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क्या आपको पता है कि राहुल गांधी को पप्पू क्यों बुलाया जाता है? और इसकी शुरुआत कहां से हुई 

क्या राहुल गाँधी वास्तब में पप्पू हैं?

Abhishek

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मजाकिया तौर पर 2014 चुनाव से पहले राजनितिक पार्टियों ने “पप्पू” शब्द को प्रचारित किया और यह काम कर गया। लेकिन 2018 आते-आते एक नाम जो काफी प्रचलित है “फेंकू” जिसे सोशल मीडिया पर मोदी के सन्दर्भ में प्रयोग किया जाता है

बैसे तो पप्पू एक टेलीविजन विज्ञापन सीरीज से लिया गया टैग नाम है। जिसमे एक लड़का है जिसका नाम पप्पू है वो हर बार एग्जाम में फेल हो जाता है।

कदाचित BJP की IT सेल वालों ने इस शब्द को सोशल मीडिया के द्वारा जन-जन के अवचेतन मष्तिष्क में बैठा देने हेतु उछाला हो? सत्ता हासिल करने हेतु राजनीति के गलियारों में ऐसे दाँव-पेंच कोई नयी बात नहीं है। बस जनता ही बेवकूफ बन कर रह जाती है, और नेता अपना काम कर जाते हैं |

सोशल मीडिया के द्वारा ये राजनीतिक पार्टियां हमारी अनभिज्ञता में ही हमारी धारणाओं को हेरफेर कर रहे होते हैं और हम उन्माद में बह कर अपनी विवेक बुद्धि को भी यूँ ही नीलाम होने देते हैं।

किसी व्हाट्सएप्प वीडियो में हमने देख लिया कि राहुल गाँधी को पप्पू कहा जा रहा है और तत्पश्चात हम यह मान भी लेते हैं कि वे पप्पू हैं।

राहुल गांधी के प्रति ऐसी धारणा बनाने से पहले हमें स्वयं में आत्ममंथन करना चाहिए कि हम ख़ुद कितने बड़े पप्पू हैं कि यहाँ हमें जानबूझकर कोई राजनीतिक पार्टी ऐसी वीडियो दे रहा है और हमारी धारणा को अपने राजनीतिक हित के लिए गढ़ रहा होता है और हम भी अपनी बुद्धि विवेक को यूँ ही लुट जाने देते हैं। तो बताइए कौन हुआ बड़ा पप्पू? - निस्संदेह, हम सब खुद।

इसी प्रकार प्रधानमंत्री मोदी जी के लिए भी - “फेंकू” जैसे शब्द को सोशल मीडिया के द्वारा जनता के बीच प्रचलित करने का काम शायद काँग्रेस की IT सेल कर रही हो?

इस लोकतंत्र में जनता को उन्माद में बहकर किसी पार्टी का अंधप्रवक्ता या अंधभक्त बनने से बचना चाहिए और अपनी आंख और कान खुले रखने चाहिए।

जनता को थोड़ा आलोचनात्मक होना चाहिए ताकि सत्ताधारी निरंकुश ना हों तथा राजनीतिक पार्टियों व नेताओं के विषय में अपनी धारणा मीडिया की रिपोर्टों की बजाय अपने विवेक की कसौटी पर उनके कार्यों के विश्लेषण व मूल्यांकन के पश्चात ही बनाना चाहिए क्योंकि तभी हमारा निष्कर्ष प्रामाणिक व यथार्थ हो सकता है।