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नजरिया

जाति देखकर लगाई जाती है इज्जत और जान की कीमत 

सरकारी तंत्र  के दोहरे मापदंड, असल सामाजिक विषमता इसी में छुपी है !

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

कैसा लगेगा जब चार लोगों का समूह एक ही दुर्घटना में शिकार होने के बावजूद अलग-अलग प्रकार का ट्रीटमेंट पाए, या दर्द के लिए अलग अलग सस्ती महंगी दवाएं मिले।

या फिर आप इस मुद्दे को इस प्रकार से समझ सकते है कि मरीज की जाति ,धर्म, समुदाय देखकर इलाज, दवाएं ,और सुविधाएं दी जाए।

बुरा तो लगेगा ही, लगना भी चाहिए, क्योंकि दर्द में कराहते मरीज की कोई जाति, धर्म ,या समुदाय नही होता।

लेकिन असल मे ऐसा होता है, हमारे समाज में ही नहीं बल्कि सरकारी बॉडी में तमाम ऐसे उदाहरण छुपे है जिनको देखकर आपको घिन आ सकती है ।

हालांकि मेरा विश्वास इस बात पर कभी नही है कि जो लाभ किसी रोगी को दिया गया वह उसे नही मिलना चाहिए, जरूर मिलना चाहिए, बल्कि उस तरह के सभी रोगियों, भुक्तभोगियों को मिले तो ज्यादा बेहतर है।

अभी हाल का ही मामला ले लीजिए हमीरपुर के कुरारा थाना क्षेत्र के शिवनी गांव में एक  अनुसूचित जाति की बालिका को घर से उठाकर सामूहिक दुराचार किया गया था, साथ ही उसकी गला दबाकर हत्या कब्रिस्तान में कई गयी थी, लगभग सारे बलात्कारी और हत्यारोपी पकड़ लिए गए है!

और अभी हाल में ही अनुसूचित जाति कल्याण बोर्ड के अधिकारियों ने इस गांव का दौरा किया है, दौरे के दौरान पीड़ित पिता की स्थितियों का जायजा लेकर यह भी सुनिश्चित किया गया है कि कानून उसके साथ न्याय भी कर रहा है या नही, और उसे मिलने वाली सरकारी मदद का भी ब्यौरा अनुसूचित जाति एवम अनसूचित जनजाति कल्याण बोर्ड ने अपनी प्रेस रिलीज में बताया है।

जाति देखकर लगाई जाती है इज्जत और जान की कीमत 

जिसमे पीड़ित को अनुसूचित जाति में होने के कारण कितनी रकम दी जा रही है और भूमिहीन होने के कारण जमीन का पट्टा भी उल्लेखित है ।

यह जायज है और जरूरी भी समाज के हर अंग, वर्ग को अपना सर उठाकर जीने की आजादी मिलनी चाहिए , लेकिन हाल में ही अन्य सामान घटनाएं हुई है , जिनमे इस सहयोग से कोई समानता नही पायी गयी है

अब असल प्रश्न यही खड़ा होता है,

क्या इज्जत और जान की कीमत जाति को देखकर निर्धारित की जाती है, अथवा संविधान में समाज की समरूपता , समानता को ताक पर रखकर कम या ज्यादा लगाई जाती है, या फिर यह माना जा सकता है कि अन्य वर्ग की बालिकाओं ( जिनके साथ दुर्व्यवहार/हत्या ) की घटना हुई है उन्हें इस कृत्य से कम तकलीफ हुई होगी, या उन्हें आहिस्ते से मारा गया होगा, या फिर उनकी चीखे ज्यादा मजबूत नही रही होंगी,

या कातिल और बलात्कारी ने जाति और धर्म देखकर नन्ही और मासूम बच्चियों के साथ बर्ताव किया होगा ,

नही ना............

हमे जितनी पीड़ा और तकलीफ कठुआ गैंगरेप की घटना से हुई थी, उतनी ही अलीगढ़, बाराबंकी, हमीरपुर, और कन्नौज, उन्नाव ,भोपाल और रोज की असंख्य बच्चीयों और महिलाओं के साथ होते बुरे व्यवहार जिसमे यौनशोषण, हत्या, बालात्कार, छेड़छाड़ शामिल है।

Summary

हमने पहले भी इस प्रकार के दुर्व्यवहार पर प्रकाश डालने की कोशिश की, क्योकि जब कठुआ में बच्ची पर जालिमो के द्वारा कहर ढाया गया, तब समूचा देश उस बच्ची और उनके परिजनों के साथ खड़ा था लेकिन हाल में हुए अलीगढ़ कांड के बाद तख्तियां रखने वालों को नींद से जगाना पड़ा, अवॉर्ड वापसी गैंग शीत निद्रा में कायम रही, किसी को फर्क नही पड़ा यहां तक कि कुछ हाइ प्रोफ़ाइल लोगो ने सोशल मीडिया पर उपयोगकर्ताओं को ज्ञान भी बाटना शुरू कर दिया था।

हालांकि किसी के जीवन जाने और इस तरह के दुर्व्यवहार का मोल नही लगाया जा सकता , क्योकि जीवन अमूल्य है, और ख़ासकर बच्चियां जिन के साथ वो व्यवहार हुए जिनके बारे में उन्हें भान या ज्ञान तक नही है, फिर भी पीड़ित पक्ष की भावनाएं एक समान होती है ,चाहे वह किसी ,जाति ,धर्म, समुदाय से भले ही हो,

अगर सरकारे, बोर्ड, कानून ,और संविधान समाज मे एकरूपता की भावना रखते है तो उन्हें अपने रूढ़िवादी चोले को उतारना होगा, उन्हें अगर किसी के दर्द, तकलीफ की कीमत देनी ही पड़ती है तो इसमे विभेद ना हो, क्योकि सबका दर्द लगभग एक समान ही होता है, दर्द तकलीफ, सामाजिक तिरिस्कार कभी जाति धर्म देखकर नही आते।

  • अस्वीकरण:ये लेखक के निजी विचार है!