें किसानों द्वारा कॉन्टेक्ट फार्मिंग और एमएसपी को लेकर सवाल खड़े करने शुरू कर दिए गए, हालांकि सभी मामलों पर केंद्र सरकार ने अपनी सफाई जारी करते हुए बताया कि कृषि कानून का मुख्य उद्देश्य किसानों की आय को बढ़ाना है। लेकिन अगर किसानों को कोई आपत्ति है तो हम उस पर चर्चा करने के लिए हमेशा तैयार है। लेकिन किसानों द्वारा शुरुआत से ही यह पक्ष रखा गया कि वो इन सभी कानूनों को वापस तो नही करेगी लेकिन अगर किसानों को किसी बिंदु से भय है या आशंका है तो उनमें सुधार की हमेशा गुंजाइश है, लेकिन अगर किसानों का पक्ष देखे तो साफ साफ यह समझ मे आता है मानो किसानों ने पहले से ही यह मन बना लिया था कि उन्हें किसी भी हालत में सरकार से समझौता नही करना है ना ही किसी कानून में सुधार की बात से सहमत होना है बल्कि सीधे सीधे कृषि कानूनों को वापस करने की बात पर अड़े रहना है।

मोबाइल टावर को नुकसान पहुँचाते गर्वित किसान:

केवल जियो को नुकसान नही, किसान मुगालते में है:

इस बवाल की शुरुआत तब हुई जब भारत के बड़े राजनीतिक दलों के साथ अन्य कुछ दलों ने किसानों के बीच जाकर यह अफवाह उड़ाई कि वर्तमान सरकार भारत के कुछ उद्योगपति परिवारों के लिए किसानों की जमीन परोक्ष रूप से नामित कर रहे है, कहने का तात्पर्य यह है कि किसानों की जमीन पर उद्योगपतियों के कब्जा हो जाएगा, इस मामले में राजनीतिक दलों द्वारा दो बड़े उद्योगपति परिवारों (अडानी और रिलायंस जियो) परिवार द्वारा किसानों का शोषण किया जाएगा, नतीजन किसान सरकार के विरोध के साथ साथ उद्योग घरानों की तरफ मुड़ गए और किसानों की संभावित दुर्गति के लिए इन दो घरानों को जिम्मेदार ठहराया। जिसमें संगठनों द्वारा जियो के बहिष्कार की शुरुआत जिओ की सिम को तोड़कर, आग में जलाकर शुरू कर दी, हालांकि जियो ने इस मामले पर किसानों और मीडिया के सामने अपना पक्ष जाहिर करते हुए बताया कि "उसका कोई व्यवसाय डायरेक्ट कृषि अथवा कृषि उत्पादों से जुड़ा हुआ नही है, इसलिए जियो का इस मामले पर कोई लेना देना नही है" लेकिन आंदोलित भीड़ सुने किसकी, नतीजन यह विरोध जियो नेटवर्क प्रोवाइड करने वाले टावरों पर टूट गया, सो काल्ड किसानों ने इसे विरोध का नायाब तरीका बताया उन्होंने बड़े गर्व से कहा कि हम जियो की नींव खोद रहे है, लेकिन अगर सही मायनों में देखा जाए तो उन्हें पता ही नही की उन्होंने क्या कर दिया है।

इस मामले में एक रोचक बात और सामने आयी, दरअसल रिलायंस जियो वो खिलाड़ी है जिसने मोबाइल इंड्रस्टी में दशकों से जमे हुए खिलाड़ियों जैसे वोडाफोन, एयरटेल, आइडिया (अब वोडाफोन आइडिया) को चारों खाने चित्त किया। इस दौरान जब किसानों का सरकार विरोधी आंदोलन जियो और अडानी के खिलाफ भड़क रहा था इस दौरान जियो ने यह आरोप लगाया कि किसान आंदोलन के बीच अन्य प्रतिद्वंद्वी नेटवर्क प्रोवाइडर एक अलग ही लहर बना रहे थे ,सोशल मीडिया में ऐसी तस्वीरें भी सामने आई जिसमें वाकायदा स्टाल लगाकर सिमों को मोबाइल नम्बर पोर्टेबिलिटी के तहत जियो को छोड़कर अन्य नेटवर्क में कन्वर्ट कराया जा रहा था, इस मामले को लेकर जियो ने नियामक प्राधिकरण में इस तरह की अनैतिक मार्केटिंग का विरोध भी दर्ज कराया लेकिन कथित तौर पर जियो को नुकसान पहुँचाने की यह नीति अन्य मोबाइल प्रोवाइडर पर भी भारी पड़ गयी , दरअसल कथित तौर पर जिस मार्केटिंग का सहारा लिया जा रहा था उसी के चलते उन कंपनियों के नेटवर्क को भी उतना ही नुकसान पहुँचा जितना जियो को हुआ है, हालांकि अगर जियो के लाभ और हानि की बात करे तो जियो पहले से ही मुनाफे में है लेकिन जो कंपनिया खुद घाटे में चल रही है इस टावर उखाड़ प्रतियोगिता में उनका नुकसान कुछ ज्यादा ही हो गया।

