उदय बुलेटिन
www.udaybulletin.com
Indian Army
Indian Army|Social Media
नजरिया

कुरीतियां जोंक की तरह समाज के जिस्म पर सदियों से चिपकी हैं ,इनको थोड़ा नमक डालकर निकालना होगा !

भारतीय सैनिक ओर नियम !

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

Summary

आप जैसे ही किसी सेना की वर्दी वाले व्यक्ति या महिला को देखते है आपका ह्रदय उनके सत्कार से उमड़ पड़ता है, आपका मन करता है कि किस प्रकार से इनका सम्मान कर बैठूं, हालांकि मुझे यह अधिकार नही कि मैं सेना के नियमो, मैनुअल ,इत्यादि पर सवाल उठाऊ, लेकिन जब कभी भी इस तरह की तश्वीर सामने आ जाती है तो मस्तिष्क दो हिस्सों में बटने लगता है आखिर मैं जिस सैनिक की तश्वीर अपने ह्रदय में संभाले बैठा हूँ वो क्यो तार-तार होने लगती है, आखिर सैनिक सैनिक है वेटर या बैरा नही, हालांकि यहाँ मैं स्पष्ट कर देना चाहूंगा कि वेटर या बैरा किसी स्थिति में निम्नतर नही है ना ही उनका पेशा , लेकिन क्या यह देखना उचित होगा कि एक डॉ. जो चिकित्सा के लिए जाना जाता है वह अपनी वेशभूषा में कंडेक्टर का काम करे?

सेना रक्षा करती है, सेना बचाती है, सेना बनाती है, लेकिन इंग्लिश नियमो में बंधी सेना (जबकि आजादी के 70 साल हो चुके है) उन नियमों से मोह नही त्याग पा रही है, जो किसी भी नजर से ठीक नही है।

ऊपर दिए गए चित्र में गौर कीजियेगा अधिकारी गणों की पत्नियां डायनिंग टेबल (या फिर नाश्ता या कुछ और) कि टेबल पर बैठी है, ओर वर्दी धारी सैनिक उनके सामने भोज्यपदार्थों की विशेषता बतलाकर देने में मशगूल है, अगर खाने वाले भी वर्दी में होते तब भी यह ठीक ठाक ही रहता, लेकिन जैसे ही यह निजी और पारिवारिक हो गया आपत्तियां वहाँ से शुरू हो गयी, यह चित्र सोशल मीडिया में काफी दिनों से घूम रहा है, लोग तरह-तरह की आपत्तियां जाहिर कर रहे है, लोगो की भावनाओं की कद्र करनी चाहिए क्योंकि हो सकता है ये चित्र उस युवा के मन मे घर कर जाए जो अभी-अभी सेना में जाने का सपना पाल बैठा है,चित्र देखकर कहीं न कहीं वह इस बात को जरूर सोचेगा की आखिर उसे भी साहबों की पत्नियों को खाना खिलाना पड़ेगा,या साहब का कुत्ता बगीचे में टहलाने जाना पड़ेगा,

और हो सकता है इसी क्षण वह अपने अंदर के सैनिक को गला घोंट कर मार दे,

हमे सैनिक चाहिए , गर्व से सीना उठाये, ना कि तश्तरी उठाये , अगर तश्तरी भी उठाए तो पीड़ितों, ओर जरूरतमंद लोगों के लिए, ताकि वह सदा गर्वित रहे , उसे लज्जा,शर्म और संकोच को आवेशित ह्रदय में न पालना पड़े,

सैनिक तब तक ही सैनिक है जब तक उसमे ओज है , जैसे ही ओज दमन से खत्म हुआ ,एक सैनिक उसी पल बोझ से दब जाता है।

हमारी सेना, उच्चाधिकारियों को अपने नियमो की समीक्षा करनी होगी, नियमो को बदलना पड़ेगा, अगर यही सब सेना में भी होगा तो कोतवाल ओर एसपी साहब के दफ्तर के सामने सैल्यूट ना मारकर हाँथ जोड़े पुलिसकर्मियों में कोई अंतर नही रहेगा !!!