Coronavirus Vaccine Update
Coronavirus Vaccine Update|Google Image (प्रतीकात्मक चित्र)
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कोरोना वैक्सीन: कितने दूर कितने पास, इलाज मिलेगा भी या नहीं?

कोरोना वैक्सीन के विकास पर शिवजीत तिवारी द्वारा किया गया विश्लेषण।

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

आज जब दुनिया कोरोना वायरस से लड़ रही है उस वक्त केवल एक ही उम्मीद है कि आने वाले वक्त में दुनिया के किसी कोने में लगे हुए वैज्ञानिको की टीम यह पुष्ट सूचना देगी कि उन्होंने कोरोना की वैक्सीन का इंसानो पर सफल परीक्षण किया है और इसके नतीजे पूरी तरह कारगर हैं। लेकिन असल पेंच इसी में फंसा हुआ है कि वैक्सीन तो दुनिया के सभी देश विकसित करने में लगे हुए हैं और वैक्सीन पर रिसर्च भी लगभग 100 की संख्या में चल रही है लेकिन अगर ये वैक्सीन नहीं मिली तो मानवता एक बार फिर संकट मे आ सकती है।

कौन कितने पास?

अगर दावों को देखे तो दुनिया मे सबसे पहले इजरायल और इटली के बड़े बयानों को ध्यान में रखा जा सकता है दोनों देशों के द्वारा यह दावा किया गया कि उन्होंने या तो टीके विकसित कर लिए है या फिर एंटीडोट। इसके साथ यूके के द्वारा भी भारत की एक प्रशिद्ध वैक्सीन निर्माता के साथ हुए करार के बाद यह दावा किया गया है वो वैक्सीन बनाने के बेहद आखिरी क्षणों में है। ऐसा नही कि इस रेस में सिर्फ दुनिया के कुछ देश ही है, इजरायल, इटली अमेरिका, ब्रिटेन, चीन, फ्रांस और भारत समेत दुनिया के बहुत सारे देश इस रेस में लगे हुए है। दुनिया को उम्मीद है कि गुजरते वक्त के साथ करीब 6 से 8 वैक्सीन कोरोना से लड़ने और हराने में सहायक हो सकती हैं।

सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया का ट्वीट:

भारत भी वैक्सीन निर्माण की ओर बेहद तेजी से अग्रसर हो रहा है। वैसे तो भारत मे करीब आधा दर्जन से ज्यादा वैक्सीन निर्माता फर्मों के द्वारा कोरोना की वैक्सीन खोजने का काम किया जा रहा है लेकिन असल में सबसे ज्यादा नजर इन कंपनियों पर है जिनमे से एक है सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, जो उत्पादन और बिक्री के हिसाब से दुनिया की सबसे वैक्सीन बड़ी सोर्स है। जिसने ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के साथ वैक्सीन उत्पादन का करार किया है ताकि नतीजे आने के बाद वैक्सीन के निर्माण में आवश्यक तेजी लाई जा सके। हाल में ही ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के द्वारा बंदरों पर वैक्सीन का टेस्ट किया गया है जिनमे अभूतपूर्व सफलता के चिन्ह देखे गए है।ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और इसके साथ काम करने वाली वाकई फर्म ने दावा किया है कि कोरोना की हैवी डोज से संक्रमित किये गए बंदरो पर जब यह प्रयोग किया गया तो यह दवा जल्द से जल्द शरीर मे एंटीबॉडी का निर्माण कर रही है जिससे बंदरो के शरीर के अंदर के अंगों को वायरस से बचाना संभव हुआ है।

खासकर जो कोरोना वायरस सबसे ज्यादा संक्रमण का असर फेफड़ों में दिखाता है वहाँ इस वैक्सीन ने चमत्कारिक ढंग से लाभ पहुचाया है। हालांकि शोध में यह बात सामने आई है कि इस वायरस को बंदरो के शरीर मे वैक्सीन के लगाने के बाद दिया गया है निष्कर्ष में यह पाया गया कि इस वैक्सीन के द्वारा अधिकतर बंदरो के शरीर मे 7 से 14 दिनों के अंदर ही एंटीबॉडी का निर्माण होना शुरू हो गया है। हालकि कुछ बंदरो में यह समय 28 दिन तक गया लेकिन परिणाम स्वरूप यह दवा बेहद कारगर रही है।

अब इसका अगला परीक्षण इंसानो पर होना शुरू हुआ है वहीँ भारत की दूसरी वैक्सीन निर्माता कंपनी भारत बायोटेक ने अमेरिकी फ्लूजेन और एक विश्वविद्यालय से करार किया है। सनद रहे ये दोनों कंपनियां विश्व मे उन्नत किस्म की वैक्सीन निर्मांण करने के लिए जानी जाती है और करीब 20 तरह की वैक्सीन दुनिया भर में उपलब्ध कराती है।