दरअसल सो काल्ड आंदोलनकारी जिस हिसाब से जियो के टावर उखाड़ रहे थे उन्हें लग रहा था कि इससे सीधा सीधा नुकसान जियो को होगा ,लेकिन जानकारों के मुताबिक ऐसा नही है, संभवतः जियो अपने टावर बेहद कम इंस्टाल करता है। इसकी बजाय टावर लगाने का काम किसी तीसरी कंपनी द्वारा किया जाता है और उस टावर पर सभी कंपनिया अपने अपने नेटवर्क प्रसारक उपकरण टांग देती है , सो इस लिहाज से सभी का खर्चा कम होता है और सबका काम बन जाता है, और अगर किसी टावर की बिजली काटी गई या टावर तोड़ा गया तो नुकसान सबका नेटवर्क तो सबके गायब होंगे !

बनेगी नकारात्मक छवि:हो सकता है उद्योगों का पलायन:

आपने शायद सुना होगा कि निजी कंपनियों में इंटरव्यू लेते वक्त इस बात का बेहद खयाल रखा जाता है कि अभ्यर्थी किस जगह से है। हालाँकि भले ही इसके कोई जिंदा सुबूत न हो लेकिन कई कंपनियों के मानव संसाधन कर्मचारियों ने बिना नाम बताए इस बात का खुलासा किया कि जॉब ऑफर करते वक्त इस बात का बहुत ज्यादा खयाल रखा जाता है कि व्यक्ति किस जगह से है, कही ऐसी जगह से तो नही जहां मानवीय मूल्यों को ज्यादा तवज्जो नही दी जाती कई ऐसे मामले है जहाँ जम्मू के युवाओं को बिना कारण बताए निजी सेक्टर में अयोग्य करार बिना वजह दे दिया गया। बस कारण सिर्फ एल था कि वहां एक लंबे वक्त तक बाहरी उद्योगों को हेय दृष्टि से देखा गया, कर्मियों को गोली मारी गयी। नतीजन आप भारत के कई सेक्टर देख सकते है जहां अघोषित रूप से कश्मीरी लोगों को अन्य कारणों को दिखाकर नौकरी नही दी गयी, चूंकि पंजाब पहले से ही नशे के उपभोग को लेकर चर्चा में रहा है फिर खालिस्तान ने पंजाब के युवाओं का भविष्य खतरे में डाला, अब ये किसान अपने युवाओं के भविष्य को टावर जितनी ऊँचाई पर टांग कर जी हल्का करने में जुटे हुए है।

हो सकता है उद्योगों का पलायन:

चूंकि आज इसका नम्बर है कल दूसरे का भी हो सकता है। आज हजार करोड़ का इन्वेस्ट किया जाएगा और कल किसी उद्योग के एसी, कूलर, जनरेटर गुरुद्वारों की शोभा बढ़ाएंगे। इसलिए कोई कंपनी इस भविष्य में अपना निवेश नही करना चाहेगी और इस बेरोजगारी के युग मे दूसरे कई राज्य उद्योगों को लपकने के मूड में है। उद्योगों को भांति भाती की सुविधाएं देने की बात कही जा रही है जिसमें सुरक्षा भी शामिल है, अगर सभी उद्योगों ने पंजाब जैसे राज्य से पलायन किया तो उन उपक्रमों में काम करने वाले हज़ारों लाखों युवाओं का क्या होगा? क्या किसानों को पलीते पर बिठाकर हवन करने वाले राजनीतिक दल पंजाब के युवाओं के छीनते रोजगार पर मरहम लगा सकेंगे ? उनकी बनती हुई नकारात्मक छवि को सुधार सकेंगे।

गाहे बगाहे आंदोलन की आड़ में अन्य राजनीतिक दलों ने वो तीर मारा है जिससे हिरण की बजाय घर की दुधारू गाय मरी है, हालांकि यह भी सच है कि इससे निशाना बताने वालों को कोई नुकसान नही है। नुकसान तो उनका है जिनकी गाय थी जिन्होंने दूध खाया था।

डिस्क्लेमर: लेख में लिखे गए सभी विचार लेखक के है, उदय बुलेटिन का इनसे सहमत होना आवश्यक नही है

⚡️ उदय बुलेटिन को गूगल न्यूज़, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें। आपको यह न्यूज़ कैसी लगी कमेंट बॉक्स में अपनी राय दें।

Related Stories

उदय बुलेटिन
www.udaybulletin.com