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संसार, आत्मा और परमात्मा
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नजरिया

अपनी संतान को योग्य नागरिक बनाना हर माता-पिता का दायित्व है

जिस प्रकार कोई व्यक्ति एक रंग के कपड़ों को पहचान लेता है, उसी प्रकार आध्यात्मिक व्यक्ति अपने अंश या अंशी को पहचान लेता है।

प्रो. ज्ञानप्रकाश शास्त्री

प्रो. ज्ञानप्रकाश शास्त्री

Summary

संसार का एक नाम माँग है, जहाँ बिना सोचे समझे माँग होती रहती है, वह संसार है। माँग शब्द का अर्थ है-कामनाएँ। माँग दो प्रकार की हो सकती है, प्रथम- जो आत्मा या शरीर की आवश्यकता हो और दूसरी जो मन के द्वारा कल्पित की गई हो। यहाँ दूसरी प्रकार की माँग को लिया जा रहा है।प्रथम प्रकार की माँग आत्मा और शरीर की आवश्यकता है, इसलिए उसे पूर्ण किया ही जाना चाहिए, परन्तु बिना आवश्यकता के मन के तल पर बुद्धि के सहयोग या बिना उसके परामर्श के जो माँगें उठती रहती हैं, वे कामनाएँ हैं।

माँग की एक विशेषता बिना परिश्रम के पाने की चाह है, कामना वह कर रहा है, लेकिन पूरा उसे कोई अन्य कर दे। बिना परिश्रम के मनुष्य जो-जो पाने की कामना करता है, वह माँग है। आध्यात्मिक कहे जाने वाले शास्त्र इस प्रकार की माँगों से भरे हुए हैं, चाहे किसी धर्म से सम्बन्धित शास्त्र हों, उनमें इस प्रकार का विलाप देखा जा सकता है। जो शास्त्र मनुष्य को माँगना सिखाता है, वह कभी भी आध्यात्मिक नहीं हो सकता, वह पूरी तरह से सांसारिक है, उसे संसार का विज्ञापन कह सकते हैं। जो व्यक्ति संसार में फँसना चाहता है, उसे उन शास्त्रों के आधार पर निरन्तर माँग करते चला जाना चाहिए।

अब यह प्रश्न उपस्थित होता है कि क्या मनुष्य को किसी से माँग करनी चाहिए अथवा बिल्कुल नहीं करनी चाहिए, परमात्मा ने यह संसार आधार और आधेय या आश्रय और आश्रित आधार पर निर्मित किया है। संसार में जन्म लेने वाली आत्मा अपने प्रारम्भिक चरण में किसी न किसी पर आश्रित अवश्य होती है। जहाँ तक भोजन का सम्बन्ध है, सभी प्राणी प्रकृति पर आश्रित हैं। इसलिए माँग को पूरी तरह से अस्वीकार नहीं किया जा सकता।मनुष्य के रूप में जन्म लेने वाली आत्मा को निम्न लोगों से माँग करने का अधिकार है- प्रथम- माता-पिता, द्वितीय- अंश-अंशी, तृतीय- पति-पत्नी, चतुर्थ- परमात्मा। जब तक व्यक्ति अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सकता, तब तक वह माता-पिता पर निर्भर है और माता-पिता का दायित्व है कि उसकी सभी उचित माँगों को पूरा करें अर्थात् आवश्यकता की पूर्ति करना माता-पिता का दायित्व है।

इस पृथ्वी पर 14 वर्ष तक बालक माता-पिता से अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कराता रह सकता है, उसके उपरान्त उसे धीरे-धीरे अपने पैरों पर खड़े होने का प्रयास करना चाहिए। हम यह भी कह सकते हैं कि योग्य नागरिक बनाना माता-पिता का दायित्व है और इस उद्देश्य की पूर्ति जिस किसी प्रकार से भी होती है, वह माता-पिता को अवश्य करनी चाहिए। माता-पिता के अनन्तर मनुष्य को अपने अंश या अंशी से सभी प्रकार की सहायता लेने का अधिकार है। संसार में विचरण करने वाली आत्माओं में से कोई भी पूर्ण नहीं है, वे या तो किसी का अंश हैं या किसी का अंशी। इन से सभी प्रकार की सहायता ली जा सकती है, परन्तु प्रश्न यह उपस्थित होता है कि किस प्रकार यह जाना जाए कि यह मेरा अंश या अंशी है? आध्यात्मिक व्यक्ति ही यह पहचान कर सकता है कि कौन उसका अंश या अंशी है। जिस प्रकार कोई व्यक्ति एक रंग के कपड़ों को पहचान लेता है, उसी प्रकार आध्यात्मिक व्यक्ति अपने अंश या अंशी को पहचान लेता है।

