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मंदिर प्रेवश पर विरोध करती महिलायें 
मंदिर प्रेवश पर विरोध करती महिलायें |IANS
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सबरीमाला मंदिर मामला में सर्वोच्च न्यायालय का पुनर्विचार याचिका पर जल्द सुनवाई से इनकार

सर्वोच्च अदालत ने शुक्रवार को सबरीमाला मंदिर में 10-50 वर्ष की महिलाओं को प्रवेश देने के संविधान पीठ के फैसले पर पुनर्विचार के लिए दायर याचिकाओं पर जल्द सुनवाई करने से शुक्रवार को इनकार कर दिया है।

AKANKSHA MISHRA

AKANKSHA MISHRA

नई दिल्ली: सर्वोच्च अदालत ने शुक्रवार को सबरीमाला मंदिर में 10-50 वर्ष की महिलाओं को प्रवेश देने के संविधान पीठ के फैसले पर पुनर्विचार के लिए दायर याचिका पर जल्द सुनवाई करने से शुक्रवार को इनकार कर दिया। भारत के मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई की पीठ ने याचिका खारिज कर दी। उन्होंने कहा पुनर्विचार याचिका पर वहीं न्यायाधीश विचार करते हैं, जिन्होंने फैसला दिया है। ये केस भी नियमित तरीके से सुना जायेगा। जस्टिस ऑफ़ इंडिया रंजन गोगोई ने कहा कि हम कितनी जल्दी भी कर ले पर इस केस की सुनवाई 16 अक्टूबर से पहले ये संभव नहीं है। पुनर्विचार याचिका दायरकर्ताओं का कहना है की 16 अक्टूबर से मंदिर खुल रहा है , इसलिए कम से कम शुक्रवार को मंदिर प्रेवश पर अंतरिम रोक लगाने के लिए सुनवाई हो।

आपको बता दें, सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर में सालों से चली आ रही परंपरा पर रोक लगाते हुए महिलाओं के मंदिर प्रवेश पर लगे रोक को हटा दिया था। और इस प्रथा को असंवैधानिक करार दिया था। सबरीमाला मंदिर में फिलहाल 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मंदिर के दरवाजे सभी महिलाओं के लिए खोल दिए गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था धर्म सभी के लिए समान है , अय्यपा कुछ अलग नहीं , जो नियम जैविक और शारीरिक प्रक्रिया पर बने हैं उन्हें संविधानिक करार नहीं दिया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला 4 -1 के बहुमत से आया था , जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने इसपर अपनी अलग राय दी थी , उनका मानना था कि कोर्ट को धार्मिक परंपराओं में दखल नहीं देना चाहिए।

जिन धार्मिक प्रथाओं पर लोगों का भरोसा है, उन प्रथाओं का सम्मान किया जाना चाहिए , ये प्रथाएं संविधान से संरक्षित है , समता का अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता दोनों अलग हैं दोनों को हम साथ नहीं रख सकते।

नायर सर्विस सोसाइटी (NSS) व अन्य ने इस सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले को वापस लिए जाने के लिए सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की। इस बीच केरल सरकार ने कहा कि वह सर्वोच्च न्यायालया के फैसले को लागू करने के लिए कदम उठाएगी।

बरहाल इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन और अन्य ने इस प्रथा को चुनौती दी थी। उनका मानना है कि यह प्रथा लैंगिकता पर भेदभाव करती है , इसे खत्म कर देना चाहिए। इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन का कहना है कि मंदिर में प्रवेश के लिए 41 दिनों का ब्रहचर्य महिलायें पुरा नहीं कर सकती , ये उनके लिए असंभव है।