Vedanta Hospital Covid 19 Positive Patient Bill
Vedanta Hospital Covid 19 Positive Patient Bill|Uday Bulletin
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कोरोना काल में महाराष्ट्र सरकार में मची लूट, निजी अस्पताल बिल में मचा रहे तवाही

ये बिल महाराष्ट्र ठाणे के एक निजी अस्पलात का है, इस अस्पताल ने प्रशासन के निर्देशों की धज्जियां उड़ाते हुए एक कोरोना मरीज को हॉस्पिटल बिल के नाम पर लूट लिया।

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

वैसे तो निजी अस्पताल पहले से ही अपनी कारगुजारियों से लिये जग जाहिर है लेकिन कोरोना काल मे उनके बिल ने यह पोल खोल दी है कि अगर कोई व्यक्ति निजी अस्पताल के दरवाजे खटखटा देता है तो उसका आर्थिक रूप से मरना तय है। सरकार इस मामले पर चुप्पी साधे बैठी है।

बिल में हुआ है सारा खेल:

अब इस मुसीबत के वक्त में कोई भूला भटका हुआ व्यक्ति अगर सरकारी चिकित्सा से बचने के लिए निजी अस्पतालों का रुख कर ले तो निजी स्वास्थ्य संस्थानों को लगता है कि एक ही मरीज से करीब एक महीने के अस्पताल का खर्चा निकाल लिया जाए। दरअसल तेजिंदर भुल्लर नामक व्यक्ति को कोरोना की शंका होने पर टेस्ट कराया गया और पॉजिटिव आने के बाद महाराष्ट्र के ही एक नामी गिरामी निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां पर उनका चौदह दिनों तक इलाज किया गया और यहीं पर हुआ आर्थिक शोषण। अस्पताल में दी जाने वाली सेवाओं के नाम पर इतना लूट खसोट मचाया गया कि लोगों का दिल भर गया। लोगों ने कहा कि क्या कोई अस्पताल इतना चार्ज लेता है?

हॉस्पिटल चार्जेस कुछ इस प्रकार थे:

तो बिल का लब्बोलुआब कुछ इस तरह है कि 3 मई को भर्ती होने वाले व्यक्ति को 16 मई को डिस्चार्ज किया गया इस बीच में हॉस्पिटल बिल दिन दूने रात चौगने बढ़ा, आप इसे कुछ इस तरीके से समझ सकते है:

  • अस्पताल में रजिस्ट्रेशन कराने के लिए 1000 रुपये।

  • डाक्टर के विजिट का चार्ज एक बार का 1200, कुल मिलाकर डाक्टर साहब 14 बार आये तो इसकी रकम हुई 16800 रुपये।

  • इन्वेस्टिगेशन का चार्ज लगा 37615 रुपये।

  • आइसोलेशन बेड चार्ज के नाम पर 6000 रुपये प्रति दिन के हिसाब से वसूले गए जो कुलमिलाकर 84000 हुआ।

  • वहीँ 1000 रुपये प्रति दिन के हिसाब से कोविड केयर के नाम पर लूट हुई जो आखिर में 14000 पर रुकी।

वहीँ जबकि दुनिया मे कोरोना की कोई दवा अभी तक खोजी भी नहीं गयी लेकिन फिर भी कोरोना में दवाइयों के नाम पर 114415 ( एक लाख चौदह हजार चार सौ पंद्रह रुपये लिए गए)

तो कुलमिलाकर यह रकम पहुंचती है दो लाख सरसठ हजार आठ सौ तीस रुपये। मतलब अगर आम आदमी उस अस्पताल में होता तो उसे मरना कुबूल होता।

मामला यह है भारत की जनता लंबे वक्त से ही निजी हॉस्पिटल्स के ऊपर नजर रखने की मांग करती आई है लेकिन मेडिकल लाबी की लंबी पहुच होने और सरकार का इनसे न उलझने के कारण निजी क्षेत्र के मेडिकल संस्थानों का मनोबल लंबे समय से बढ़ता चला आ रहा है और इस दलदल में आम आदमी लगातार पिसता हुआ चला जा रहा है।

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उदय बुलेटिन
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