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नजरिया

अलगाववादी नेता या लोकतांत्रिक देश.. आखिर  गृहमंत्री के फैसले से नाखुश क्यों है कांग्रेस ? 

अमित शाह के इस फैसले को इतिहास याद रखेंगा ! 

Ankit Srivastava

Ankit Srivastava

आज हम बात कर रहे हैं, भारत सरकार के एक ऐतिहासिक फैसले कि जिसकी वजह से एक तरफ देश में ख़ुशी की लहर है तो कहीं मातम पसरा है। देश की राजधानी दिल्ली में जब रातों-रात कैबनेट की मीटिंग हुई तो, ये कहना गलत नहीं था की सोमवार की सुबह एक नया इतिहास लिखा जाएगा और भारतीय राजनीति में एक ज्वालामुखी की तपन ला देगी। खेर जो होता है अच्छे के लिए ही होता है, देर से ही सही।

क्यों होगी 5 अगस्त 2019 की तारीख भारतीय इतिहास में खास ?

वैसे भी भारतीय इतिहास के छात्रों के लिए एक नया तगड़ा चैप्टर तैयार हो चुका है और जिसका सार कुछ इस तरह से बयां है -

बड़ी सिदत थी उन्हें बेआबरू हो के देखने की आज मौका भी मिला दस्तूर भी है।

अब बात करते हैं वर्तमान गृहमंत्री श्री अमित शाह की। वैसे अमित शाह भारतीय जनता पार्टी के कद्द्वार नेता तो हैं ही, अब देश में उनका नाम एक ऐसे गृहमंत्री के रूप में होगा, जो अपने ऐतिहासिक निर्णय लेने की वजह से हमेशा याद किये जाएंगे। उनके निर्णय भले ही वर्तमान रूप से बड़े कठोर और तीक्ष्ण हो, लेकिन कड़वी दवा के माफिक हिंदुस्तान को उनका यह निर्णय सदियों तक फायदा पहुंचाने का माद्दा रहता है।

धारा 35A एवं धारा 370 हटने के बाद अब ना सिर्फ कोई भी भारतीय जम्मू-कश्मीर में किसी भी तरह की जमीन या रोजगार संबंधी कार्य कर सकेगा, अपितु जम्मू-कश्मीर में रहने वाले लोगों को भी इसका फायदा पहुंचेगा।

इनसब बातों में एक बात कांग्रेस और भाजपा के कुछ सहयोगी दल सरकार के इस निर्णय से नाखुश नज़र आये। वहीं कुछ टीवी चैनलों पर टॉप रैंकिंग का युद्ध छिड़ा है।

क्या देश हित से भी बड़ा कोई धर्म-कर्म है ? क्या ये राजनैतिक दल एवं न्यूज़ चैनल 14 फ़रवरी 2019 का वो काला दिन भूल गए जब देश के सपूतों को ऐसे शहादत देने पड़ी। वीर सिपाहियों की लाशें किसी कूड़ेदान में पड़े रद्दी कागज की तरह समेटी गयी यहाँ तक कि लाशों को पानी भरने वाली बाल्टियों में सहेजकर रखा गया ,ऐसी घटना जिसने पूरे देश को रुला दिया।

मेरा तर्क सिर्फ इतना है कि देश हित में लिया गया हर एक फैसला सही है जिसमें देश की जनता का हित हो। एक राजनेता होने का ये मतलब नहीं होना चाहिए की सिर्फ विरोध प्रगट करना ही सही मार्ग है।

न्यूज चैनलों की तो बल्ले-बल्ले हो गयी, मामले को चटकारे लेकर पढ़ा जा रहा है

न्यूज़ चैनलों पर चल रही बहस ये बता रही है देश हित से बड़ा TRP है । चैनलों में पक्ष और विपक्ष का होना कश्मीर मुद्दे पर कितना सही है, ये वक़्त ही बातयेगा। अलगाववादीयों का कश्मीर के लोगों के प्रति कितना स्नेह है ये तो खुदा ही जनता है, अन्यथा अलगाववादीयों के बच्चे स्कूल में पढ़े और कश्मीर के बच्चे सेना पर पत्थर फेंके।

70 सालों में किसी सरकार द्वारा,या लोकल पार्टियों द्वारा कुछ भी कार्य किया गया होता तो आज कश्मीर की ये हालत ना होती कब तक आखिर ये नेता अपने निजी स्वार्थ के लिए कश्मीरी बच्चों का उपयोग करेंगे।

कब कश्मीरियों को समझ आएगा की अब तक उनके साथ अन्याय ही हुआ है। जिन खानदानों की रोजी रोटी कश्मीर के मुद्दे को हवा देकर चल रही थी उन्हें मिर्चे लगना लाजिमी है, उन्हें एक ही सलाह और मशविरा है।

ये वक़्त है साहब , तसल्ली भी देगा और तजुर्बा भी।