उदय बुलेटिन
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मेनका गांधी सुल्तानपुर से चुनाव लड़ने वाली हैं। 
मेनका गांधी सुल्तानपुर से चुनाव लड़ने वाली हैं। |Google
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गांधी परिवार की छोटी बहू मेनका गांधी आखिर क्यों हो गईं एंटी कांग्रेस ? 

भारतीय जनता पार्टी ने कल लोकसभा उम्मीदवारों कि 10 वीं सूची जारी की। जिसमें उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर लोकसभा सीट से मेनका गांधी को टिकट दिया गया। 

AKANKSHA MISHRA

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आज गांधी परिवार की छोटी बहू मेनका कद्दावर बीजेपी नेता हैं। लेकिन एक समय ऐसा भी था, जब मेनका कांग्रेस कि टिकट से चुनाव लड़ना चाहती थीं। लेकिन गांधी परिवार ने उन्हें यह मौका कभी नहीं दिया। और क्यों नहीं दिया ? यह एक लंबी और दिलचस्प कहानी है, और इसके दो पहलू हैं। पहला पर्सनल और दूसरा पॉलिटिकल।

हम पर्सनल से शुरू करते हैं -

इंदिरा गांधी के बड़े बेटे राजीव गांधी की शादी 1968 में सोनिया से हुई। सोनिया-राजीव की शादी के 6 साल बाद 1974 में संजय गांधी की शादी मेनका से हुए। इंदिरा गांधी की दोनों ही बहुएं एक दूसरे से बिल्कुल अलग थीं।

जहां गांधी परिवार का हिस्सा बनने के बाद, सोनिया टिपिकल भारतीय बहू बन गईं। हर काम पूछ कर करती, अपनी सास को "मम्मी जी" कहने लगी, साड़ी पहनना शुरू कर दिया, हिंदी सीखने लगी, खाना बनाना सीखा, घर का काम देखती और बच्चों की देखभाल करती। वहीं दूसरी तरफ मेनका जो एक कर्नल की बेटी थीं, उन्हें घर के कामों में इंटरेस्ट नहीं था, हमेसा सुर्खियों में रहना पसंद करने वाली मेनका को शादी के बाद अपने मॉडलिंग करियर को भी बाय-बाय करना पड़ा था और इन वजहों से मेनका को गांधी परिवार में एडजस्ट होने में भी तकलीफ हो रही थी। गांधी परिवार में उनका दम घुटने लगा ।

इन्हीं कारणों से मेनका गांधी और इंदिरा गांधी के बीच विवाद बढ़ने लगे। मेनका के उग्र स्वभाव और राजनीतिक झुकाव ने इंदिरा गांधी के मन में उनके प्रति गुस्सा और आक्रोश पैदा कर दिया और सोनिया इंदिरा की पहली पसंद बन गईं। परिवार के भीतर दरार पैदा होने लगी, और मेनका को इंदिरा से नफरत होने लगी।

गांधी परिवार 
गांधी परिवार 
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मेनका से क्यों नाराज थी इंदिरा गांधी ?

इंदिरा गांधी ने मन में मेनका के खिलाफ नाराजगी भरी थी। इंदिरा कभी नहीं चाहती थी कि मेनका और संजय की शादी हो। क्योंकि मेनका शादी से पहले मॉडलिंग किया करती थी। संजय के बार-बार मनाने से इंदिरा मान तो गईं लेकिन शादी के लिए एक शर्त भी रख दी। उन्होंने मेनका के नाम की स्पेलिंग में बदलाव किये। Menaka (पुराणानुसार एक अप्सरा) का नाम Meneka कर दिया और दोनों की शादी हो गई।

इंदिरा के मन में मेनका के प्रति नाराजगी की एक और वजह थी। संजय अपनी मां के घर की अपेक्षा आनन्द परिवार (मेनका का परिवार) के घर में ज्यादा सहज थे। आनन्द परिवार में नौकरों सहित सभी उनकी बहुत आवभगत करते थे। और मां इंदिरा के घर में उनके बड़े भाई राजीव के रूप में एक प्रतिद्वन्द्वी मौजूद था।

