New Labour Laws
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श्रम कानूनों के खत्म होने के बाद श्रमिकों का क्या होगा?

नया श्रम कानून बंधुआ मजदूरी को बढ़ावा देने वाला कानून साबित हो सकता है, अब मजदूरों के हितों की रक्षा कौन करेगा ?

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

कोरोना महामारी के बीच विश्व समेत भारत की अर्थव्यवस्था बेहद निचले पायदान पर पहुँच चुकी है, लेकिन इस बीच देश के उद्योगों को संभालने और विदेशी निवेश खासकर चीन से बाहर जाने वाले उद्योगों को भारत मे स्थापित कराने के चक्कर मे भारत ने कुछ लुभावने कदम उठाये हैं, जिनका सीधा संबंध भारत के श्रमिकों से जुड़ा हुआ है। सरकारों के इन कदमो की वजह से श्रमिकों को भारी तकलीफ उठानी पड़ सकती है।

तीन राज्यों ने जारी किए फरमान :

चूंकि कोरोना वायरस के चलते चीन में स्थापित अमेरिका समेत अन्य देशों के उद्योगों और संस्थानों ने वहां से निकलना बेहतर समझा है और ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि मैनपावर के लिहाज से भारत उद्योगों के लिए सबसे मुफीद जगह है। इस बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले ही राज्यो को संकेत दिए थे कि आप विदेशों से आने वाले निवेश को अपने राज्यों की तरफ आकर्षित कीजिये। नतीजन भाजपा शासित उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और गुजरात ने निवेश के लिहाज से श्रम कानूनों में बड़े बदलाव किये हैं। ये बदलाव आने वाले 1000 दिन यानी कि करीब तीन साल तक लागू रहेंगे।

विदेशी उद्योगों के लिए लुभावने नियम:

किसी भी विदेशी निवेश और उद्योगों के लिए सबसे अहम बात होती है कि वह जिस देश मे अपना कल कारखाना, संस्थान और उद्योग लगाने जा रहे है उसके नियम कायदे क्या हैं, क्या वह उद्योगों संस्थाओं के लिए मुफीद है, लचर है अथवा कड़े है, अगर नियमावली कड़ी है तो जाहिर तौर पर किसी उद्योग को स्थापित करने में ज्यादा समय और परिश्रम लगेगा। उदाहरण के तौर पर सामान्य रूप से अगर कोई बाहर से आकर भारत मे उद्योग स्थापित करना चाहता है तो सभी विभागों से सहमति और रजिस्ट्रेशन कराने में अभी तक करीब 30 दिन का समय लगता रहा है। लेकिन नियमावली में बदलाव कर इसे एकल विंडो से आगे बढ़ाकर ऑनलाइन कर दिया है जिसकी वजह से किसी उद्योग के रजिस्ट्रेशन के लिए एक दिन ही काफी होगा।

मजदूरों के हक लगभग समाप्त :

चूंकि जब उद्योगों के हाँथ में सारे काम काज की कमान सौपी जाएगी जिसका सीधा-सीधा असर किसी उद्योग में कार्यरत श्रमिको और कर्मचारियों पर पड़ेगा। यहाँ हम आपको एक बिंदु से अवगत कराना चाहेंगे कि सरकार के इस कदम को लोग बंधुआ मजदूरी से भी जोड़कर देख रहे है जो एक तरह से गलत भी नहीं है। चूंकि जब भारत मे श्रमिकों के हितों की रक्षा करने वाले कानून भी लागू रहते है तब भी श्रमिकों के ऊपर होने वाले शोषण के मामले संज्ञान में आते रहते है, लेकिन जैसे ही ये कानून समाप्त होते है तो तब उद्योगों के द्वारा श्रमिको के शोषण में बढ़ोत्तरी मिलेगी।

उद्योगों को मिले ज्यादा अधिकार :

ताजा मामलों में अगर तीन प्रदेशों की सरकारों द्वारा उद्योगों के लिए ढीली की गई नीतियों का विश्लेषण करें तो इनमें बेहद मिलता जुलता पैटर्न दिखाई देता है उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा "उत्तर प्रदेश टेम्परेरी एग्जेम्प्शन फ़ॉर सर्टेन लेबर लॉजस ऑर्डिनेंस 2020" (Uttar Pradesh Temporary Exemption from Certain Labour Laws Ordinance, 2020) को मंजूरी देकर कानून में जिस तरह के बदलाव लाये गए हैं वो कुछ इस प्रकार होंगे:

इस ऑर्डिनेंस के लागू होने के बाद श्रम कानून के अंतर्गत केवल "बिल्डिंग एंड अदर्स कंट्रक्शन वर्क्स एक्ट 1996 बस लागू रहेगा बाकी के कानून जो इसके साथ जुड़े हुए है वो सभी निष्प्रभावी माने जाएंगे।

नाम के लिए बधुआ मजदूरी अधिनियम 1976 का पालन किया जाएगा लेकिन चूंकि श्रम विभाग का कोई भी व्यक्ति 1000 दिनों तक उद्योगों में इंस्पेक्शन नहीं कर सकता तो इस प्रकार से इन कानून का होना या न होना कितना प्रभावी रह जायेगा ईश्वर जाने।

उद्योगों में 1936 में लाया गया कानून पेमेंट ऑफ वेजेज एक्ट की धारा 5 ही प्रभावी रहेगी, बाकी के कानून निष्प्रभावी रहेंगे।

ट्रेड यूनियन को बल देने वाला कानून 1000 दिनों के लिए स्थगित किया गया है।

प्रवासी मजदूरों के हितों की रक्षा करने वाले कानूनों को 1000 दिनों के लिए सरेंडर किया गया है।

ठेकेदारी पर काम करने वाले श्रमिको के लिए निर्धारित कानून अगले 1000 दिनों के लिए बंद डिब्बे में रहेंगे।

सनद रहे कि श्रम कानून में किये गए बदलाव नए और पुराने चल रहे दोनो तरह के उद्योगों में बदस्तूर जारी रहेंगे।

उद्योगों को अधिकार होंगे कि वह कामगारों की शिफ्ट में अपने माफिक बदलाव कर सके, इस प्रकार से 8 घंटे और 12 घंटे के काम के लिए सरकार कोई हस्तक्षेप नहीं कर पायेगी, अगर उद्योग को लगता है कि उसे उत्पादन के लिए 12 घंटे की शिफ्ट चलानी है तो श्रमिक उसके लिए किसी नियम का हवाला नहीं दे पाएगा।

तीन राज्यो में उद्योगों को बढ़ावा देने और नए उद्योगों को देश प्रदेश में स्थापित करने की मंशा से जिस तरह के कानूनों को लाया और समाप्त किया जा रहा है उनको देखकर लगता है कि कहीं न कही श्रमिक वर्ग का शोषण होना निश्चित है। हालाँकि देखना यह है कि जब ये श्रम से जुड़े हुए कानून लागू भी थे तब क्या मजदूरों के हितों की रक्षा हो पाती थी? कोरोना महामारी के बीच नोयडा, गुरुग्राम और सूरत जैसे उद्योग नगरों में लाखों की तादाद में श्रमिकों का वेतन मुहैया नहीं कराया गया है। अब जबकि ये कानून इस तरह से निष्प्रभावी होंगे तब मजदूरों के हितों की चिंता कौन करेगा?

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