कर्ज माफी
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कर्ज माफी: देश के अन्नदाताओं की याद सिर्फ चुनाव में ही क्यों आती है ? 

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव जितने के बाद 2017 में योगी सरकार ने राज्य के 86 लाख किसानों का करीब 30,729 करोड़ रुपये का कर्ज माफ किया था

AKANKSHA MISHRA

AKANKSHA MISHRA

चुनाव आते ही राजनेता वोटरों को लुभाने के लिए तरह-तरह के वादे और दावे करते हैं। राजनीतिक दल वोट बटोरने के लिए अक्सर चुनावों के वक्त किसानों से कर्जमाफी का वादा करते हैं और चुनाव जीतने पर अपने वादे निभाते भी हैं। जैसा कि हाल ही में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में कर्जमाफी का वादा देखने को मिला।

मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस पार्टी की जीत के बाद बनी नई सरकारों ने किसानों का कर्ज माफ करने का एलान किया। विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कर्जमाफी के लिए 10 दिनों का समय माँगा था। जिसे मात्र 2 से 3 दिनों में पूरा कर दिया गया। किया भी क्यों न जाये कौन सा मुख्यमंत्री जी को पैसे अपनी जेब से देने पड़ रहे हैं...

यह पहली बार नहीं हुआ है, इससे पहले भी विभिन्न प्रांतों की सरकारों ने चुनाव जीतने के लिए कृषि कर्ज माफ किए हैं। लेकिन इससे न तो किसानों की दशा सुधरती है और न ही कर्जमाफी का स्थायी समाधान निकल पाता है। हर पांच सालों के बाद चुनाव होती है, पार्टियां कर्ज माफी का वादा करती हैं, किसान बैंकों से कर्ज लेते है और उनका कर्ज नई सरकार माफ कर देती है।

राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार द्वारा की गई कर्ज माफी पर सवाल उठाने वाली बीजेपी उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में कर चूकि है कर्ज माफी।

बीजेपी-कांग्रेस सब एक

  • उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सरकार बनने के बाद 2017 में योगी सरकार ने राज्य के 86 लाख किसानों का करीब 30,729 करोड़ रुपये का कर्ज माफ किया था।
  • महाराष्ट्र में 35 लाख किसानों का 1.5 लाख रुपये तक का ऋण माफ किया गया था।
  • पंजाब में कांग्रेस सरकार ने पांच एकड़ तक की खेती की जमीन वाले किसानों के दो लाख रुपये का कर्ज माफ किया था।
  • कर्नाटक के सहकारी बैंक से लिए गए हर किसान का 50,000 रुपये तक का कर्ज माफ किया जा चुका है।
  • मध्यप्रदेश में प्रत्येक किसान का दो लाख रुपये का कर्जा माफ किया गया है।
  • छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने नई सरकार के शपथ लेने के तुरंत बाद ही किसानों का 6100 करोड़ रूपये का कर्ज माफ किया है।
  • राजस्थान के मुख्य मंत्री अशोक गहलोत ने चुनाव जीतने के बाद 70,000 करोड़ रुपये कृषि ऋण माफ किया है।

किसानों की समस्या, समस्या नहीं

अगर आप किसी छोटे गांव-कस्बे में जाएं और पूछे की क्या कर्जमाफी से किसानों को प्रोत्साहन मिलता है ? तो यह संभव है कि आपको उत्तर 'हाँ' में मिले। दरअसल कृषि कर्जमाफी से किसानों को प्रोत्साहन मिलता है कि वे बैंक से कर्ज लेकर न चुकाएं और अगले चुनाव में कर्जमाफ करने वाली पार्टी को वोट देकर जिताएं ताकि उनका कर्ज माफ हो जाए।

हालांकि, हमारे देश कि अजीब सच्चाई यह भी है कि हम जरूरतमंद किसानों का कर्ज माफ ही नहीं करते हैं। दरअसल जो सबसे गरीब किसान होते हैं वे जमींदारों, दुकानदारों से उधार लेते हैं। उनका बैंक तक पहुंच पाना संभव ही नहीं तो कर्जमाफी का एलान उन जरूरतमंद किसानों पर लागू ही नहीं हो पाता है। वास्तव में कर्ज माफी का लाभ गरीबों को मिलने की बजाए उन्हें मिलता है, जिनकी स्थिति बेहतर है।

बेहतरी के लिए संभावना

राज्य सरकार कृषि कर्ज जैसी समस्याओं का हल ढूंढ पाने में अब-तक असमर्थ रही है। कर्ज माफी करने का मतलब है कि सरकारी बैंकों को भुगतान करना जिसके लिए राज्य सरकार अपने पैसे का उपयोग करती है। इससे राजकोषीय घाटे में बढ़ोतरी होती है और जिसे पूरा करने का माध्यम 'कर' है। राजकोषीय घाटा को 'करों' के माध्यम से वसूला जाता है जिससे मध्यम वर्ग पर ‘कर’ का बोझ पड़ता है।

  • कृषि आय में वृद्धि की जाये। जब कृषि आय में वृद्धि होगी तो किसान अपने कर्ज चुकाएंगे और कर्जमाफी के लिए बोलेंगे ही नहीं।
  • हमारे देश में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर फसलों की खरीद के लिए अपर्याप्त आधारभूत संरचना है। सरकार को इसे दुरुस्त करने की जरुरत है।
  • दीर्घकालिक संरचनात्मक सुधार।
  • किसानों को शिक्षित करने की जरुरत है जिससे बिचौलिए की भूमिका कम हो और लाभ किसानों को मिले।

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उदय बुलेटिन
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