उदय बुलेटिन
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Mob Lynching in India
Mob Lynching in India|souce-Internet
नजरिया

प्रजातंत्र या भीड़तंत्र

लगातार बढ़ती मोब लिंचिंग की घटनाएं

Vedant Patil

Vedant Patil

बिहार, कश्मीर, दिल्ली और भी कई नाम इस फेहरिस्त में जुड़ते जायेंगे अगर अब भी प्रजा भीड़ के ऊपर काबू ना पाए|

पिछले दिनों से ये बात फिर चर्चा में है की भीड़ का चेहरा कौन??

आइये हम जवाब तलाशने की एक कोशिश करते है

जब भी मोब लिंचिंग का जिक्र होता है मुझे हरियाणा के पंचकूला जिले की एक घटना याद आती है, जहाँ भक्तों की एक भीड़ ने बड़ा उत्पाद मचाया, वो भी कोर्ट की नज़रों में दोषी पाए गए बाबा राम रहीम के लिए| सिर्फ यही नहीं कुछ दिन पहले फिर अखबारों की सुर्ख़ियों में बिहार की एक घटना ने मेरा मन विचलित किया, जहां ३ नवयुवकों को एक हिंसक भीड़ ने मौत के घाट उतार दिया और एक बार फिर सवालों ने मुझे खेर लिया| अब इन सवालों के जवाब में मैंने पाया की हर भीड़ एक उद्देश्य के लिए इकठ्ठा नहीं होती है, जिसके चलते कई बार नेतृत्व का अभाव इसे हिसंक बनने से रोक नहीं पाता|

अब ऐसी भीड़ का किया क्या जाये ?

वैसे तो कानून की किताबें अभी इसका उपाय सोचने में लगी है, लेकिन बात साफ़ है जहा डर कम होता है वहां अपराथ ज्यादा| अब भीड़ के मसलों में दोषी कोई एक नहीं होता है तो वहां सज़ा मिल पाना सामान्य से मुश्किल हो जाता है और कई बार अपराधी अपराथ कर निर्दोष साबित हो जाते है| ये बिना चेहरों की भीड़ ने लोकतंत्र की व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगा रखे है| इस सवाल जवाब के फेर में कई सारी बाते सामने आई है, हर बार जनता का फैसला सही होगा और जहाँ भारतीय कानून अपराथ रोकने में सक्षम है, तो लोकतंत्र को भीड़तंत्र की आवश्यकता क्यों??