लाल सोने के नाम से जाना जाने वाला देशी गेंहू, मचा रहा विदेशों में अपनी धूम

वैसे तो गेहूं की खपत भारत मे कम नही है लेकिन अगर कोई गेंहू अपनी खासियतों की वजह से जाना जाए तो जाहिर सी बात है कि उसके कद्रदानों की संख्या में इजाफा जरूर होगा
लाल सोने के नाम से जाना जाने वाला देशी गेंहू, मचा रहा विदेशों में अपनी धूम
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आज हमारी चर्चा का विषय होगा बुंदेलखंड के भूभाग में पैदा होने वाला लाल गेंहू कठिया गेंहू, जिसकी मांग देश मे ही नही बल्कि दुनिया के कई देशों में है।

वैसे तो यह गेंहू बुंदेलखंड में कब और कैसे आया इसका कोई प्रमाण नही मिलता लेकिन बुंदेलखंड में खेती करने वाले जानकार बताते है कि शुरुआत में यह गेंहू गुजरात के काठियावाड़ में बेहद बड़ी मात्रा में उपजता था और अधिकतर भूमि क्षेत्र असिंचित होने की वजह से यह बुंदेलखंड में ज्यादा मात्रा में उगाया जाने लगा। यही कारण ही कि अपनी शुरुआत के बाद से ही यह गेंहू बुंदेलखंड में आज तक भी पैदा किया जा रहा है।

क्यों है खास:

कहने को तो यह महज गेंहू की ही एक पुरानी प्रजाति है लेकिन अगर इसके उत्पादन की बात करें तो यह आज के उन्नत और संकर बीजों से उपजने वाली फसलों के सामने पिछड़ता नजर आता है लेकिन अगर मूल्यांकन वाली नजर से देखे तो यह गेंहू असिंचित भूमि में अन्य दूसरे गेहुओं की प्रजातियों से कहीं ज्यादा उपज दे जाता है। यही कारण है कि बुंदेलखंड में इसे बुआई करो और भूल जाओ की तर्ज पर पैदा किया जाता है। चूंकि इस गेंहू की फसल पर ज्यादा बीमारियों का प्रकोप नही होता और कीटों से भी बचकर उपज देता है इसीलिए यहां के पारंपरिक किसानों के लिए कठिया गेंहू हमेशा से विशेष रुचि का विषय रहा है।

ऐसे वक्त में जब देश और दुनिया रासायनिक उर्वरकों से पैदा होने वाली फसलों के नुकसान पर चर्चा कर रही है वैसी स्थिति में कठिया गेंहू लोगों के निरोगी खाद्य के रूप में एक वरदान के रूप में उभर कर सामने आया है। हालांकि देखने मे यह गेंहू अन्य गेंहुओ से मिलता जुलता पाया जाता है लेकिन न्यूट्रिएंट्स की नजर से यह अन्य गेंहुओ से बाजी मार लेता है। इस कठिया (लाल गेंहू) में प्रोटीन की उच्च मात्रा पाई जाती है जो कि 12 से लेकर 13 प्रतिशत तक पाई जा सकती है। वहीँ इस गेंहू में बीटा कैरोटीन नामक तत्व छुपा होता है जो कि विटामिन ए के लिए जनक का काम करता है। जोकि नेत्र संबंधित बीमारियों में बेहद कारगर है।

ज्यादा खर्च के बिना, खासी उपज:

अगर बुंदेलखंड के भूभाग की बात करें तो लंबे अर्से से यह क्षेत्र सूखे और मौसम की मार से जूझता चला आ रहा है और इस मौसम में केवल बुआई करने से तैयार होने वाला कठिया गेंहू बिना किसी रासायनिक उर्वरकों के भी खुद को केवल मिट्टी की ताकत से तैयार करता है। चूंकि बुंदेलखंड हमेशा से पानी की उपलब्धता से वंचित रहा है ऐसी स्थिति में कठिया गेंहू एक अच्छा विकल्प साबित होता है

बाजार में है खासी मांग:

लेकिन अगर आपको जानकारी दी जाए कि इस कठिया गेंहू की मांग उपज से कहीं ज्यादा है तो आप दंग हो सकते है, दरअसल इस गेंहू की मांग भारत समेत बांग्लादेश और आस पास के एशियाई देशों में ज्यादा है, इस गेंहू के दलिये को बेहद पौष्टिक पाया गया है, और ग्लूटेन की वजह से यह गेंहू लोगों के बीच मे ज्यादा पसंद है।

क्या है स्वास्थ्य के मायने:

एक तरफ जहां लोग मानव निर्मित फर्टीलाइजर का उपयोग सिर्फ इस लिए करते जा रहे है कि इससे पैदावार बढ़ेगी लेकिन इसका कितना ज्यादा दुष्परिणाम लोगों की सेहत पर होगा उसका कोई अंदाजा नही होता और एक तरफ है कठिया गेंहू जिसका उत्पादन सदियों से बिना किसी रासायनिक उर्वरकों की मदद से किया जाता रहा है, यही कारण है कि अब कठिया गेंहू देश दुनिया मे ज्यादा पसंद किया जाता है।

क्या है पहचान:

उच्च फाइबर के गेंहू जिसकी रोटियां किनारे से फटने लगती है, स्वाद में अद्भुद मिठास देते हुए इस गेंहू की रोटियां खुले में रखने पर जल्द ही सूख जाती है, लेकिन मामला सेहत से जुड़ा हुआ है इसलिए बुंदेलखंड के किसान केवल अपने खाने के लिए इस गेंहू का उत्पादन बिना किसी खाद और कीटनाशक के लंबे अर्से से करता चला आ रहा है।

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उदय बुलेटिन
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