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नजरिया

आखिर मोदी नाम की सुनामी में विपक्ष क्यों तिनके सा उखड गया?

आखिर मोदी के सामने विपक्षी पस्त क्यों हुए

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

देश मे कई राज्यो में हुए विधान सभा चुनावों के बाद महागठबंधन नामक जैसे एलाइंस जन्मे ओर जिन्होंने मिलकर मोदी की विजय यात्रा को रोकने का एक माध्यम समझा , जिसमे खुद कांग्रेस, सपा बसपा,टीएमसी, ओर दक्षिणभारत की पार्टियां इसमे एक धारा होकर बहने लगी थी,

उत्तर प्रदेश में यह स्थिति भाजपा के लिए ओर कांटो भरी थी क्योकि उत्तर प्रदेश हमेशा से जातिवादी मतदान ओर जीत के लिए जाना जाता रहा है ,वही बंगाल में समुदाय विशेष तुष्टिकरण भाजपा के लिए अभेद्य किला बन चुका था, लेकिन आखिर ये किले टूटे कैसे...

दिल्ली:

जनता अपने लिए नेता चुनना चाहती है किसी प्राथमिक विद्यालय का विद्यार्थी नही जो हर किसी उपलब्ध अथवा अदृश्य समस्या के लिए मोदी को जिम्मेदार माने, ओर हर किसी चाही-अनचाही बातो को मोदी पर थोप दी जाए, जनता खासकर पढ़ा लिखा युवा इससे आजिज हो चुका था।

बिहार:

बिहार कभी तक जातिवाद का गढ़ माना जाता था, यहां गुंडागर्दी अपने चरम पर थी, वहां की जनता ऐसा नेता चाहती थी जो जिम्मेदारी के साथ देश हित मे ऐसे फैसले ले वो भले ही कष्टदायी हो लेकिन देश के लिए हितकर हो।

बंगाल:

बंगाल का किला बीजेपी के लिए असंभव था लेकिन ममता बनर्जी जैसी प्रशासक ने भी वो गलतियां की जिसे मतदाता कभी भूल नही सकता, समुदाय विशेष का तुष्टिकरण ,बहुसंख्यक समुदाय का उत्पीड़न हुआ, धार्मिक आधार पर बचाव या सजा दी गयी, जनता इसके लिए ममता बनर्जी को इंगित करना चाहती थी,सो अब परिणाम सामने है।

उत्तर प्रदेश:

भयानक जातिवादी समीकरण वाला देश की सबसे ज्यादा लोक सभा सीटो वाला राज्य ,जहां यादव, दलित और मुस्लिमो की एक बड़ी आबादी रहती है ,इसने राजनीति को सबसे विषम तब और बना दिया गया जब सपा-बसपा ओर आर एल डी जैसे विषम विचार धारा वाली पार्टियां भाजपा के विजय रथ को रोकने के लिए एक मंच पर आ गयीं, बीच मे अपने आपको इस महागठबंधन से अलग करने वाली पार्टी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी अपनी पारंपरिक सीट से हाँथ धो बैठे, सपा-बसपा-आप बिलकुल आधारहीन से हो गए।

मुख्यतः अब लोगों से यह सुना जा रहा है कि मोदी को जातीय समीकरण, धार्मिक समीकरण के द्वारा नही हराया जा सकता क्योंकि भाजपा की जो भी नीतियां है वह किसी धर्म जाति या समुदायों विशेष के लिए नही है,मोदी का बेदाग नेता, पार्टी का कोई बड़ा या प्रचलित घोटाला ना होना भी जीत के लिए गलूकोज का काम करता रहा ,इस जीत में जितना हाँथ मोदी सरकार की नीतियों का रहा उस से कहीं ज्यादा विपक्ष की असभ्य भाषा और झूठे आरोपों का रहा ,"चौकीदार चोर है " जैसे नारो ने खुद विपक्ष की कब्र खोद कर यज्ञाहुति में घी का काम किया है,कुल मिलाकर मोदी को जातिगत, धर्मगत ,ओर भाषागत विभेद से हराना मुश्किल है मोदी को हराने के लिए नीतियां, जनप्रिय योजनाएं (भले ही वह कड़ी क्यों ना हो) होनी चाहिये अब राजनीतिक बयार बदल रही है ,विपक्ष को अब मुद्दे तलाशने होंगे ,उन्हें पैतरे बदलने होंगे , सिर्फ आरोप प्रत्यारोप की राजनीति छोड़कर जमीनी मेहनत करनी होगी।