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Vivek tiwari
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जब रक्षक ही भक्षक बन जाए तब स्थिति बदतर हो जाती है

अगर पुलिस शक के आधार पर गोली मार दे तो फिर अपराधी और पुलिस के क्या अंतर रहा

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

वैसे तो दागो और दामनो का रिश्ता पुराना है लेकिन जैसे ही उत्तर प्रदेश पुलिस का नाम जुबान पर आता है जेहन में अचानक मिली जुली सूरत दिमाग में उभरती है जो आपकी हिफाजत कम आपकी जेब खाली करने में माहिर  है ,कारनामे ऐसे ऐसे की आपके कदमो के नीचे से जमीं सरक जाए
और उत्तर प्रदेश की पुलिस मजाक का पात्र तब बनती है जब इस तरह के आरोप लगाये जाते है की दोनों आपत्तिजनक स्थिति में थे

लखनऊ में रात के सन्नाटे में एक नामी गिरामी कम्पनी का एरिया सेल्स मैनेजर अपनी सहकर्मी सना खान के साथ लौट रहे थे , उन्हें अपने प्रोडक्ट लांचिंग के बाद अपनी सहकर्मी को उसके घर के पास छोड़ना था ,गाडी महिंद्रा की एक्स यू वी 5OO थी अचानक कुछ पुलिस कर्मी सामने से गाडी रोकने का प्रयास करते है और असहज चालक अचानक इस स्थिति को देखकर कुछ समझता है इस से पहले पुलिसकर्मी की पिस्टल अपनी जगह से निकल कर हरकत करके गाडी चला रहे चालक के चेहरे गोली झोककर चालक को शांत कर देती है .

यह पहला वाकया नहीं है जब पुलिस वालो पर इस तरह के प्रमाणिक आरोप लगते रहे है ,आप अगर हेलमेट नहीं लिए है तो आपको माँ बहन के  सम्मानजनक शब्द अनायास ही सुनने को मिल जाते है ,लेकिन अगर आप उत्तर प्रदेश के बाइक सवार पुलिस कर्मियों को देखे तो लगभग 90% बिना हेलमेट मिल जायेगे ,

सही मायनों में जिस तरह पुलिस एनकाउंटर करके अपनी पीठ खुद बखुद थपथपाते रहती है उन पर हमेशा उंगलिया उठती रहती है

उदहारण के तौर पर बुंदेलखंड में हुए नामी गिरामी दस्यु सरगना ददुआ ,ठोकिया, घनश्याम केवट इत्यादि के एनकाउंटर सवालों के घेरे में रहे है ,लेकिन सरकारे बदली पुलिस के मुखिया बदले लेकिन पुलिस वाही पुलिस ही रही चाहे वो लखनऊ के हजरत गंज पर बुजुर्ग टाइपिस्ट को लाल बूटो से पीटता हुआ वर्दी वाला या फिर विवेक जैसा बहुराष्ट्रीय कम्पनी का कर्मचारी ,

सरकारी तंत्र में हलचल है ,सी बी आई जांच की बात हो रही है ,लेकिन सवाल इस बात का है की विवेक कैसे लौटेगा ?