वहीँ अगर इजरायल की बात करें तो इजरायल ने कोरोना से लड़ने के लिए थोड़ा अलग रास्ता अख्तियार किया है दरअसल इसे वैक्सीन तो नहीं कहा जा सकता लेकिन अगर इजरायल किसी दवा के बारे में बयान देता है तो दुनिया का उसकी तरफ देखना लाजिमी हो जाता है। इजरायल के रक्षा विभाग के अधिकारी ने इजरायल इंस्टिट्यूट फ़ॉर बायोलॉजिकल रिसर्च के हवाले से दावा किया है कि वह कोरोना से लड़ने वाली दवा बना चुके हैं। इस दवा का सिर्फ इंसानो पर होने वाले दुष्प्रभाव और प्रभाव का परीक्षण करना बांकी है। चूंकि इजरायल ने वैक्सीन निर्माण का जो दावा ठोका है वह उसमे आगे भी चल रहा है। इजरायल ने अपने बयान में बताया है कि वो उसे पेटेंट कराने जा रहे है, इजरायल का दावा इसलिए भी ज्यादा ताकत वर लगता है क्योंकि ये दवा जिस संस्थान के द्वारा बनाई जा रही है वह कोई इंस्टिट्यूट नही बल्कि इजरायली सेना और मोसाद जैसी खुफिया एजेंसी के लिए काम करती है। जिसका मुख्य काम ऐसे वायरसों, केमिकलों पर नजर रखना है जिससे दुश्मन पर काबू पाया जा सके। वहीँ अगर इसे सौभाग्य कहे या कुछ और इजरायल के IIBR ने करीब 2015 से समूची कोरोना वायरस फैमली (कोविड परिवार ,जिसमे कोविड 19, मार्स, सार्स जैसे तमाम वायरस शामिल है) पर नजर रख रहा है और इजरायल के लिए यह रिसर्च रामबाण साबित हुई है।

WHO की आशंका :

WHO ने जो शंका जताई है वो बिना कारण की नहीं है आज भी दुनिया में छोटी बीमारी जुकाम से लेकर बड़ी और जानलेवा बीमारी एचआईवी का कोई टीका उपलब्ध नहीं हुआ है। शायद इसीलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने आशंका जताई है कि अगर ऐसा हुआ कि दुनिया इस बीमारी का तोड़ ही नहीं खोज पायी तो मुमकिन है कि हमें उम्र भर इसी बीमारी के साथ-साथ जीना पड़े। हालांकि इस तरह की संभावनाएं बेहद कम है क्योंकि इतिहास गवाह है कि किसी वायरस के बारे में इतने कम समय मे कभी इतनी ज्यादा जानकारी नहीं मिली। यह समस्या तब और ज्यादा सरल होती अगर चीन और विश्व स्वास्थ संगठन ने दुनिया से इस वायरस की बात नहीं छुपाई होती कि यह इंसानो से इंसानो के बीच फैल सकता है। हालांकि अब दुनिया की तमाम लैबों के पास COVID 19 का जीनोम है जिससे आरएनए की संरचना देखी जा रही है। और यह दुनिया का पहला वायरस होगा जिसके इलाज के लिए तमाम प्रकार इलाजों की खोज की जा रही है। इसके वैक्सीन निर्माण में भी गैर परंपरागत तरीकों का उपयोग किया जा रहा है।

लेकिन अगर यह बीमारी लाइलाज होती है तो यकीन मानिए एक वक्त आने पर प्रकृति इसके प्रभाव को स्वतः कम कर देती है जिसके तमाम उदाहरण मौजूद हैं।

वैक्सीन बन भी जाती है तो क्या?

देखिए अगर सकारात्मक होकर देखे तो उम्मीद यह है कि साल के आखिर तक वैज्ञानिकों और डॉक्टरों के हाँथ में या तो कोरोना की वैक्सीन होगी या फिर कोई एंटीडोट जैसा कि इजरायल दावा कर रहा है। दवा और वैक्सीन की खोज के बाद एक सबसे बड़ी समस्या होगी उत्पादन की वो भी बल्क में मतलब थोक के भाव पर उत्पादन। हालांकि यहाँ एक चीज गौर करने वाली है कि भारत इस मामले में काफी लकी है इस चीज को आप इस तरीके से समझिये कि भले ही दुनिया मे किसी देश और संस्थान के द्वारा दवा खोजी जाए लेकिन 98 प्रतिशत चांस यह है कि उस देश और संस्था को भारी मात्रा में उत्पादन के लिए भारत की तरफ देखने की जरूरत पड़ेगी और भारत मे निर्माण होने की वजह से भारत को इसका सीधा फायदा मिलेगा।

अब यह सवाल है कि दवा आने के बाद कब किसको मिलेगी? ये निर्भर करेगा जरूरत के आधार पर , अगर विशेषज्ञों की माने तो दवा का सबसे पहले उपयोग मरीजो के संपर्क में आने वाले डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ, अन्य स्वास्थ्यकर्मी, सफाई कर्मियों, कोरोना वारियर्स पर किया जाएगा उसके बाद जो ज्यादा बुजुर्ग और खराब स्थिति में हैं इस दवा का उपयोग उनपर होगा। बाद में जैसे ही दवा का उत्पादन ज्यादा मात्रा में होगा ये आम व्यक्तियों के लिए सुलभ हो जाएगी।

लेकिन क्या मौतें रुकेंगी?

अगर आप ये सोच बैठे है कि दवा आने के बाद कोरोना से लोगों की मौते कम हो जाएगी तो ये आपका वहम है। चिकन पॉक्स, रेबीज, टिटनेस, टीबी इत्यादि की दवा को खोजे हुए लंबा वक्त हो चुका है कुछ वैक्सीन तो लगभग एक सदी पहले खोजी जा चुकी हैं और कारगर भी है लेकिन क्या इन बीमारियों से मौते नहीं होती? होती हैं, अकेले भारत मे टीबी जैसी बीमारी से हर दिन1200 लोग बेमौत उस वक्त मर जाते है जब कि टीबी का इलाज भारत सरकार कराती है साथ ही इलाज के दौरान खान-पान का ध्यान रखने के लिए एकमुश्त रकम भी उपलब्ध कराती है। ऐसे वक्त में भी लोगों का इलाज के प्रति असंवेदनशील होना बहुत बड़ी चिंता का कारण है।

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उदय बुलेटिन
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