विवाह सम्बन्ध अंश या अंशी के मध्य ही होना चाहिए, प्रारम्भ में ऐसा ही होता रहा, लेकिन कालान्तर में मनोविकारों के कारण अंश या अंशी की यात्रा अलग-अलग दिशा में हो गई। संसार की यात्रा तब तक निरन्तर चलती रहने वाली है, जब तक अंश या अंशी मिलकर एकत्व को उपलब्ध नहीं होते।अंश या अंशी का मिलन लगभग असंभव-सा हो गया है, उस स्थिति में विवाह के माध्यम से साथ साथ रहने वाले स्त्री और पुरुष को एक दूसरे से सभी प्रकार की सहायता लेना उचित है, उनके मध्य किसी भी प्रकार की माँग हो सकती है और एक को दूसरे की माँग को अवश्य पूर्ण करना चाहिए। यहाँ पर भी माँग का स्वरूप आवश्यकता पर आधारित होना चाहिए, आवश्यकता से भिन्न की गई कोई भी माँग जीवनसाथी को पूर्ण नहीं करनी चाहिए। माँग का चतुर्थ आधार परमात्मा है, मनुष्य माता-पिता तथा पति-पत्नी के अतिरिक्त परमात्मा से भी याचना कर सकता है। लेकिन परमात्मा से केवल एक याचना की जा सकती है और वह है कि उसे उसकी अविचल भक्ति प्राप्त हो।

परमात्मा ने मनुष्य को याचक के रूप में संसार में नहीं भेजा है, उसने वह सभी सामर्थ्य मनुष्य को प्रदान की है, जो स्वयं उसमें निहित है और मनुष्य को उसी सामर्थ्य के आधार पर कर्म करते हुए अपनी आवश्यकताओं को पूर्ण करना चाहिए। लेकिन तथाकथित धर्मशास्त्रों में परमात्मा को दाता और मनुष्य को भिखारी के रूप में प्रस्तुत किया है, इसको देख कर लगता है कि इन लोगों ने अपने शास्त्रों को याचक शास्त्र बना दिया है और मनुष्य के सामर्थ्य पर पर्दा डाल दिया है, एक प्रकार से इन्होंने अपनी ही सामर्थ्य को स्वयं अभिशप्त बना दिया है। जिस प्रकार कोई स्वामी को याचक के रुप में प्रस्तुत कर दे, इन शास्त्रों को देखकर ऐसा ही लगता है कि इन्होंने मालिक को भिखारी बना कर प्रस्तुत कर दिया है और यह मानवता के साथ घोर अपराध है। इसलिए जिन देशों में इस प्रकार के शास्त्रों का आश्रय लेकर जीवन जिया जा रहा है, वे न भौतिक रूप से समृद्ध हैं और न आध्यात्मिक रूप से ही।

भला कोई कैसे माँग-माँग कर संपन्न हो सकता है। भिखारी कितना भी संपन्न क्यों न हो जाए, उसके स्वभाव में दीनता और हीनता का भाव बना ही रहता है, वह हीनता के बोध से ऊपर नहीं उठ सकता। निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि सांसारिक व्यक्ति एक के बाद दूसरी, तीसरी माँग करता चला जाता है, कभी वह अपने निकट सम्बन्धियों से माँग करता है, कभी समाज से कभी देश से और कभी परमात्मा से करता चला जाता है और जिसकी माँग कभी पूर्ण नहीं होती, उसके लिए संसार घर के स्थान पर कारागार बन जाता है और वह जन्म-मरण के चक्र में चलते रहने के लिए विवश है।