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यस बैंक का नो हो जाना खतरे की घण्टी है ! 

रिश्वतखोरी ने यस बैंक को डुबा दिया, राणा कपूर ने रिश्वत लेने के लिए 20 से अधिक फर्जी कंपनियां बनाई थीं। फर्जी कंपनियों के जरिए उन कॉरपोरेट कंपनियों से रिश्वत ली गयी जिनको यस बैंक से कर्ज दिया गया था।

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

Summary

एक के बाद एक दूसरे बैंक पर ताला लगने की नौबत आजाना तमाम सवाल खड़ा करता है, अबकी बार इसका शिकार यस बैंक हुई है जिसके तहत लाखों ग्राहकों की खुद की जमा पूंजी पर रिजर्व बैंक ने रोक लगाई है, इसके परिणाम घातक हो सकते है।

मानो या न मानो भारतीय बैंकिंग सिस्टम में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा, एक के बाद एक बैंक अपनी कार्यक्षमता खोते चले जा रहे हैं जिसकी वजह से आम शहरी बैंकिंग प्रणाली पर भरोसा खोता चला जा रहा है।

सन 2004 का साल राणा कपूर और अन्य पार्टनर की सहायता से कानपुर में एक कारपोरेट बैंक की स्थापना की। शुरुआत में यह बैंक केवल व्यवसायियों और बड़े खाता धारकों के लिए शुरू किया गया लेकिन पैसे की आवक और सरल और अच्छी ब्याज नीतियों के चलते यह लोगों की पसंद बनता रहा और लोकप्रियता के कारण यह लोगों के दिल में जगह बनाता चला गया। आखिर एक वक्त यह भी आया जब यस के बोर्ड को आरबीआई ने भंग करके खाताधारकों के खुद के धन निकासी की सीमा घटाकर 50 हजार मासिक कर दी अब यह बैंक भयानक खतरे में है। लोगों का बैंक के दरवाजे पर रोना-धोना शुरू है।

आखिर हुआ क्या है :

बैंक पहले से ही बड़े उद्योगपतियों के लिए भारी लोन बांटने के लिए जाना जाता है इस लिए बाजार में 2004 के बाद से ही धाक बननी शुरू हो गयी थी। बैंक में तब तक सबकुछ सही चल रहा था जब तक बैंक के दो पार्टनर ईमानदारी के साथ बैंक को चला रहे थे। लेकिन मुम्बई हमले के वक्त अशोक कपूर जो कि यस बैंक में महत्वपूर्ण पद पर तैनात थे उनकी मृत्यु हो जाने के बाद राणा कपूर और अशोक कपूर की पत्नी के बीच हिस्सेदारी को लेकर मामला उलझता चला गया। जानकारों की माने तो राणा कपूर किसी भी तरह से अशोक कपूर के परिवार को बैंक में न तो हिस्सेदारी देना चाहते थे और न ही परिवार के किसी व्यक्ति को बैंक के बोर्ड इत्यादि में जगह। हालांकि मामला जब कोर्ट में पहुंचा तो राणा कपूर को मुँह की खानी पड़ी। लेकिन वहीँ से ही गोरखधंधे की शुरुआत हो गयी और राणा कपूर ने बैंक में अपने रसूख के दम पर हर उस उद्योगपति और बिजनेस मैन को लोन देना शुरू किया जिसका इतिहास बैंकिंग के लिए कतई सही नहीं था कहने का मतलब क्रेडिट खराब था। अन्य बैंकों से डिफाल्टर घोषित किये जा चुके थे, बैंक द्वारा बैलेंस शीट को जानबूझकर छिपाया गया और आरबीआई इस मामले पर अनजान बनी रही।

सन 2018 का साल जब से यस बैंक के ऊपर ग्रहण लगना शुरू हुआ जैसे-तैसे आरबीआई ने यस बैंक की गलतियों को पकड़ना शुरू किया। अनियमितता पाए जाने पर जुर्माने की झड़ी लगाई गई और सेबी ने भी यस बैंक पर अपना डंडा चलाया। अन्य रेटिंग एजेंसियों ने बैंक को नीचे का स्वाद चखाया और आरबीआई ने राणा को प्रबंधन से हटने पर मजबूर कर दिया और बैंक में नया प्रबंधन बनाने की कवायद हुई।

नया प्रबंधन भी नाकाफी रहा :

नए प्रबंधन के आने के बाद भी बातों के बताशे खिलाये गए। प्रबंधन बाहर के निवेशकों से पैसे आने की बात तो कहता रहा, लेकिन समय बीतते रहने के बाद भी एक ढेला की आवक नहीं हुई। अंत मे थक हार कर आरबीआई और केंद्र सरकार ने बोर्ड को भंग करके इसे एसबीआई और एलआईसी के हांथो में सौप दिया और धन निकासी जैसे मामलो में एक बंदिश सी लगा दी। और भारत मे हाल फिलहाल दिवालिया हुए बैंक की तरह ग्राहक अपने पैसे निकालने के लिये बैंक के दरवाजे पर रोता हुआ नजर आने लगा।

आखिर क्या परिणाम होंगे:

इस मामले का सीधा असर लोगों की बैंकों के प्रति मानसिकता और विश्वास को लेकर पड़ेगा। यहाँ आपको बताते चले कि इसका असर सिर्फ यस बैंक तक सीमित नहीं होगा हर बैंक अविश्वास के दायरे में आकर लोगों के बीच भरोसा खो देगा। सरकारों को अगर बैंकिंग सिस्टम को बचाना है तो अपने नियमों को कड़ा करके निगरानी को तेज करना होगा ताकि कानूनों और लूप होल्स की आड़ लेकर कोई भी लोगों के भरोसे को न तोड़ सके।

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उदय बुलेटिन
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