Delhi Violence
Delhi Violence|Uday Bulletin
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दिल्ली में हर कदम एक नई जंग है ! 

समाज को टुकड़ो में बाँटती हुई घटना को अचानक पैदा नहीं किया जा सकता, इसको पनपाने के लिए तगड़ी प्लानिंग मालूम होती है। और अभी भी पुलिस और सरकार मुगालते में है। 

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

अब इसे राजनीति की सबसे गंदी दशा कहे या फिर जानकारी होने के बाद भी देश को जलाने का जुनून, लेकिन आज का सबसे बड़ा सच यह है कि दिल्ली जल रही है, देश का दिल कहे जाने वाले शहर में तमाम बायपास सर्जरी को अंजाम दिया जा रहा है।

समाज के ठेकेदारों के काम पूरा हो गया :

दरअसल चिंगारी लगाने का काम दोनों तरफ के ठेकेदारों ने किया और दोनो पक्ष के सो काल्ड मसीहा इस काम मे न सिर्फ कामयाब हुए बल्कि अपने मकसद को बुरे से बुरे हालात में ले जाने में सफल हुए। हालांकि इसमें सबसे ज्यादा कौन आरोपी और दोषी था इसका कोई पैमाना नहीं है। लेकिन समाज को धड़ो में बांटने की कोशिशें दोनो तरफ से पूरी हुई। फिर चाहे वह वारिस पठान हो या भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर आजाद, अमानतुल्लाह खान या फिर कपिल मिश्रा। सब ने दिल्ली की शांति को भंग करने के लिए जलती हुई आग में घी डाल कर इसे भड़काने का काम किया। जिसका नतीजा आप के सामने है। देश की राजधानी दिल्ली जो चौबीसों घंटे दुनिया के कैमरों पर होती है, उसपर जमकर कालिख पोतने का काम किया गया।

आख़िर अचानक कैसे हो गया ये सब ?

अचानक कुछ भी नहीं होता हर काम के लिए एक प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष सिस्टम काम करता है। अब चाहे वह सीएए विरोधियों की बात हो या सीएए समर्थकों की बात। दोनो के अपने-अपने मुद्दे थे और दोनों के अपने-अपने तर्क। एक ओर जहां भीम आर्मी प्रमुख द्वारा शाहीन बाग की अलख को धीमा होते देखकर नए मोर्चे की जरूरत हुई तो जाफराबाद जैसी जगहों पर नए शाहीन बाग को दोहराने की कोशिश की गई। उसके उलट दूसरा पक्ष जो किसी हालात में दूसरे शाहीन बाग की त्रासदी किसी भी तरह से झेलना नहीं चाहता था, उसकी अगुवाई कपिल मिश्रा ने की और मामला बिगड़ता गया।

हमने पहले ही बताया कि आग दोनो तरफ से बराबरी से लगाई गयी है, एक बार नजर डाल लीजिये !

दिल्ली पुलिस इतनी बेबस कभी नहीं हुई :

अगर इस मामले में किसी की सबसे ज्यादा सबसे बेबसी नजर आती है तो वो है दिल्ली पुलिस। जामिया विश्वविद्यालय के नफे नुकसान के बाद दिल्ली पुलिस इस कदर मायूसी में है कि सरेआम कोई शाहरूख पुलिस के सामने पिस्टल लहरा कर निकल जाता है और गोलियां बरसाता है लेकिन पुलिस कुछ करने के मूड में ही नहीं है। दंगाइयों की पत्थरबाजी से सैकड़ो पुलिसकर्मियों को गंभीर रूप से चुटहिल होना पड़ता है और पुलिसकर्मी को जान से भी हाँथ धोना पड़ता है। लेकिन पुलिस काफी हद तक मूकदर्शक सी रहती है। अब इसे पुलिस का फूंक-फूंक कर कदम रखना कहा जाए या कुछ और, लेकिन किसी न किसी को तो जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी।

पुलिसकर्मी रतन लाल की अंतिम यात्रा, जिसने आम दिल्ली वाले के लिए अपने फर्ज से आगे बढ़कर खुद को कुर्बान कर दिया !

उन्मादी किसी के कम नही :

रही बात उन्मादियों की तो इनकी कमी किसी पक्ष में नही है, फिर चाहे वह सीएए समर्थक वाला पक्ष हो या विरोध वाला, दरअसल समस्याएं तब तक नहीं थी जब तक इसे समाज के एक तबके ने विरोध बनाये रखा। असल समस्या तब शुरू हुई जब इसमें धर्म घुलने लगा, लोग पागलों की तरह अनर्गल क्रियाकलाप करने लगे जिसका अंजाम बुरा होना पहले से ही तय था।

पुलिसकर्मी के सामने पिस्टल ताने हुए शाहरुख:

शैतान तो हम सब में है।

केवल उम्मीद और दुआ की जरूरत है :

ऐसा नहीं की हम सबके अंदर इंसानियत का कीड़ा मर चुका है, गाहे बगाहे इन बड़ी घटनाओं के बीच कुछ ऐसा हो जाता है जिसकी उम्मीद भी नहीं होती, लेकिन एक भरोसा होता है ये सिर्फ भारत मे ही संभव है।

बच्चों को दंगे से बचाने की कोशिश में जुटे हुए कुछ लोग।

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उदय बुलेटिन
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