राजीव गांधी, इंदिरा गांधी और संजय गांधी 
राजीव गांधी, इंदिरा गांधी और संजय गांधी 
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व्यक्तिगत विवाद बना राजनितिक विवाद

संजय गांधी, इंदिरा गांधी के छोटे बेटे थे। लेकिन राजनीति में बड़े भाई राजीव से ज्यादा सक्रिय थे, इंदिरा उन्हें अपना दाहिना हाथ मानती थी। और तब संजय गांधी को इंदिरा का राजनीतिक उत्तराधिकारी भी माना जाता था। मेनका को भी विश्वास था कि किसी दिन संजय प्रधान मंत्री होंगे। 1974 में शादी के बाद से ही मेनका गांधी ने राजनीति में गहरी दिलचस्पी लेने शुरू कर दी थी।

फिर 1975 में इमरजेंसी लग गयी। आपातकाल के दौर में, संजय अपनी माँ इंदिरा के पीछे मजबूती से खड़े थे। 1977 में आपातकाल खत्म हुआ और जनता पार्टी सत्ता में आई। आपातकाल के तीन साल बाद ही 1980 में कांग्रेस दोबारा सत्ता में आ गई। लेकिन, एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी, संजय गांधी की उसी साल एक विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई।

संजय गांधी और मेनका गांधी
संजय गांधी और मेनका गांधी
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और इस तरह गांधी परिवार की राजनीतिक विरासत राजीव गांधी को सौंप दी गई

1980 में संजय गांधी की मौत के बाद है, मेनका खुद को संजय गांधी का असली उत्तराधिकारी मानने लगी थी। जब इंदिरा अपने बड़े बेटे राजीव गांधी को राजनीति के लिए तैयार कर रही थी तब मेनका खुद को संजय की जगह लेने के लिए तैयार कर रही थी। परिणामस्वरूप, उनके बीच के रिश्ते और भी कड़वे हो गए। इंदिरा गांधी ने मेनका गांधी को घर से बाहर निकाल दिया। और गांधी परिवार की राजनीतिक विरासत राजीव गांधी को सौंप दी गई।

संजय गांधी की मृत्यु के बाद गांधी परिवार ने मेनका को यह जताने में बहुत समय नहीं लगाया कि वह प्रधानमंत्री के घर से मेल नहीं खातीं।

उपद्रवी बहू मेनका ने शुरू की राजनीतिक पारी - राष्ट्रीय संजय मंच

1980 में संजय गांधी की मौत के बाद गांधी परिवार ने मेनका को बाहर का रास्ता दिखा दिया था। जिससे नाराज होकर मेनका ने 1983 में राष्ट्रीय संजय मंच नामक राजनीतिक पार्टी कि स्थापना की। आंध्र प्रदेश के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 5 सीटों में उम्मीदवार उतारे जिसमें 4 सीटें पर जीत हासिल की। चुनाव में मिली इस जीत ने मेनका का मनोबल बढ़ा दिया। जिसके बाद मेनका ने 1984 में राजीव गांधी के खिलाफ उत्तर प्रदेश के अमेठी में अपने पति की सीट से नामांकन दाखिल करने का फैसला किया। उनकी जीत सुनिश्चित थी क्योंकि संजय की मृत्यु के बाद उन्हें जनता की सहानुभूति मिली थी। लेकिन, उसी वर्ष इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई और सहानुभूति की लहर राजीव गांधी की ओर मुड़ गई। राजीव गांधी एक बड़े अंतर से जीते, भारत के प्रधानमंत्री बने और मेनका को एक बार फिर अपमानित होना पड़ा।

यह अंतिम घटना थी जिसने मेनका को कांग्रेस विरोधी बना दिया था !!

मेनका गांधी इस बार उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर सीट से बीजेपी उम्मीदवार हैं। उन्होंने अपने पति संजय गांधी को प्रधानमंत्री बनते हुए तो नहीं देखा, पर शायद वे अपने बेटे वरुण गांधी को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनते हुए जरूर देखना चाहे।