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Terrorist killed by Indian Army
Terrorist killed by Indian Army|Social Media
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जम्मू कश्मीर में आर्टिकल 370 उन्मूलन के बाद क्या बदला ? आतंकियों के जनाजों में भीड़ तो है लेकिन उन्माद नही। 

सेना एनकाउंटर से पहले स्थानीय आतंकियों से मुख्यधारा में बापस लौटने के लिए कहती है।

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

Summary

“अजय देवगन की एक फ़िल्म आयी थी “सिंघम “

कर्रा वाला पुलिस मैन था, उसका एक फेमस डायलॉग है

“अगर पुलिस अपने आप पर आ जाये तो मंदिर की सीढ़ियों के नीचे रखी हुई चप्पल भी चोरी नहीं हो सकती, हालांकि ये तो हुई फ़िल्म और पुलिस की बाते, जो फिल्मों में होता है जरूरी नही की असल जिंदगी में हो, और आजकल की पुलिसिंग को देखकर चप्पल वाली बात मजाक सी लगती है, आज बात सेना की, और राजनैतिक इच्छाशक्ति की”

एक वक्त हुआ करता था कि भारतीय सेना अपनी जान की कुर्बानी देकर देश के गद्दार और दुश्मनों को जन्नत का टिकट मुहैया कराती थी, और आतंकियों की मौत के बाद शुरू होता था सियासी कम धार्मिक ड्रामा।

वही आतंकी जो मारने के पहले तक किसी जाति समुदाय या देश का होने पर भी मौत के बाद उसका धर्म पहचान कर उसे मरने के बाद हीरो बनाया जाता था, धार्मिक नारों के बाद भारत तेरे टुकड़े होंगे की बुलंद आवाज के साथ एके 47 की शानदार फायरिंग करके सलामी दी जाती थी, एक आतंकी के जुलूस में इस कदर की भीड़ इकट्ठा होती कि आपको किसी मेले के लगे होने का भृम हो जाये, हालांकि सरकार ने मौका देखकर कानूनी लूपहोल्स खोजकर जैसे यह धारा कश्मीर में प्लांट की गई थी ठीक उसी प्रकार इसे एक झटके से उखाड़ फेंका।

इस आर्टिकल के हटने के बाद जैसी आशंका जताई जा रही थी ठीक वैसे ही हुआ, मुफ्त की रोटियां सेंकने वाले नेता और अलगाववादी नेताओं की दुकान बंद हो गयी और सेना पहले से ही एक्टिव और एलर्ट मोड़ पर थी, जो आतंकी जहां मिल रहा है उसे एक बार वार्निंग देकर मुख्य धारा में लाने की कोशिश की जाती है और अगर उसके ऊपर भारत की अखंडता को तोड़ने का भूत सवार है तो भारतीय सेना एक मंझे हुए ओझा का काम करके आतंकियों को जन्नत भेजने का काम करती जा रही है।

पिछले दिनों घाटी के अवंतीपुरा में पुलवामा के अंसार-ग़जवातुल-हिन्द के कमांडर इन चीफ और जाकिर मूसा का उत्तराधिकारी हामिद लेलहारी को सेना ने उसके अंजाम तक पहुँचाया, हालांकि जैसा पहले के एनकाउंटर में होता आया है स्थिति वैसी नही थी, फायरिंग के टाइम लोग तमाशबीन तो थे लेकिन उनके हलक से आतंकियों के समर्थन में कोई गंदे बोल नही निकल पा रहे थे और कमोबेश ऐसा ही हाल जनाजे के वक्त था, जनाजे में लोग तमाशबीन की तरह पहुँच तो गए लेकिन किसी तरह का कोई उन्माद नही फैलाया, न ही सेना और सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी की गई, वही पत्थरबाजी जो कुछ दिनों पहले तक एनकाउंटर के साथ और जनाजे में रस्म की तरह निभाई जाती थी।

बेहद सादगी पूर्वक जनाजे को सुपर्दे खाक किया गया और ऐसा इन वजहों से हो रहा है कि वहां की जनता अपने ऊपर थोपे गए फर्जी के जेहाद का मतलब समझने लगी है।

सेना बेहद कड़क और जनहितैषी साबित हुई :

सेना का मुख्य काम देश के दुश्मन तत्वों को ठिकाने लगाकर स्थानीय लोगों के बीच मे यह विश्वास बिठाना है कि सेना किसी और के लिए नही बल्कि आप की ही हिफाजत के लिए है, सेना घाटी में रक्षा के अलावा आम लोगों के मनोरंजन से लेकर शिक्षा और स्वास्थ्य तक का ख्याल रखती है, बाढ़, भूकंप जैसी आपदाओं में लोगों के लिए मसीहा बन कर प्रकट होती है, हर आर्मी छावनी के आसपास और बड़ी पोस्ट पर स्थानीय बच्चों के लिए पार्क बनाना, स्कूल चलाना भारतीय सेना को स्थानीय लोगों से जोड़ने की बड़ी कवायद मानी जाती है।

हालात कब सुधरेंगे :

हालांकि घाटी उतनी भी शांत और स्थिर नहीं है जितना लोग समझ रहे है या उम्मीद कर रहे थे, कश्मीर मसले को नजदीक से जानने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि कश्मीर अपने लोगों की हरकतों की वजह से हर घटना के बाद चार साल पीछे चला जाता है, इस समस्या को तभी टाला जा सकता है जब स्थानीय लोग आतंकी आकाओं की मंशा समझ सके , और उनकी मंशा छुपाने के लिए आतंकी धार्मिकता की आड़ लेकर आतंक के बीज बो रहे है।